लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समान नागरिक संहिता (UCC) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर बड़ा राजनीतिक संकेत दिया है। वायरल समाचार पोस्ट में दिए गए बयान के अनुसार, उन्होंने कहा है कि यदि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार तीसरी बार बनती है, तो राज्य में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में नई बहस छिड़ने की संभावना है।
अमित शाह का यह कथित बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक समीकरणों, चुनावी रणनीतियों और भाजपा की भविष्य की योजनाओं को लेकर चर्चाएं तेज हैं। समान नागरिक संहिता लंबे समय से भाजपा के प्रमुख वैचारिक और राजनीतिक मुद्दों में शामिल रही है। पार्टी का तर्क है कि देश में सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों में समान कानून होना चाहिए।
30 अक्टूबर 2026 को लखनऊ में आयोजित भाजपा उत्तर प्रदेश प्रदेश कार्यसमिति की बैठक को संबोधित करते हुए अमित शाह ने पार्टी कार्यकर्ताओं से आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में पूरी ताकत से जुटने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने के लिए संगठन के प्रत्येक कार्यकर्ता को सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
अमित शाह ने कार्यकर्ताओं से कहा कि आपसी नाराजगी, मतभेद और निराशा को पीछे छोड़कर पार्टी के लक्ष्य के लिए एकजुट होकर काम करें। उन्होंने संगठन की मजबूती को भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि चुनाव जीतने के लिए केवल सरकार की उपलब्धियां पर्याप्त नहीं होतीं, बल्कि कार्यकर्ताओं का परिश्रम और जनता से सीधा संवाद भी महत्वपूर्ण होता है।
उनके संबोधन का मुख्य केंद्र 2027 का विधानसभा चुनाव रहा। उन्होंने कार्यकर्ताओं को अर्जुन की तरह लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश दिया। उनके अनुसार, पार्टी को बूथ स्तर तक अपनी सक्रियता बढ़ानी होगी और सरकार की योजनाओं तथा उपलब्धियों को आम जनता तक पहुंचाना होगा।
समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) भारत में लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। इसका मूल उद्देश्य व्यक्तिगत नागरिक मामलों से जुड़े कानूनों में समानता स्थापित करना है।
वर्तमान में देश के अलग-अलग समुदायों में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों से संबंधित कुछ नियम अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के तहत संचालित होते हैं। समान नागरिक संहिता लागू होने की स्थिति में इन विषयों पर धर्म या समुदाय के आधार पर अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाओं के स्थान पर एक समान कानूनी ढांचा तैयार करने का प्रयास किया जाएगा।
अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि कई राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू की जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी भाजपा की तीसरी सरकार बनने पर इसे लागू करने की बात कहकर उन्होंने पार्टी के चुनावी एजेंडे में इस मुद्दे को प्रमुखता से सामने रखा है।
इस घोषणा के बाद यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि उत्तर प्रदेश में यूसीसी का संभावित प्रारूप क्या होगा, किन विषयों को इसके दायरे में शामिल किया जाएगा और इसे लागू करने से पहले किस प्रकार की कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। यह प्रावधान संविधान के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है।
नीति निदेशक तत्व सरकारों को सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा में नीतियां बनाने के लिए मार्गदर्शन देते हैं। हालांकि, ये प्रावधान अपने आप में अदालत के माध्यम से सीधे लागू नहीं कराए जा सकते।
यूसीसी का उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों में एकरूपता लाना है। इसके समर्थकों का मानना है कि इससे कानून के सामने समानता और महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिल सकती है। वहीं, इसके आलोचक धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और विभिन्न समुदायों की परंपराओं से जुड़े सवाल उठाते रहे हैं।
इसी वजह से समान नागरिक संहिता को लागू करने से पहले व्यापक विचार-विमर्श, कानूनी स्पष्टता और विभिन्न सामाजिक वर्गों की चिंताओं को समझना महत्वपूर्ण माना जाता है।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यहां होने वाले विधानसभा चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने अभी से अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है।
