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यूरोपीय संसद में भारत-ईयू व्यापार परिषद ने उठाए स्थिरता, EUDR अनुपालन और वैश्विक सहयोग के मुद्दे

ब्रुसेल्स, बेल्जियम : ब्रुसेल्स स्थित यूरोपीय संसद में आयोजित 7वें यूरोप इंडिया सेंटर फॉर बिजनेस एंड इंडस्ट्री (EICBI) सम्मेलन में भारत-यूरोपीय संघ (EU) संबंधों, सतत व्यापार, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक सहयोग के भविष्य पर व्यापक चर्चा हुई। इस प्रतिष्ठित सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, यूरोपीय संसद सदस्यों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, स्थिरता विशेषज्ञों और व्यापार संगठनों ने […]

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  • June 16, 2026 2:45 pm IST, Published 1 hour ago

ब्रुसेल्स, बेल्जियम : ब्रुसेल्स स्थित यूरोपीय संसद में आयोजित 7वें यूरोप इंडिया सेंटर फॉर बिजनेस एंड इंडस्ट्री (EICBI) सम्मेलन में भारत-यूरोपीय संघ (EU) संबंधों, सतत व्यापार, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक सहयोग के भविष्य पर व्यापक चर्चा हुई। इस प्रतिष्ठित सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, यूरोपीय संसद सदस्यों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, स्थिरता विशेषज्ञों और व्यापार संगठनों ने भाग लिया।

सम्मेलन के प्रमुख वक्ताओं में इंडिया-ईयू ट्रेड काउंसिल के ट्रेड कमिश्नर अंकित जैन भी शामिल थे। उन्होंने “ड्राइविंग सस्टेनेबिलिटी: ईयू-इंडिया कोलैबोरेशन फॉर ए सस्टेनेबल फ्यूचर” विषय पर आयोजित उच्चस्तरीय पैनल चर्चा में भाग लेते हुए जलवायु परिवर्तन, स्थिरता, कागज एवं पैकेजिंग उद्योग तथा यूरोपीय संघ के वनों की कटाई रोकथाम विनियमन (EUDR) के प्रभावों पर अपने विचार साझा किए।

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जलवायु जागरूकता को बनाया जीवन का मिशन

अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए अंकित जैन ने कहा कि उनका व्यक्तिगत लक्ष्य बड़े पैमाने पर लोगों को जलवायु परिवर्तन और स्थिरता के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि मेरा जन्म 15 करोड़ लोगों को जलवायु परिवर्तन, स्थिरता और नेट-जीरो की दिशा में जागरूक करने के लिए हुआ है। स्थिरता को केवल सैद्धांतिक चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यावहारिक और प्रभावी समाधानों पर ध्यान देना चाहिए।”

जैन ने श्मशान घाटों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने, खाद्य अपशिष्ट से कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) उत्पादन, पुराने टायरों के पुनर्चक्रण और ग्रीनवॉशिंग जैसी चुनौतियों को भी प्रमुख मुद्दों के रूप में रेखांकित किया।

कागज उद्योग और वनों की कटाई को लेकर भ्रांतियों पर चर्चा

अंकित जैन ने कहा कि आमतौर पर यह धारणा बनाई जाती है कि कागज उत्पादन सीधे तौर पर वनों की कटाई का कारण बनता है, जबकि वास्तविकता अधिक जटिल है।

उन्होंने बताया कि भारत अपनी कागज और पैकेजिंग उद्योग की आवश्यकताओं के लिए यूरोप, ब्राजील, उत्तरी अमेरिका, वियतनाम सहित कई देशों से बड़ी मात्रा में पल्प आयात करता है। यदि यह पल्प कानूनी और सतत स्रोतों से प्राप्त माना जाता है, तो उससे निर्मित उत्पादों को भी उचित ट्रेसबिलिटी और दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर सतत माना जाना चाहिए।

EUDR अनुपालन में भारतीय उद्योग की चुनौतियां

जैन ने EUDR के उद्देश्यों का समर्थन करते हुए इसके कार्यान्वयन में भारतीय उद्योग के सामने आने वाली चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया।

उन्होंने कहा कि भारत का फाइबर इकोसिस्टम मुख्य रूप से एग्रोफॉरेस्ट्री और लाखों छोटे किसानों पर आधारित है। ऐसे में जियोलोकेशन मैपिंग, ट्रेसबिलिटी और ड्यू डिलिजेंस संबंधी आवश्यकताओं का पालन करना बड़े प्लांटेशन आधारित देशों की तुलना में अधिक जटिल हो जाता है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल FSC प्रमाणन प्राप्त कर लेना EUDR अनुपालन की गारंटी नहीं है। इसके लिए जियोलोकेशन डेटा, जोखिम मूल्यांकन और अतिरिक्त ड्यू डिलिजेंस जैसी आवश्यकताओं को भी पूरा करना पड़ता है।

बढ़ती अनुपालन लागत और MSME क्षेत्र की चिंता

चर्चा के दौरान अनुपालन लागत में लगातार हो रही वृद्धि का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। जैन ने कहा कि निर्माता ट्रेसबिलिटी सिस्टम, ऑडिट, दस्तावेजीकरण, प्रमाणन और अनुपालन अवसंरचना पर भारी निवेश कर रहे हैं। इसका आर्थिक बोझ अंततः निर्यातकों और यूरोपीय खरीदारों तक पहुंचता है। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME), व्यापारियों और कन्वर्टर्स के लिए क्षमता निर्माण की आवश्यकता पर जोर दिया।

उनके अनुसार, “यदि प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता, किफायती अनुपालन तंत्र और डिजिटल ट्रेसबिलिटी प्लेटफॉर्म उपलब्ध नहीं कराए गए, तो उद्योग का एक बड़ा वर्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार से बाहर हो सकता है।”

EUDR से UDR तक: वैश्विक दृष्टिकोण की वकालत

अपने संबोधन के सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक में अंकित जैन ने सुझाव दिया कि EUDR जैसी अवधारणा को भविष्य में वैश्विक स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसे आगे चलकर “यूनिवर्सल डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन (UDR)” के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने कहा, जलवायु परिवर्तन सीमाओं में बंटा हुआ विषय नहीं है। भारत, ब्राजील, इंडोनेशिया, अफ्रीका, यूरोप या उत्तरी अमेरिका में वन संरक्षण पूरे ग्रह के लिए लाभकारी है। यदि हमारा उद्देश्य वनों की रक्षा और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना है, तो स्थिरता मानकों को अंततः क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक होना चाहिए।”

वैश्विक कूटनीति और सहयोग की आवश्यकता

इस अवसर पर यूनाइटेड डिप्लोमैटिक काउंसिल (UDC) के अध्यक्ष आसिफ इकबाल ने भी वैश्विक कूटनीति के महत्व पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, तकनीक, व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला और आर्थिक विकास जैसी चुनौतियां अब किसी एक देश द्वारा अकेले हल नहीं की जा सकतीं। इकबाल ने कहा, सतत विकास, नवाचार और आर्थिक समृद्धि के लिए संवाद, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी आवश्यक हैं। मजबूत कूटनीतिक संबंध सरकारों, उद्योगों और संस्थानों को साझा उद्देश्यों की दिशा में मिलकर कार्य करने का अवसर प्रदान करते हैं।”

भारत-ईयू संबंधों को नई मजबूती

सम्मेलन ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार, निवेश, नवाचार, नियामकीय सहयोग और सतत विकास पर संवाद को नई दिशा प्रदान की।

यूरोपीय संसद, उद्योग जगत, व्यापार संगठनों और नीति-निर्माताओं की भागीदारी ने यह स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष पर्यावरणीय जिम्मेदारी और आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

सम्मेलन में हुई चर्चाओं ने भारत-ईयू साझेदारी को और मजबूत बनाने के साथ-साथ वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु सहयोग, नवाचार और जिम्मेदार व्यापार की साझा प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया।

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