आपातकाल की यादें

रघु ठाकुर वरिष्ठ समाजवादी नेता, चिन्तक विचारक एवं लेखक संबंधित खबरें   आपातकाल से उपजे सवाल, अभी हल होना बाकी जून 1975 की रात्रि लगभग 2 बजे मेरे सागर स्थित निवास पर बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारी व कर्मचारी पहुंचे। उन्होने बताया कि मुझे तत्काल गिरफ्तार करने का आदेश राज्य सरकार ने दिया है। मैंने […]

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Aapatkaal
Gauravshali Bharat News
  • June 25, 2026 4:08 pm IST, Published 1 hour ago

Raghu-Thakur

रघु ठाकुर
वरिष्ठ समाजवादी नेता, चिन्तक विचारक एवं लेखक

 

आपातकाल से उपजे सवाल, अभी हल होना बाकी

जून 1975 की रात्रि लगभग 2 बजे मेरे सागर स्थित निवास पर बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारी व कर्मचारी पहुंचे। उन्होने बताया कि मुझे तत्काल गिरफ्तार करने का आदेश राज्य सरकार ने दिया है। मैंने उनसे गिरफ्तारी की वजह पूछी, परंतु इसका कोई ठीक-ठाक उत्तर उनके पास नहीं था। चूंकि 25 जून से कुछ ही दिन पूर्व स्थानीय जल समस्या को लेकर मेरा लंबा अनशन समाप्त हुआ था तथा शरीर काफी कमजोर हो चला था, अतः मैंने अधिकारियों से कहा कि मैं एक ही शर्त पर रात्रि में जाऊंगा कि मुझे रात्रि में ही जेल भेजा जाय ताकि मैं आराम कर सकूं। उन्होने डी. एम. चड्ढा से संपर्क कर अनुमति प्राप्त की तथा मुझे सागर जेल भेज दिया। सुबह जेल में श्री लक्ष्मीनारायण यादव (अब कांग्रेस के जिला स्तरीय नेता है) तथा श्री स्वतंत्र सिंह चौहान व अन्य लोग पहुंचे। दो-तीन दिन के बाद अचानक एक रात्रि मुझे व मेरे साथ श्री यादव, श्री चौहान, श्री विमल जैन को पुलिस वेन से जबलपुर भेज दिया गया। जबलपुर जेल स्थानांतरण की संभवतः एक वजह यह रही होगी कि सागर के जेल कर्मियों से मेरा संपर्क निरंतर रहता था, क्योंकि मेरे जीवन का उस समय का एक बड़ा हिस्सा, किसी न किसी आंदोलन में भाग लेते हुए जेल में ही गुजरता था।

 

