UPPCL प्रबंधन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज:इलाहाबाद हाई कोर्ट

याचिका में यूपी पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया गया था। याची की ओर से इस नियुक्ति को अवैध बताते हुए अधिकार-पृच्छा रिट जारी करने का अनुरोध किया गया। इसके साथ ही कंपनी में स्वतंत्र निदेशक और कंपनी सेक्रेटरी की नियुक्ति किए जाने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी

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  • September 22, 2026 6:40 pm IST, Published 39 minutes ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के प्रबंधन, बोर्ड की संरचना तथा चेयरमैन की नियुक्ति से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर दाखिल जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि याचिका में जिन राहतों की मांग की गई है, उनके पीछे वास्तविक और ठोस जनहित स्थापित नहीं किया जा सका। कोर्ट के मुताबिक, याचिका की पूरी कवायद अकादमिक प्रकृति की प्रतीत होती है।

यह आदेश मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने अधिवक्ता विजय प्रताप सिंह की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में बिजली क्षेत्र की इन दोनों कंपनियों के प्रशासनिक और प्रबंधकीय ढांचे को लेकर कई सवाल उठाए गए थे। याची ने कंपनियों के कामकाज में व्यावसायिक दृष्टिकोण अपनाने और बोर्ड में तकनीकी रूप से योग्य लोगों की नियुक्ति किए जाने की मांग की थी।

याचिका में कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 104 और यूपीपीसीएल के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुच्छेद 42 का हवाला देते हुए कॉरपोरेशन में चेयरमैन के पद को समाप्त करने की मांग भी की गई थी। इसके अलावा 30 सितंबर 2024 को हुई वार्षिक आम बैठक के दौरान आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में किए गए कुछ संशोधनों को भी चुनौती दी गई थी। याची ने अनुच्छेद 32(i)(बी) और (सी) में किए गए संशोधनों को अवैध घोषित करने की मांग अदालत के समक्ष रखी थी।

याचिका में यूपी पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया गया था। याची की ओर से इस नियुक्ति को अवैध बताते हुए अधिकार-पृच्छा रिट जारी करने का अनुरोध किया गया। इसके साथ ही कंपनी में स्वतंत्र निदेशक और कंपनी सेक्रेटरी की नियुक्ति किए जाने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी।

याची का मुख्य तर्क था कि बिजली कंपनियों के प्रबंधन और बोर्ड के गठन में सुधार होने से आम उपभोक्ताओं, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को लाभ मिल सकता है। याचिका में दावा किया गया कि यदि मांगी गई राहतें स्वीकार कर ली जाती हैं तो गरीब उपभोक्ताओं को उचित दर पर बिजली उपलब्ध कराने की दिशा में मदद मिल सकती है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने याचिका के तथ्यों और उसमें मांगी गई राहतों का परीक्षण करने के बाद इस दावे को पर्याप्त नहीं माना। अदालत ने कहा कि याचिका में गरीब उपभोक्ताओं और सस्ती बिजली की बात सामान्य रूप से कही गई है, लेकिन यह स्पष्ट करने के लिए कोई ठोस तथ्य या विवरण नहीं दिया गया कि प्रस्तावित बदलावों से वास्तव में बिजली की कीमतों पर किस तरह असर पड़ेगा या गरीब उपभोक्ताओं को सीधा लाभ कैसे मिलेगा।

अदालत ने चेयरमैन की नियुक्ति को चुनौती दिए जाने के तरीके पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जिस नियुक्ति को चुनौती दी गई है, उससे संबंधित नियुक्ति आदेश तक याचिका के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, किसी नियुक्ति को कानूनी चुनौती देने के लिए संबंधित आदेश या दस्तावेज का रिकॉर्ड पर होना बुनियादी आवश्यकता है।

खंडपीठ ने इन परिस्थितियों को देखते हुए माना कि याचिका में वास्तविक जनहित का पर्याप्त आधार सामने नहीं आया है। कोर्ट ने कहा कि केवल व्यापक और सामान्य दावे किसी मामले को जनहित याचिका का स्वरूप देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। याचिका में मांगी गई राहतों और कथित जनहित के बीच ठोस संबंध स्थापित होना जरूरी है।

इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले से यूपीपीसीएल और पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के मौजूदा प्रबंधन तथा चेयरमैन की नियुक्ति को चुनौती देने वाली इस याचिका पर न्यायिक प्रक्रिया फिलहाल समाप्त हो गई है।

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