अमित शाह का यूसीसी संबंधी बयान इस बात का संकेत देता है कि भाजपा आगामी चुनाव में विकास, कानून-व्यवस्था और संगठनात्मक मजबूती के साथ-साथ समान नागरिक संहिता जैसे वैचारिक मुद्दों को भी प्रमुखता दे सकती है।
राज्य में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। ऐसे में यूसीसी को चुनावी घोषणा से जोड़ना पार्टी के समर्थकों के बीच एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, इस मुद्दे पर प्रदेश के मतदाताओं की प्रतिक्रिया कैसी रहती है, यह आने वाले समय में राजनीतिक बहस और चुनावी प्रचार के दौरान स्पष्ट होगा।
बैठक के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के कामकाज की भी प्रशंसा की। उन्होंने प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार और निवेश के बढ़ते अवसरों का उल्लेख किया।
अमित शाह ने कहा कि योगी सरकार ने कठोर प्रशासनिक व्यवस्था के माध्यम से प्रदेश में अपराध और माफिया गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में काम किया है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में निवेश और विकास से जुड़ी गतिविधियों को भी सरकार की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया।
भाजपा नेतृत्व का मानना है कि प्रदेश में बेहतर कानून-व्यवस्था, आधारभूत ढांचे का विकास, एक्सप्रेसवे, सड़क, बिजली और औद्योगिक निवेश जैसे विषय आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
शाह ने कार्यकर्ताओं से सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने और विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों का तथ्यों के आधार पर जवाब देने का भी संदेश दिया।
अपने संबोधन में अमित शाह ने समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने विपक्षी नेताओं के चुनावी दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा उत्तर प्रदेश में दोबारा सरकार बनाने जा रही है।
उन्होंने अखिलेश यादव को संबोधित करते हुए दावा किया कि समाजवादी पार्टी अगले 30 वर्षों तक प्रदेश में सरकार नहीं बना पाएगी। यह बयान आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव को और तेज कर सकता है।
वोट चोरी के आरोपों पर भी अमित शाह ने विपक्ष को संसद में चर्चा की चुनौती दी। उन्होंने कहा कि भाजपा इन आरोपों पर चर्चा करने और सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है। उन्होंने विपक्ष से विशेष सत्र बुलाकर इस विषय पर चर्चा करने की बात कही।
इस दौरान उन्होंने विपक्ष पर चुनावी हार के बाद चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने का आरोप भी लगाया। उनके इस बयान से स्पष्ट है कि भाजपा आगामी चुनाव में विपक्ष के आरोपों को भी अपने राजनीतिक जवाब का हिस्सा बनाने की तैयारी में है।
अमित शाह के बयान के बाद विपक्ष की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यूसीसी लागू करने की घोषणा पर तंज कसते हुए कहा कि बड़ी देर कर दी, मेहरबां आते-आते।
विपक्ष की इस प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। जहां भाजपा इसे समानता और एकरूपता से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसके समय, उद्देश्य और संभावित प्रभावों को लेकर सवाल उठा सकता है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता वाले राज्य में यूसीसी लागू करना केवल राजनीतिक घोषणा का विषय नहीं होगा। इसके लिए विस्तृत कानूनी प्रारूप तैयार करना, संबंधित पक्षों की राय लेना और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप प्रक्रिया अपनाना भी जरूरी होगा।
इसलिए आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों, कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच चर्चा तेज होने की संभावना है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भाजपा ने अपना राजनीतिक एजेंडा स्पष्ट करना शुरू कर दिया है। अमित शाह का बयान पार्टी की आगामी रणनीति में समान नागरिक संहिता की अहमियत को दर्शाता है।
एक तरफ भाजपा सरकार अपनी विकास योजनाओं और कानून-व्यवस्था को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी तरफ यूसीसी जैसे मुद्दों को भी चुनावी चर्चा में शामिल किया जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा तीसरी बार सत्ता में वापसी करने में सफल होती है या नहीं और यदि ऐसा होता है तो समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए किस तरह का कानून और प्रक्रिया सामने आती है।
फिलहाल अमित शाह की इस घोषणा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस शुरू कर दी है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में यूसीसी कितना प्रभावशाली मुद्दा साबित होगा, इसका फैसला आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम और मतदाताओं के रुख से तय होगा।