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जबलपुर जेल में आरंभ के दिनों में मुझे केन्द्रीय जेल के गोरा बैरक में रखा गया। इसी बैरक में आजादी के आंदोलन के दिनों में सुभाषचन्द्र बोस व उनके भाई रहे थे। यह गोरा बैरक पृथक बैरक था जिसमें छः कमरे थे। मेरे जबलपुर पहुंचने के पूर्व ही श्रीमती विजयाराजे सिंधिया, राजनीति से सन्यास का लिखित वचनपत्र शासन को देकर रिहा हो चुकी थी। गोरा बैरक में मेरे साथ श्री शिवप्रसाद चनपुरिया, श्री शरद यादव कुछ दिन रहे। फिर उन्हें नरसिंहगढ़ जेल भेज दिया गया। कुछ दिनों पश्चात हमें भी एक अन्य बैरक में स्थानांतरित कर दिया गया, क्योकि सितंबर माह आरंभ हो चुका था और गांधीजी का जन्मदिवस 2 अक्टूबर आने वाला था। शायद जेल वालों को मुझ पर संदेह था या कोई सूचना मिली थी कि मैं कुछ गड़बड़ कर सकता हूँ। जिस बैरक में मुझे स्थानांतरित किया गया था, वह छोटे चक्कर (छोटी गोल) के नजदीक थी। उसके चारों ओर अन्य बड़ी बैरकें थीं जहां से निरंतर मेरे बैरक को देखा जा सकता था। महात्मा गांधी का जन्मदिवस जेल में कैसे मनाये तथा सरकार की तानाशाही का प्रतिरोध कैसे करे यह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में निरंतर घूम रहा था। मैंने तय किया कि 2 अक्टूबर को जेल में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का पुतला जलाऊंगा, क्योंकि उन्होंने आपातकाल लगाकर देश के नागरिकों के अधिकार छीने थे। इस संबंध में मैंने अपने दो साथियों स्वतंत्र सिंह चौहान एवं विमल जैन को विश्वास में लिया। देर रात्रि जब सारा जेल सो जाता था, जेल वार्डन भी किसी चौड़ी-सी दीवार का सहारा लेकर अर्धनिद्रा में लीन हो जाता तब हम पुतला बनाते थे और उसे मेरे बिस्तर के नीचे छिपाकर रख देते थे। मेरे एक सहजेल श्री लक्ष्मीनारायण यादव जो उस समय तक सागर वि.वि. के. मनोविज्ञान विभाग के प्रयोगशाला सहायक थे | अपने रहन-सहन, नैन नक्श, रंग-रूप व आधी अंग्रेजी, फिर न बने हिंदी के प्रयोग के कारण जेल अधिकारियों के खासमखास थे। जेल अधीक्षक श्री घुले एवं सकर अधिकारी श्री चव्हाण नियमित श्री यादव जी को चक्कर में आमंत्रित कर चाय पिलाते और हमारी गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करते थे। श्री यादव ने उन्हें आश्वस्त किया था के वे सब ठीक रखेंगे और हमें कोई गड़बड़ नहीं करने देगे। जेल अधिकारी श्री यादव के आश्वासनों पर आश्वस्त थे। श्री यादवजी भी अधिकारियों से मिलकर लौटने के बाद हमारे साधियों को उपदेश पिलाते थे कि जेल में ठीक से रहना। श्री रघु ठाकुर को समझा कर रखना।

2 अक्टूबर 75 को आशंकित जेल अधीक्षक प्रातः 8 बजे से ही सदल-बल आकर बक्कर में बैठ गये। जेल पुलिस सावधान थी तथा बंदी अधिकारी यानी पीला साफा, नीला नाफा अधिकारियों की सेवा में तल्लीन थे। पीला साफा-नीला साफा ये आजीवन कारावास या दीर्घावधि वाले बंदियों में से नियुक्त किये जाते हैं। उन्हें उनके काम के लिये कुछ विशेष माफी व सुविधाएं भी मिलती हैं। जेल प्रशासन के सबसे महत्वपूर्ण औजार होते हैं। वे मारपीट कर बंदियों को नियंत्रित भी रखते हैं, खुफिया सूचना भी देते हैं तथा अमूमन बंदियों व जेल अधिकारियों के बीच रिश्वत तय भी कराते हैं। सर्दियां आरंभ हो चुकी थी। अधिकारी व श्री यादव जी साफ-सुथरे कुर्ते में चाय की चुस्कियां लेने में मग्न थे। अखबारों के समाचारों की बुगाली करते हुए राष्ट्र चिंतन में मशगूल थे। इसी बीच मैंने श्री चौहान व श्री विमल कुमार को साथ लेकर पुतला बैरक के बाहर लाया तथा उसे जलाकर महात्मा गांधी अमर रहे- आपातकाल खत्म करो, संविधान बहाल करो-इंदिरा गांधी मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए। आपातकाल में जनता से भी ज्यादा भयभीत अधिकारी होते थे। विशेषतः आरंभिक दिनों में। कोई भी व्यक्ति बगैर कारण बताये जेल में डाला जा सकता है, इस मानसिक आतंक से वे भी आतंकित थे। न अपील, न वकील, न दलील, ये आपातकाल के धर्म वाक्य थे। भयभीत जेल अधीक्षक ने सीटी बजवाई जिसे पगली घंटी कहा जाता है। चंद क्षणों में सारा जेल बंद हो गया। बाहर की पुलिस तथा बंदी अधिकारियों ने हम पर हमला बोल दिया। जेल अधीक्षक श्री घुले को महसूस हुआ कि श्री यादव ने उनके साथ धोखा किया है। श्री यादव को पुतला जलाए जाने की जानकारी दी थी, जिसे उन्होने छिपाए रखा। इसलिये चक्कर में ही उनकी पिटाई शुरू हो गई। यद्यपि तथ्य यही था कि श्री यादव की शौकीनी आदतों से हम पहले ही सावधान थे। हम लागों ने यादव को पूर्णतः अंधकार में रखी था कि कहीं वे चाय व कुर्सी के चक्कर में श्री धुले को अंग्रेजी में सावधान न कर दे।

