लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस की विवेचना प्रक्रिया को लेकर डीजीपी राजीव कृष्ण ने सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब विवेचना के दौरान गवाहों के बयानों को उनकी कही गई बात से अलग तरीके से दर्ज करने या बयान में मनमाने ढंग से शब्द जोड़ने की गुंजाइश नहीं होगी। डीजीपी ने स्पष्ट किया है कि गवाह अपनी भाषा और शब्दों में जो बात बताएगा, विवेचक को उसी रूप में उसका बयान दर्ज करना होगा। यह निर्देश ऐसे समय आया है जब विवेचना की पारदर्शिता और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज बयानों की विश्वसनीयता को लेकर न्यायिक स्तर पर भी सवाल उठे हैं।
गवाह के बयान में एक शब्द भी नहीं बदलेगा
डीजीपी के निर्देश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गवाहों के बयान से जुड़ा है। अब पुलिसकर्मी या विवेचक गवाह द्वारा बताई गई बात को अपनी सुविधा के अनुसार बदल नहीं सकेंगे। बयान में गवाह ने जिस भाषा में अपनी बात रखी है, उसे उसी अर्थ और स्वरूप में दर्ज करने पर जोर दिया गया है।
इसका उद्देश्य विवेचना के दौरान होने वाली संभावित गड़बड़ियों को रोकना है। किसी आपराधिक मामले में गवाह का बयान जांच की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में बयान के शब्दों में बदलाव होने से मामले की पूरी तस्वीर प्रभावित हो सकती है। डीजीपी के नए निर्देश को पुलिस विवेचना में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद आया निर्देश
यह पूरा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 जुलाई 2026 के आदेश से जुड़ा है। कोर्ट के सामने एक मामले की सुनवाई के दौरान पीड़ित और उसकी पत्नी के ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डेड बयानों तथा विवेचना में दर्ज कथनों के बीच अंतर सामने आया था। कोर्ट ने पाया कि वास्तविक कथनों के बजाय विवेचक की ओर से कुछ बातें जोड़ दी गई थीं। न्यायालय ने इस प्रक्रिया को उचित नहीं माना और डीजीपी को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने को कहा था।
इसके बाद डीजीपी स्तर से प्रदेश के पुलिस अधिकारियों और विवेचकों को निर्देश जारी किए गए हैं। इसका सीधा असर थानों में होने वाली आपराधिक मामलों की जांच और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया पर पड़ेगा।
आरोपी से जुड़े सवाल पूछने में भी सावधानी
निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि विवेचना के दौरान आरोपी के खिलाफ आरोप गढ़ने या उसे दोषी साबित करने की मानसिकता से सवाल पूछने की प्रक्रिया से बचना होगा। जांच का उद्देश्य तथ्यों को सामने लाना होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति के खिलाफ पहले से तय निष्कर्ष को सही साबित करना।
इस व्यवस्था से पुलिस विवेचना में निष्पक्षता बनाए रखने पर जोर दिया गया है। गवाह से मिली जानकारी, उपलब्ध साक्ष्य और अन्य तथ्यों के आधार पर ही जांच को आगे बढ़ाने की अपेक्षा की गई है।
डिजिटल साक्ष्यों पर भी डीजीपी का जोर
डीजीपी राजीव कृष्ण ने केवल गवाहों के बयान तक ही निर्देश सीमित नहीं रखे हैं। विवेचना में डिजिटल साक्ष्यों के इस्तेमाल को लेकर भी पुलिसकर्मियों को दिशा-निर्देश दिए गए हैं। तलाशी, जब्ती, निरीक्षण और अन्य कार्रवाई के दौरान तैयार किए गए डिजिटल साक्ष्यों को ई-साक्ष्य एप पर अपलोड करने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। आवश्यकता के अनुसार इन डिजिटल साक्ष्यों को एफआईआर से लिंक करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
आज के दौर में मोबाइल वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, ऑडियो रिकॉर्डिंग, फोटो और अन्य डिजिटल सामग्री आपराधिक जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में इन साक्ष्यों को सुरक्षित तरीके से रिकॉर्ड करना और जांच के दौरान उनका उचित इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है।
