लखनऊ। घर में पीने के पानी की शुद्धता को लेकर अक्सर लोग सबसे पहले TDS यानी Total Dissolved Solids की जांच करते हैं। RO मशीन खरीदते समय भी TDS का आंकड़ा एक अहम पैमाना माना जाता है। आम धारणा है कि पानी का TDS जितना कम होगा, पानी उतना ही बेहतर और सुरक्षित होगा। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। बहुत कम TDS वाला पानी जरूरी खनिजों की मात्रा कम होने का संकेत दे सकता है, जबकि अत्यधिक TDS वाला पानी स्वाद और गुणवत्ता से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है।
सोशल मीडिया और कई रिपोर्टों में पानी के TDS को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि TDS अकेले पानी के पीने योग्य होने या न होने का अंतिम पैमाना नहीं है।
आखिर TDS होता क्या है?
TDS का मतलब Total Dissolved Solids यानी पानी में घुले हुए कुल ठोस पदार्थों से है। इनमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम और अन्य घुले हुए खनिज तथा लवण शामिल हो सकते हैं।
RO मशीन पानी से कई प्रकार के घुले पदार्थों को कम कर देती है। इसी वजह से RO से निकलने वाले पानी का TDS सामान्य नल या भूजल की तुलना में काफी कम हो सकता है।
यही कारण है कि कई घरों में लोग पानी की गुणवत्ता का अंदाजा केवल RO मशीन पर दिखाई देने वाले TDS नंबर से लगाने लगे हैं।
क्या 50 से कम TDS वाला पानी खराब है?
यहीं सबसे ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। सिर्फ TDS 50 ppm से कम होने के आधार पर किसी पानी को बीमारियां पैदा करने वाला या असुरक्षित घोषित करना सही नहीं होगा।
कम TDS का मतलब आम तौर पर यह हो सकता है कि पानी में घुले खनिजों की मात्रा कम है। लेकिन पानी सुरक्षित है या नहीं, यह तय करने के लिए केवल TDS पर्याप्त नहीं है। पानी में बैक्टीरिया, वायरस, नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक, सीसा या अन्य दूषित पदार्थों की मौजूदगी भी जांच का विषय है।
इसलिए किसी परिवार के लिए पीने के पानी का सही मूल्यांकन समग्र जल गुणवत्ता जांच के आधार पर किया जाना चाहिए।
50 से 150 TDS के पानी को लेकर क्या समझें?
आम तौर पर कम से मध्यम TDS वाला पानी स्वाद की दृष्टि से स्वीकार्य हो सकता है। लेकिन यहां भी केवल TDS देखकर पानी को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना उचित नहीं है।
अगर पानी का स्रोत सुरक्षित है और उसकी माइक्रोबायोलॉजिकल तथा रासायनिक जांच ठीक है, तो कम TDS अपने आप में समस्या नहीं माना जा सकता।
दूसरी तरफ, यदि पानी का TDS कम है लेकिन उसमें किसी हानिकारक रसायन या सूक्ष्मजीव की मौजूदगी है, तो कम TDS होने के बावजूद पानी पीने के लिए सुरक्षित नहीं होगा।
150 से 300 TDS को लेकर क्या स्थिति है?
इस दायरे में आने वाला पानी कई परिस्थितियों में सामान्य पेयजल के रूप में स्वीकार्य हो सकता है। इसका स्वाद भी बहुत अधिक बदला हुआ महसूस नहीं होता।
हालांकि पानी की वास्तविक गुणवत्ता जानने के लिए स्रोत और स्थानीय जल गुणवत्ता दोनों को देखना जरूरी है। अलग-अलग क्षेत्रों में भूजल की प्रकृति अलग हो सकती है। इसलिए किसी एक TDS नंबर को हर जगह लागू करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
300 से 500 TDS का पानी कैसा माना जाए?
जैसे-जैसे TDS बढ़ता है, पानी के स्वाद में बदलाव महसूस हो सकता है। पानी कुछ लोगों को अधिक खारा या भारी लग सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि 300 या 500 TDS वाला हर पानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
पानी में कौन-कौन से घुले पदार्थ हैं, यह TDS की कुल संख्या से पता नहीं चलता। उदाहरण के लिए समान TDS वाले दो पानी के नमूनों में मौजूद खनिज या रसायन अलग-अलग हो सकते हैं।
इसलिए जरूरत पड़ने पर लैब टेस्ट कराना अधिक उपयोगी तरीका है।
500 से ज्यादा TDS पर क्यों बढ़ती है चिंता?
बहुत अधिक TDS वाला पानी अक्सर स्वाद की समस्या पैदा कर सकता है। इसमें घुले खनिज और लवण अधिक मात्रा में हो सकते हैं। ऐसे पानी की गुणवत्ता का विस्तृत परीक्षण जरूरी हो सकता है।
खासकर यदि पानी का स्रोत भूजल है और इलाके में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट या अन्य रासायनिक प्रदूषण की आशंका है, तो केवल TDS मीटर पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
TDS मीटर यह नहीं बताता कि पानी में कौन सा पदार्थ कितना मौजूद है। यह मुख्य रूप से कुल घुले पदार्थों का अनुमान देता है।
RO पानी को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी
RO का उद्देश्य पानी से अवांछित घुले पदार्थों को कम करना है। लेकिन यदि किसी इलाके में पहले से ही कम TDS वाला और सुरक्षित पानी उपलब्ध है, तो हर घर में RO लगाना जरूरी नहीं हो सकता।
RO प्रक्रिया में उपयोगी खनिजों की मात्रा भी कम हो सकती है। इसलिए RO सिस्टम का चुनाव पानी की वास्तविक गुणवत्ता और स्थानीय जल परीक्षण के आधार पर करना बेहतर है।
सिर्फ यह सोचकर कि “TDS जितना कम, पानी उतना शुद्ध”, मशीन का आउटपुट बहुत नीचे तक ले जाना हमेशा जरूरी नहीं है।
क्या सिर्फ TDS मीटर से पानी की जांच हो सकती है?
नहीं। TDS मीटर घरेलू स्तर पर एक उपयोगी संकेतक हो सकता है, लेकिन यह पूर्ण जल गुणवत्ता परीक्षण का विकल्प नहीं है।
पीने के पानी की सुरक्षा के लिए जरूरत के अनुसार pH, TDS, हार्डनेस, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आयरन, आर्सेनिक, भारी धातुओं और माइक्रोबायोलॉजिकल पैरामीटर की जांच की जा सकती है।
अगर पानी का स्वाद, गंध या रंग अचानक बदल जाए, तो केवल TDS देखकर उसे पीते रहना उचित नहीं है।
पानी पीने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
पानी के स्रोत की जानकारी रखें।
लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे बोरवेल या टैंक की समय-समय पर जांच कराएं।
RO का फिल्टर और मेंब्रेन समय पर बदलें।
सिर्फ TDS नंबर देखकर पानी को सुरक्षित न मानें।
पानी में बदबू, रंग या असामान्य स्वाद आने पर जांच कराएं।
बच्चों, बुजुर्गों और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करें।
निष्कर्ष
पानी के TDS को लेकर सबसे जरूरी बात यह है कि कम TDS हमेशा खराब और ज्यादा TDS हमेशा अच्छा नहीं होता। TDS पानी में मौजूद घुले पदार्थों की कुल मात्रा के बारे में जानकारी देता है, लेकिन यह नहीं बताता कि वे पदार्थ कौन-कौन से हैं।
इसलिए पानी को लेकर किसी वायरल दावे या केवल RO के TDS नंबर के आधार पर फैसला लेने के बजाय मान्य मानकों और लैब टेस्ट के आधार पर पानी की गुणवत्ता जांचना सबसे बेहतर तरीका है।
नोट: यह खबर उपलब्ध सामग्री और सामान्य जल-गुणवत्ता संबंधी जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। किसी विशेष क्षेत्र के पानी को पीने योग्य या अनुपयुक्त घोषित करने के लिए स्थानीय जल गुणवत्ता परीक्षण जरूरी है।