हम लोग तो ग्रामीण परिवेश के थे, अतः जेल के सिपाहियों व बंदियों की मार व लाठियां सह गये, परंतु श्री यादव का यह प्रथम अनुभव बड़ा कठोर था। अतः उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। जब पुलिस मुझे उठाकर बाहर ले जाने लगी तो श्री यादव ने जोर से कहा कि तुम मुझे बाहर भी नहीं रहने देते और अब जेल में भी चैन से नहीं रहने दिया। और पुलिस ने मुझे जेल से सटे हुए एक अतिरिक्त जेल जिसे सेग्रीगेशन कहा जाता है, में डाल दिया। दरअसल सेग्रीगेशन के नाम से यह पृथक खंड उन बंदियों के लिये बनाया गया था जो गंभीर, लाइलाज या छुआछूत की बीमारियों से ग्रस्त होते थे या जो न सुधरने वाले अपराधी बंदी माने जाते थे। इस सह जेल का कोई संबंध मुख्य जेल से नहीं होता है। इसका दरवाजा भी पृथक होता है। यह वर्षों से बंद थी इसलिये झाड़-झंखाड़ पूरे प्रांगण में उगे थे। इसी के एक सेल (एकांत कोठरी या जिसे जेलवाले गुनाहखाना कहते हैं) में मुझे बंद कर दिया गया। इस सेल में मुश्किल से 20 वर्गफुट की जगह थी। उसी में संडास के लिए एक डिब्बा, खाने व पानी के लिए लोहे का तसला रहता था। पानी के लिए गिलास नहीं दिया जाता था। इस आशंका से कि कहीं कोई बंदी निराशा में आत्महत्या न कर ले या सिपाही पर हमला न कर दे। सुबह जमादार डिब्बा उठाकर साफ करने के लिए आता है तभी सेल का दरवाजा खुलता है। खाना व पानी बाहर से ही तसले में डाल दिया जाता है। सेग्रीगेशन जेल का मुख्य दरवाजा दिन में केवल 3-4 बार खुलता है, जब जमादार या खाना देने वाला आता है या फिर सिपाही की ड्यूटी बदलती है या कोई अधिकारी राऊंड पर आता है। आमतौर पर अधिकारी भी इस पृथक जेल में सप्ताह में एकाध बार ही आते हैं। सिपाहियों पर बंदी से बात करने पर रोक होती है।

