इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, ‘चमार’ शब्द पर साफ आदेश

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के लिए केवल जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल कर देना अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध साबित नहीं करता। अदालत के अनुसार, यह भी स्पष्ट होना जरूरी है […]

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  • August 22, 2026 6:33 am IST, Published 20 minutes ago

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के लिए केवल जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल कर देना अपने आप में SC/ST एक्ट के तहत अपराध साबित नहीं करता। अदालत के अनुसार, यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि कथित शब्द का इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से किया गया था।

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे मामले में सामने आई, जिसमें निचली अदालत ने दो लोगों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी किया था। हाईकोर्ट ने उपलब्ध सामग्री और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद निचली अदालत के समन आदेश को रद्द कर दिया।

केवल जातिसूचक शब्द बोलना पर्याप्त नहीं

अदालत ने स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट के तहत अपराध स्थापित करने के लिए सिर्फ इतना पर्याप्त नहीं है कि किसी बातचीत या घटना में जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल हुआ था। अभियोजन पक्ष को यह भी दिखाना होगा कि कथित शब्द का इस्तेमाल पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा से किया गया।

यानी किसी शब्द के इस्तेमाल को उसके संदर्भ, परिस्थिति और आरोपी की कथित मंशा के साथ देखा जाना आवश्यक है। अदालत ने इसी आधार पर कहा कि केवल किसी व्यक्ति को ‘चमार’ कहे जाने से स्वतः यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि SC/ST एक्ट के तहत अपराध के सभी जरूरी तत्व पूरे हो गए हैं।

क्या है पूरा मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के इज्जतनगर थाना क्षेत्र से जुड़ा बताया गया है। मामले में पहले एक एफआईआर दर्ज हुई थी। पुलिस जांच के बाद मुख्य आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया, जबकि उसके पिता वेगराज सिंह और बड़े भाई दौलत सिंह को जांच के दौरान आरोपों से बाहर रखा गया था।

बाद में मुकदमे की कार्यवाही के दौरान पीड़िता की ओर से आरोप लगाया गया कि वेगराज सिंह और दौलत सिंह ने उसके लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया था। इस आरोप के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने दोनों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी कर दिया।

निचली अदालत के इस आदेश को दोनों आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी ओर से दलील दी गई कि मामले के शुरुआती बयानों में उनके खिलाफ इस तरह की स्पष्ट भूमिका या आरोप मौजूद नहीं था।

पुराने बयानों में नहीं था स्पष्ट आरोप

हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि पीड़िता के पहले दर्ज बयानों में अपीलकर्ताओं के खिलाफ कथित जातिसूचक टिप्पणी से संबंधित कोई स्पष्ट और विशिष्ट आरोप नहीं था। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए माना कि केवल बाद में सामने आए आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को मुकदमे में शामिल करना पर्याप्त नहीं हो सकता।

अदालत ने यह भी देखा कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ ऐसी ठोस और विश्वसनीय सामग्री का अभाव था, जिससे यह संकेत मिले कि उन्होंने कथित अपराध में ऐसी भूमिका निभाई थी जिसके आधार पर उन्हें मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश में कानूनी त्रुटि मानी और उसे रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने मंशा को क्यों माना अहम?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आरोपी की कथित मंशा से जुड़ा है। अदालत ने संकेत दिया कि SC/ST एक्ट के प्रावधानों को लागू करने के लिए केवल शब्दों को अलग करके देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी जांचना होगा कि कथित टिप्पणी किस परिस्थिति में की गई, उसका उद्देश्य क्या था और क्या उसका इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर जानबूझकर अपमानित करने के लिए किया गया था।

इसका अर्थ यह नहीं है कि जातिसूचक अपमान को कानून के तहत संरक्षण प्राप्त है। बल्कि अदालत ने अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों को ठोस साक्ष्य के साथ साबित करने की जरूरत पर जोर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के Hardeep Singh बनाम State of Punjab मामले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में किसी व्यक्ति को मुकदमे के बीच आरोपी के रूप में शामिल करने की न्यायिक शक्ति के इस्तेमाल को लेकर सावधानी की आवश्यकता बताई गई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को बाद में मुकदमे का सामना करने के लिए बुलाने के लिए केवल प्रथम दृष्टया आरोप पर्याप्त नहीं माने जा सकते। इसके लिए रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और साक्ष्य की गंभीरता से जांच आवश्यक है।

निचली अदालत का समन आदेश हुआ रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने वेगराज सिंह और एक अन्य की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए बरेली की अदालत द्वारा 21 मार्च 2025 को जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट का संबंधित आदेश 13 अगस्त 2026 का बताया गया है।

अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश यह है कि किसी व्यक्ति को गंभीर आपराधिक मुकदमे का सामना कराने से पहले आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय सामग्री मौजूद होना जरूरी है। विशेष रूप से तब, जब किसी व्यक्ति को बाद की प्रक्रिया में आरोपी के रूप में शामिल किया जा रहा हो।

फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

यह फैसला SC/ST एक्ट के मामलों में आरोपों की न्यायिक जांच और साक्ष्य के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने एक ओर जहां जाति के आधार पर अपमान की मंशा को अपराध के आवश्यक तत्वों से जोड़कर देखा, वहीं दूसरी ओर किसी व्यक्ति को बिना पर्याप्त आधार के मुकदमे में शामिल करने से बचने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

हालांकि, इस फैसले को यह कहकर नहीं समझा जाना चाहिए कि जातिसूचक अपमान कानूनन अपराध नहीं है। यदि किसी मामले में यह साबित हो कि जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति को उसकी जाति के कारण सार्वजनिक रूप से अपमानित या नीचा दिखाने के उद्देश्य से किया गया था और कानून में निर्धारित अन्य आवश्यक तत्व भी मौजूद हैं, तो मामला अलग हो सकता है।

इसलिए हाईकोर्ट का फैसला मूल रूप से शब्द के मात्र इस्तेमाल और जाति के आधार पर जानबूझकर किए गए अपमान के बीच कानूनी अंतर को रेखांकित करता है। मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जाएगा।

निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी SC/ST एक्ट से जुड़े मामलों में मंशा, परिस्थितियों और ठोस साक्ष्य की भूमिका को सामने लाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जातिसूचक शब्द का उल्लेख अपने आप में अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है; यह साबित करना भी जरूरी है कि उसका इस्तेमाल जाति के आधार पर अपमानित करने की मंशा से किया गया था।

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