अपहरण की फर्जी एफआईआर रद्द, हाईकोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दो बालिग व्यक्तियों की स्वेच्छा से हुई शादी के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए भदोही के पुलिस अधीक्षक (SP) और संबंधित थाना प्रभारी (SHO) पर जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बालिग महिला की इच्छा के विरुद्ध पुलिस या परिवार किसी भी […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • July 29, 2026 1:45 pm IST, Published 1 hour ago

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दो बालिग व्यक्तियों की स्वेच्छा से हुई शादी के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए भदोही के पुलिस अधीक्षक (SP) और संबंधित थाना प्रभारी (SHO) पर जुर्माना लगाया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बालिग महिला की इच्छा के विरुद्ध पुलिस या परिवार किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकते। न्यायालय ने मामले में दर्ज अपहरण की एफआईआर को निरस्त करते हुए इसे आपराधिक कानून के दुरुपयोग का उदाहरण बताया।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि जब एक बालिग महिला स्वयं अदालत के समक्ष उपस्थित होकर यह स्पष्ट कर चुकी है कि उसने अपनी इच्छा से विवाह किया है और वह अपने पति के साथ रहना चाहती है, तब पुलिस द्वारा अपहरण के मामले की जांच जारी रखना पूरी तरह अनुचित और कानून के विरुद्ध है। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में पुलिस की भूमिका निष्पक्ष जांच तक सीमित होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करने की।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि पुलिस का दायित्व अपराधों की जांच करना है, न कि दो बालिग व्यक्तियों के वैवाहिक जीवन में दखल देना। न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पुलिस “नोज़ी पार्कर” यानी अनावश्यक हस्तक्षेप करने वाली संस्था की तरह व्यवहार नहीं कर सकती।

कोर्ट ने भदोही के पुलिस अधीक्षक और संबंधित एसएचओ पर संयुक्त रूप से ₹1,000 का जुर्माना लगाया। साथ ही, लड़की के पिता पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया गया, क्योंकि उनके द्वारा दर्ज कराई गई अपहरण की शिकायत तथ्यों के अनुरूप नहीं पाई गई। अदालत ने माना कि इस प्रकार की झूठी शिकायतें न केवल न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करती हैं, बल्कि पुलिस और न्यायालय का समय भी व्यर्थ करती हैं।

न्यायालय ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक बालिग नागरिक को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। ऐसे मामलों में यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से विवाह करता है, तो परिवार या प्रशासन उसकी स्वतंत्रता में बाधा नहीं डाल सकते।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल परिवार की असहमति या सामाजिक दबाव के आधार पर किसी बालिग महिला की स्वतंत्र इच्छा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि महिला स्वयं अदालत या सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपनी इच्छा स्पष्ट कर देती है, तो पुलिस को उसी के अनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा, जहां बालिग जोड़ों के विवाह के बाद परिवार की शिकायत पर अपहरण या अन्य आपराधिक धाराओं में मुकदमे दर्ज करा दिए जाते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसी कार्रवाई संविधान में प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि पुलिस और प्रशासन को संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करते हुए निष्पक्ष और कानूनसम्मत कार्रवाई करनी होगी।

 

Advertisement