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जेल अधिकारी मुझसे इतने नाराज व प्रतिशोध में थे कि उन्होंने मुझे सेल में पूर्ण नग्न (निर्वस्त्र) बंद किया। अपने बचपन को छोड़कर जिसकी मुझे कोई याद नहीं है, नग्न रहने का यह मेरा पहला अनुभव था। मेरे पास करने को, देखने को, बोलने को, कुछ भी नहीं था। जेल अधिकारी भी, दूर से ही मुझे घूरते हुए जाते थे कि अगर उनका वश चले तो वे मुझे जान से ही मार दे। समय काटने के लिए मैंने जोर-जोर से गाना शुरू किया। मुझे जितने भी गाने या भजनों के टुकड़े याद थे, उन्हें गाकर मैं अपना समय काटता था। अपने आपको देखने में भी शर्म आती थी, परंतु रहना तो वहीं था। दिन में गाना, रात्रि में मच्छरों से युद्ध यही दिनचर्या चलती रही। कुछ दिनों के बाद मुझे जानकारी मिली की रीवा जेल से कुछ मीसा बंदी जेल में झगड़ा होने के कारण स्थानांतरित होकर आये हैं। उन्हें बेड़िया डाली गई हैं, उसी सेगीग्रेशन जेल में एकांत कोठरियों में रखा जा रहा है। इन बंदियों में रीवा के वर्तमान सांसद श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी, (पूर्व समाजवादी वर्तमान भा.ज.पा.) जनसंघ के श्री ताम्रकार आदि थे। उनके आने का मुझे यह लाभ हुआ कि जेल अधिकारियों ने मुझे पहनने के लिए एक अंडरवियर दे दिया और मैं जिस शर्म के एहसास को भूला चुका था वह पुनः शुरू हो गया। अचानक एक दिन, कुछ जेल अधिकारी आकर मुझसे बड़े प्रेम से बतियाये। मुझे मेरा कुर्ता-पैजामा भी लौटा दिया गया। मैं उनके आकस्मिक प्रेम को देखकर सशंकित हो ऊठा। फिर मुझे कपड़े पहना कर जेल अधीक्षक के कमरे में ले जाया गया। वहां समाजवादी पार्टी के विधायक लक्ष्मीनारायण नायक, जनसंघ के नेता श्री निर्मल जैन, श्री बाबूराव परांजपे, ईश्वरदास रोहानी, श्री पुरुषोत्तम संघी, श्री बच्चन नायक आदि बैठे थे। उन्होने मुझे बताया कि कई सप्ताह से मेरा पता न लग पाने की वजह से, यह अफवाह फैल गई है कि मुझे मार दिया गया है तथा सारे मीसा बंदियों ने प्रातः से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल आरंभ कर दी है। इसलिये जेल प्रशासन चाहता है कि मैं जाकर मीसा बंदियों को संबोधित करूं। इन मित्रों ने मुझे समझाने का प्रयास किया कि मैं ही युवा मीसा बंदियों को समझाकर शांत कर सकता हूं तथा उनसे अनशन तोड़ने को कह सकता हूं। युवा मीसा बंदियों के मन में “वरिष्ठ जनों के प्रति अविश्वास है कि जेल प्रशासन से मिले है।” धीरे से यह भी कहा कि जेल में आखिर कब तक भूखे रहोगे, आदि-आदि। मैने उनके कथन का निहितार्थ समझ लिया था तथा उनकी सूखती जबान व उदास, भूखा चेहरा भी देख लिया था। मैंने मैदान में जाकर मीसा बंदियों की सभा को संबोधित किया और सभी मित्रों से अनशन समाप्त करने की अपील भी की। सभी ने इसे सहर्ष स्वीकारा। मैं जान रहा था कि अगर अनशन नहीं टूटेगा तो एकता टूटेगी, क्योंकि पेट की आग को सहना बड़ा कठिन होता है।
इसके कुछ ही दिन बाद मुझे इन्दौर के.सी.आई. जेल भेज दिया गया जहां मैं लगभग फरवरी 77 के अंत तक यानी रिहा होने तक रहा। इस जेल में श्री कु.प्र. सुदर्शन, मामा बालेश्वर दयाल, भागीरथ भवर सांसद गंगाप्रसाद तिवारी (ददू), वीरेन्द्र कुमार सकलेचा, सुंदरलाल पटवा, हिम्मत कोठारी, लक्ष्मीनारायण पांडे, राजेन्द्र धारकर, शीलकुमार निगम, रतन पाटौदी, सरदार शेर सिंह, अनिल त्रिवेदी, मोहन ठाकोनिया, दिनकरराव खंमाटे, कन्हैयालाल डुंगरवाल, संतोष गावंडे आदि बड़ी संख्या में मीसा बंदी मालवांचल व इन्दौर संभाग के समाजवादी पार्टी व जनसंघ के प्रमुखजन बंद थे।

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