सांसों के झूले में शांति की खुशबू : मनुष्य के जीवन में धन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। धन जीवन की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है, लेकिन जब धन साधन न रहकर जीवन का लक्ष्य बन जाता है, तब वही धन मनुष्य की अशांति का कारण बनने लगता है। इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है और मनुष्य जीवनभर इसी दौड़ में लगा रहता है।
इसी सत्य को समझाने वाली एक प्रेरक घटना है।
एक सच्चे गुरु के देश-विदेश में लाखों अनुयायी थे। अनेक स्थानों पर भव्य आश्रम और आध्यात्मिक केंद्र स्थापित थे। श्रद्धालु तन, मन और धन से निस्वार्थ भाव से सेवा करते थे। लेकिन आश्रम की प्रबंधन समिति में धन जुटाने की लालसा इतनी बढ़ गई थी कि कितना भी धन प्राप्त हो, उन्हें संतोष नहीं होता था।
केंद्र के इंचार्ज महोदय भी कुछ सज्जनों के साथ अक्सर धन एकत्र करने के उद्देश्य से विभिन्न स्थानों की यात्रा करते रहते थे। एक दिन घूमते-घूमते वे एक अत्यंत साधारण साध्वी बहन की छोटी-सी कुटिया में पहुंच गए।
वह साध्वी बहन भौतिक सुविधाओं से दूर, स्वयं को जानने और परमात्मा का अनुभव करने के लिए पूरी निष्ठा से साधना में लीन रहती थीं। उनकी कुटिया बेहद साधारण थी। वहां न आधुनिक सुविधाएं थीं, न आरामदायक बिस्तर और न ही किसी प्रकार का वैभव।
संयोग से उस दिन रात हो गई। ऊपर से बरसात का मौसम था, इसलिए इंचार्ज महोदय को रात वहीं रुकना पड़ा।
साध्वी बहन ने श्रद्धापूर्वक उनके लिए भोजन बनाया। भोजन के बाद उन्होंने एक तख्त पर साफ-सुथरा बिछौना बिछाया और तकिया रख दिया। स्वयं उन्होंने जमीन पर एक साधारण-सा टाट बिछाया और उसी पर सो गईं।
कुछ ही देर में साध्वी बहन गहरी नींद में चली गईं, लेकिन इंचार्ज महोदय की आंखों से नींद कोसों दूर थी।
वे हमेशा मोटे, मुलायम और आरामदायक गद्दों पर सोने के अभ्यस्त थे। उस रात तख्त पर बिछे साधारण बिछौने पर उन्हें आराम नहीं मिल रहा था। वे करवटें बदलते रहे।
उनके मन में एक प्रश्न बार-बार उठने लगा—“मैं आरामदायक बिछौने पर होते हुए भी सो नहीं पा रहा हूं, जबकि यह साध्वी बहन जमीन पर टाट बिछाकर इतनी गहरी नींद में कैसे सो रही हैं?”
यह सवाल पूरी रात उनके मन को मथता रहा।
सुबह साध्वी बहन जल्दी उठीं। उन्होंने कुटिया की सफाई की, स्नान किया, ध्यान-साधना की और फिर चिड़ियों को दाना खिलाया। उनकी दिनचर्या में वही सहजता और शांति थी, जो पिछली रात उनके चेहरे पर दिखाई दे रही थी।
इंचार्ज महोदय से आखिर रहा नहीं गया। उन्होंने पूछा—
“बहन, मैंने आपके यहां रात को देखा कि आपने मेरे लिए अच्छा बिछौना बिछाया, फिर भी मुझे नींद नहीं आई। जबकि आप जमीन पर टाट बिछाकर इतनी गहरी नींद में सो गईं। ऐसा क्यों?”
साध्वी बहन ने सहज मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“आदरणीय भाई जी, जब मैं सोने जाती हूं तो अपने श्वासों के झूले में बैठकर स्वयं को हृदय में विराजमान परमात्मा के चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित कर देती हूं। मेरे श्वासों का झूला मुझे भीतर के उस लोक में ले जाता है, जहां परमानंद का अनुभव होता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“उस अवस्था में मुझे यह भी पता नहीं रहता कि मेरी पीठ के नीचे मुलायम गद्दा है या साधारण टाट। उस क्षण मैं शरीर, मन और बुद्धि की सीमाओं से परे चली जाती हूं। ध्यान में मिलने वाला आनंद इतना गहरा होता है कि मैं अपना सब कुछ भूल जाती हूं। ऐसा लगता है जैसे परमात्मा की गोद में बैठकर शांति की खुशबू का आनंद ले रही हूं।”
साध्वी के ये सरल शब्द इंचार्ज महोदय के भीतर तक उतर गए।
उन्हें पहली बार अनुभव हुआ कि जिस शांति की तलाश में वे वर्षों से धन जुटाने की दौड़ में लगे हुए थे, वह शांति धन, वैभव और भव्य आश्रमों में नहीं थी।
उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया—
“यदि सुख केवल सुविधाओं में होता, तो आज मैं आरामदायक बिस्तर पर बेचैन क्यों हूं और यह साध्वी बहन टाट पर भी इतनी शांत क्यों है?”
उन्हें अपने जीवन की दिशा का एहसास हुआ।
उन्होंने समझा कि बाहर की सुविधाएं शरीर को आराम दे सकती हैं, लेकिन मन को शांति नहीं दे सकतीं। मन की वास्तविक शांति भीतर की यात्रा से आती है। धन से साधन खरीदे जा सकते हैं, लेकिन संतोष नहीं। भव्य भवन बनाए जा सकते हैं, लेकिन भीतर का सुकून नहीं खरीदा जा सकता।
उस दिन इंचार्ज महोदय के जीवन में एक नया मोड़ आया। उन्होंने धन एकत्र करने की अंधी दौड़ को जीवन का लक्ष्य मानना छोड़ दिया और ध्यान-साधना के प्रति स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लिया।
उन्होंने समझ लिया कि परमशांति बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर की चेतना में छिपी है।
जब मनुष्य अपने श्वासों को सजगता से अनुभव करता है, मन को शांत करता है और स्वयं को परमात्मा के प्रति समर्पित करता है, तब धीरे-धीरे उसे उस आनंद का अनुभव होने लगता है, जिसे बाहरी संसार की कोई वस्तु नहीं दे सकती।
वास्तविक समृद्धि धन की अधिकता में नहीं, बल्कि मन की शांति में है।
कभी-कभी जीवन में हमें बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होती। जिस शांति की हम तलाश में संसार भर में भटकते हैं, वह हमारे भीतर ही मौजूद होती है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम कुछ क्षण रुकें, अपनी सांसों को महसूस करें और भीतर की ओर यात्रा शुरू करें।
संजय राय एक प्रेरणादायी चिंतक, शांति संदेशवाहक और समाज हितैषी लेखक हैं।