सात साल या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में फॉरेंसिक जांच
डीजीपी के निर्देशों में गंभीर अपराधों की वैज्ञानिक जांच पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। जिन अपराधों में सात वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, उनमें घटनास्थल का फॉरेंसिक विशेषज्ञों से निरीक्षण कराना अनिवार्य होगा।
घटनास्थल की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। इससे जांच के दौरान जुटाए गए भौतिक और वैज्ञानिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। साथ ही अदालत में साक्ष्य पेश करते समय पुलिस के पास घटनास्थल की प्रक्रिया का बेहतर रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
पुलिसकर्मियों के लिए कार्यशालाएं होंगी
डीजीपी ने इन नए निर्देशों को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए पुलिसकर्मियों और विवेचकों के प्रशिक्षण पर भी जोर दिया है। थानों में काम करने वाले विवेचकों और पुलिसकर्मियों के लिए कार्यशालाएं आयोजित कराने के निर्देश दिए गए हैं।
इन कार्यशालाओं में आपराधिक कानून, बयान दर्ज करने की सही प्रक्रिया, डिजिटल साक्ष्यों के इस्तेमाल और विवेचना के दौरान अपनाई जाने वाली कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी दी जाएगी। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि नियम केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीनी स्तर पर भी उनका पालन हो।
पासपोर्ट सत्यापन में भी सख्ती
पासपोर्ट सत्यापन को लेकर भी पुलिसकर्मियों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस सत्यापन के दौरान आवेदक से संबंधित उपलब्ध रिकॉर्ड और जानकारी की सही तरीके से जांच करने पर जोर है।
उत्तर प्रदेश पुलिस पहले भी पासपोर्ट सत्यापन प्रक्रिया में रिकॉर्ड की पूरी जानकारी के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने और विदेश मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए निर्देश जारी कर चुकी है। पुलिस के आधिकारिक परिपत्र में भी पासपोर्ट आवेदन के सत्यापन में थाने के रिकॉर्ड में उपलब्ध सभी सूचनाओं के आधार पर संस्तुति दर्ज करने और पूरी सतर्कता बरतने की बात कही गई है।
ताजा निर्देशों के बाद पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। यदि किसी आवेदक के खिलाफ कोई आपराधिक मामला या महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उपलब्ध है, तो उसे छिपाने के बजाय नियमानुसार सत्यापन रिपोर्ट में शामिल करना होगा।
विवेचना में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश
डीजीपी के इन निर्देशों का व्यापक उद्देश्य पुलिस विवेचना को अधिक पारदर्शी, वैज्ञानिक और जवाबदेह बनाना है। गवाह के बयान से लेकर डिजिटल साक्ष्य और फॉरेंसिक जांच तक हर चरण में रिकॉर्ड को मजबूत बनाने पर जोर दिया गया है।
पुलिस जांच में छोटी सी प्रक्रिया संबंधी गलती भी अदालत में पूरे मामले को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में गवाह के वास्तविक बयान को सुरक्षित रखना, डिजिटल साक्ष्यों का उचित रिकॉर्ड तैयार करना और गंभीर मामलों में वैज्ञानिक जांच कराना न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
कुल मिलाकर, यूपी पुलिस में जारी यह निर्देश विवेचना के पुराने तरीकों में बदलाव का संकेत देता है। अब जांच अधिकारियों से अपेक्षा की गई है कि वे तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच करें। गवाह के बयान में मनमानी, डिजिटल साक्ष्यों की अनदेखी और गंभीर अपराधों में फॉरेंसिक प्रक्रिया से बचने जैसी स्थितियों पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है। आने वाले समय में इन निर्देशों के पालन की निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी।