भारत रक्षा के क्षेत्र में लगातार नई तकनीक विकसित कर रहा है। लड़ाकू विमान, मिसाइल, रडार और ड्रोन जैसी चीजों के बारे में तो अब काफी लोग जानते हैं, लेकिन भारत ने हाल ही में जिस तकनीक का परीक्षण किया है, वह अपने आप में काफी खास है। भारत ने एक ऐसी एयरशिप का परीक्षण किया है, जो आसमान में बहुत ज्यादा ऊंचाई पर पहुंचकर एक ही इलाके के ऊपर लंबे समय तक रह सकती है। इसे आसान भाषा में समझें तो यह आसमान में तैरने वाले एक बड़े गुब्बारे की तरह है, जो सिर्फ हवा में उड़ता ही नहीं, बल्कि नीचे के इलाकों पर नजर भी रख सकता है।
हमने बच्चों के हाथ में उड़ने वाले गैस के गुब्बारे तो देखे ही होंगे। अगर आप ऐसे गुब्बारे को छोड़ दें, तो वह ऊपर की तरफ जाने लगता है, क्योंकि उसके अंदर भरी गैस आसपास की हवा से हल्की होती है। एयरशिप भी इसी सिद्धांत पर काम करती है, लेकिन इसका आकार बहुत बड़ा होता है और इसका वैज्ञानिक परीक्षण, निगरानी और संचार जैसे कामों के लिए किया जा सकता है। सामान्य एयरशिप कई मीटर लंबी हो सकती हैं। कुछ डिजाइन इससे भी बड़े होते हैं। हालांकि, भारत ने जिस एयरशिप का परीक्षण किया है, उसके आकार की पूरी जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि इसे हवा में ऊपर उठाने के लिए विमान की तरह लगातार बहुत ज्यादा ताकत लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। गुब्बारे में भरी हल्की गैस इसे ऊपर उठाने में मदद करती है। इसके बाद इंजन और प्रोपेलर इसे आगे बढ़ाने या अपनी जगह बनाए रखने में मदद करते हैं। इसके साथ लगे उपकरणों से इसकी स्थिति, ऊंचाई और गति की जानकारी मिलती रहती है। इस तरह जमीन पर बैठे लोग भी पता लगा सकते हैं कि एयरशिप कहां है और किस हालत में काम कर रही है।
लेकिन सवाल यह है कि भारत को ऐसी एयरशिप बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसका सबसे बड़ा कारण है निगरानी। किसी देश की सीमा पर लगातार नजर रखना आसान काम नहीं होता। खासकर भारत जैसे देश के लिए, जिसकी सीमाएं पहाड़ों, रेगिस्तानों और समुद्री इलाकों तक फैली हुई हैं। कई जगहों पर जमीन से निगरानी करना मुश्किल होता है। हर इलाके में लगातार सैनिक तैनात रखना या हर समय विमान उड़ाते रहना भी आसान नहीं है। ऐसे में अगर कोई ऐसा सिस्टम मिल जाए, जो आसमान में काफी ऊंचाई पर रहकर लंबे समय तक नीचे की तस्वीरें और दूसरी जानकारियां भेजता रहे, तो इससे काफी मदद मिल सकती है।
भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO ने इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। DRDO की आगरा स्थित प्रयोगशाला एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट यानी ADRDE ने हाई ऑल्टिट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम, जिसे HAPS कहा जाता है, विकसित किया है। यह एक ऐसा हवाई प्लेटफॉर्म है, जिसे बहुत ऊंचाई पर पहुंचकर वहां काम करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसका हालिया परीक्षण इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि एयरशिप समुद्र तल से करीब 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंची। इसके बाद यह लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर आधे घंटे से ज्यादा समय तक बनी रही। परीक्षण के दौरान जमीन पर मौजूद कंट्रोल सेंटर से इसे नियंत्रित किया गया और उड़ान के दौरान मिलने वाली जानकारियां भी जमीन पर भेजी जाती रहीं। परीक्षण पूरा होने के बाद इसे सुरक्षित नीचे उतार लिया गया।
एयरशिप के अंदर कई तरह के सेंसर और दूसरे उपकरण लगाए जा सकते हैं। इनमें GPS जैसे सिस्टम, दिशा और गति का पता लगाने वाले सेंसर और निगरानी के लिए कैमरे शामिल हो सकते हैं। इनकी मदद से एयरशिप की उड़ान पर नजर रखी जाती है और आसपास के इलाके की तस्वीरें भी मिल सकती हैं। आगे चलकर इसमें जरूरत के हिसाब से अलग-अलग तरह के निगरानी उपकरण या संचार से जुड़े सिस्टम लगाए जा सकते हैं। हालांकि, किसी खास परीक्षण में कौन-कौन से उपकरण इस्तेमाल किए गए, यह उसी परीक्षण की आधिकारिक जानकारी से तय होगा।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि एयरशिप, ड्रोन और सैटेलाइट तीनों का काम एक जैसा नहीं होता। इनके इस्तेमाल के तरीके और अपनी-अपनी सीमाएं हैं। ड्रोन किसी खास इलाके में जाकर तस्वीरें ले सकते हैं और जरूरत के हिसाब से तेजी से अपनी दिशा बदल सकते हैं। लेकिन सामान्य ड्रोन को लगातार हवा में बनाए रखने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। बड़े और खास डिजाइन वाले ड्रोन लंबे समय तक उड़ सकते हैं, लेकिन हर ड्रोन की क्षमता एक जैसी नहीं होती। सैटेलाइट की बात करें तो वे धरती से बहुत ज्यादा ऊंचाई पर काम करती हैं। उनके जरिए मौसम, संचार, जमीन और समुद्र से जुड़ी कई तरह की जानकारियां मिलती हैं। लेकिन किसी सैटेलाइट बनाना, लॉन्च करना और उसका संचालन करना भी महंगा हो है साथ ही, अंतरिक्ष में भेजे गए उपकरण में खराबी आने पर उसकी मरम्मत करना आसान नहीं होता।
एयरशिप इन दोनों के बीच एक अलग तरह का विकल्प बन सकती है। यह सैटेलाइट से काफी नीचे रहकर किसी खास इलाके पर लगातार नजर रख सकती है। इसे जमीन से नियंत्रित किया जा सकता है और जरूरत पड़ने पर नीचे लाकर इसकी जांच या मरम्मत भी की जा सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एयरशिप हर मामले में ड्रोन या सैटेलाइट से बेहतर होगी। किस तकनीक का इस्तेमाल करना है, यह काम, इलाके, मौसम और जरूरत के हिसाब से तय होगा। भारत के लिए इस तकनीक का एक बड़ा इस्तेमाल सीमा की निगरानी में हो सकता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ी इलाकों में कई जगह ऐसी हैं, जहां जमीन से हर गतिविधि पर नजर रखना कठिन होता है। इसी तरह रेगिस्तानी इलाकों और समुद्री सीमा के आसपास भी ऐसी तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, वास्तविक निगरानी की क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसमें किस तरह के कैमरे और सेंसर लगाए गए हैं और वे कितनी दूरी तक साफ जानकारी दे सकते हैं।
इसका इस्तेमाल सिर्फ रक्षा के क्षेत्र तक सीमित रहने की संभावना भी नहीं है। आपदा के समय ऐसी एयरशिप संचार व्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकती है। मान लीजिए किसी इलाके में बाढ़, भूकंप या भूस्खलन के कारण मोबाइल नेटवर्क और दूसरी संचार सेवाएं बंद हो गई हैं। ऐसे में ऊंचाई पर मौजूद कोई प्लेटफॉर्म संचार उपकरणों के साथ इस्तेमाल किया जाए, तो वह राहत और बचाव कार्यों में मदद कर सकता है। इसी तरह बड़े इलाकों की निगरानी, मौसम से जुड़े अध्ययन और दूरदराज के क्षेत्रों में संचार उपलब्ध कराने के लिए भी इस तरह की तकनीक पर काम किया जा सकता है।
भारत ने इस दिशा में काम एकदम अभी शुरू नहीं किया है। इससे पहले मई 2025 में मध्य प्रदेश के श्योपुर से इस एयरशिप की पहली परीक्षण उड़ान की जानकारी सामने आई थी। उस समय यह करीब 17 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंची थी और लगभग 62 मिनट तक हवा में रही थी। उस परीक्षण में सिस्टम के दबाव और आपातकालीन व्यवस्था जैसी चीजों की जांच की गई थी। अब इसके नए परीक्षण में करीब 21 किलोमीटर तक पहुंचने और लगभग 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर आधे घंटे से अधिक समय तक बने रहने की क्षमता का प्रदर्शन किया गया।
भारत के अलावा कई दूसरे देश और कंपनियां भी इस तरह के हाई ऑल्टिट्यूड प्लेटफॉर्म पर काम कर रहे हैं। यूरोप में एयरबस का Zephyr जैसे सौर ऊर्जा से चलने वाले प्लेटफॉर्म विकसित किए गए हैं, जिनका उद्देश्य बहुत ऊंचाई पर लंबे समय तक रहकर निगरानी या संचार जैसे काम करना है। अमेरिका और चीन में भी ऊंचाई पर काम करने वाले गुब्बारों और दूसरे हवाई प्लेटफॉर्म को लेकर अलग-अलग तरह के परीक्षण और विकास कार्यक्रम चलते रहे हैं। जापान सहित कई देश भी ऊंचाई पर मौजूद प्लेटफॉर्म के जरिए संचार सेवाओं की संभावनाएं तलाशते रहे हैं।
कुल मिलाकर, DRDO की यह परियोजना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी कदम है। अगर आने वाले समय में इस सिस्टम को ज्यादा समय तक उड़ने, ज्यादा वजन उठाने और लगातार निगरानी करने लायक बना लिया जाता है, तो यह देश की सुरक्षा और संचार व्यवस्था में उपयोगी भूमिका निभा सकता है। भारत ने इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ाया है और आने वाले परीक्षण बताएंगे कि यह तकनीक भविष्य में सीमा की निगरानी, संचार और आपदा प्रबंधन में कितनी उपयोगी साबित हो सकती है।