चीन के रक्षा अधिकारियों ने इस परीक्षण को सेना के नियमित वार्षिक प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा बताया है। उनका कहना है कि यह अभ्यास अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप किया गया और इसका उद्देश्य किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं था। बीजिंग ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे सैन्य अभ्यास उसकी रक्षा तैयारियों का नियमित हिस्सा हैं।
इसके बावजूद इस परीक्षण ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है। दक्षिण प्रशांत लंबे समय से परमाणु-मुक्त क्षेत्र के रूप में जाना जाता है और इस इलाके में किसी भी प्रकार की बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधि को कई देश संवेदनशील दृष्टि से देखते हैं।
ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड ने चीन के इस कदम पर सार्वजनिक रूप से चिंता जताई है। न्यूज़ीलैंड के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने कहा कि परीक्षण की सूचना बहुत कम समय पहले दी गई और इस तरह की सैन्य गतिविधि क्षेत्रीय स्थिरता के लिहाज से उचित नहीं मानी जा सकती। वहीं ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चिंताजनक बताते हुए पारदर्शिता और संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पहले से ही सामरिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। ऐसे में लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण क्षेत्रीय देशों के बीच अविश्वास बढ़ा सकता है। विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक गतिविधियों और सामरिक संतुलन पर इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हाल के वर्षों में चीन अपनी नौसैनिक और मिसाइल क्षमताओं का लगातार विस्तार कर रहा है। दूसरी ओर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अन्य साझेदार देश भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत कर रहे हैं। ऐसे माहौल में इस तरह के सैन्य परीक्षणों को केवल तकनीकी अभ्यास नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है।
आने वाले समय में इस मुद्दे पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक बातचीत तेज हो सकती है। फिलहाल चीन अपने परीक्षण को नियमित सैन्य अभ्यास बता रहा है, जबकि कई देश इसे क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन के लिए गंभीर संकेत के रूप में देख रहे हैं।