नई दिल्ली: तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग सांगपो) पर चीन द्वारा बनाए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध को लेकर एक नया खुलासा सामने आया है। चीन के भूवैज्ञानिकों के अध्ययन में दावा किया गया है कि इस विशाल परियोजना के नीचे एक सक्रिय फॉल्ट लाइन (भूगर्भीय दरार) मौजूद है। यह जानकारी सामने आने के बाद न केवल चीन में बल्कि भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया में इस परियोजना को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह दावा सही साबित होता है तो परियोजना की संरचनात्मक मजबूती, भूकंप का खतरा और नदी के प्रवाह पर इसके प्रभाव जैसे कई गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
167.8 अरब डॉलर की विशाल परियोजना
चीन ने पिछले वर्ष तिब्बत में यारलुंग सांगपो नदी पर लगभग 167.8 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली इस महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजना की शुरुआत की थी। इसे दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट माना जा रहा है। चीन का दावा है कि इस परियोजना से हर वर्ष लगभग 300 अरब किलोवाट-घंटे बिजली का उत्पादन होगा, जिससे 30 करोड़ से अधिक लोगों की बिजली की जरूरतें पूरी की जा सकेंगी।
यह परियोजना हिमालय की गहरी घाटी में बनाई जा रही है, जहां से ब्रह्मपुत्र नदी भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। इसी वजह से भारत इस परियोजना पर लगातार नजर बनाए हुए है।
अध्ययन में क्या सामने आया?
चीनी वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित शोध के अनुसार, बांध के जलाशय क्षेत्र के नीचे एक सक्रिय भूगर्भीय फॉल्ट लाइन मौजूद है। लंबे समय से जारी भूगर्भीय गतिविधियों के कारण आसपास की चट्टानें कमजोर हो चुकी हैं। इससे भविष्य में किसी बड़े भूकंप या भू-स्खलन की स्थिति में बांध की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि फॉल्ट लाइन की सक्रियता इंजीनियरिंग संरचनाओं की स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है। यदि भविष्य में इस क्षेत्र में तीव्र भूकंपीय गतिविधि होती है तो परियोजना की सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश और असम के लिए जीवनरेखा मानी जाती है। नदी का जल कृषि, पेयजल, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन सहित कई क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चीन द्वारा नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बड़े पैमाने पर बदलाव किया जाता है या किसी आपदा की स्थिति में बांध को नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर भारत के निचले इलाकों पर भी पड़ सकता है। अचानक जल छोड़ने या किसी संरचनात्मक विफलता की स्थिति में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
हालांकि अभी तक इस तरह की किसी आशंका की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विशेषज्ञ लगातार सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं।
चीन का क्या कहना है?
चीन का कहना है कि यह परियोजना आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों के आधार पर तैयार की जा रही है और सभी सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है। चीनी अधिकारियों के अनुसार, परियोजना से क्षेत्र के आर्थिक विकास, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में मदद मिलेगी।
चीन यह भी दावा करता है कि बांध के निर्माण से निचले देशों के जल प्रवाह पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि भारत सहित कई विशेषज्ञ इन दावों की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं।
भूवैज्ञानिकों की चिंता क्यों बढ़ी?
हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और यह क्षेत्र लगातार भूगर्भीय गतिविधियों के कारण संवेदनशील माना जाता है। यहां भूकंप आने की संभावना अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक रहती है।
यदि किसी बड़े जलाशय के नीचे सक्रिय फॉल्ट लाइन मौजूद हो तो जल के अत्यधिक दबाव के कारण भूगर्भीय गतिविधियों पर प्रभाव पड़ सकता है। इसी कारण वैज्ञानिक इस परियोजना की दीर्घकालिक सुरक्षा का गहन अध्ययन करने की आवश्यकता बता रहे हैं।
भारत पहले भी जता चुका है चिंता
भारत सरकार पहले भी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर चिंता व्यक्त कर चुकी है। भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय नदियों पर बनने वाली बड़ी परियोजनाओं में पारदर्शिता और पड़ोसी देशों के साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जल संसाधनों से जुड़े ऐसे मामलों में क्षेत्रीय सहयोग और वैज्ञानिक जानकारी साझा करना भविष्य के संभावित विवादों और आपदाओं से बचने के लिए आवश्यक है।
भविष्य पर रहेगी नजर
चीन की यह परियोजना अभी निर्माणाधीन है और आने वाले वर्षों में इसके कई चरण पूरे किए जाएंगे। इस बीच सक्रिय फॉल्ट लाइन से जुड़ी जानकारी ने परियोजना की सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। भारत समेत कई देशों के विशेषज्ञ इस परियोजना की प्रगति और इसके संभावित पर्यावरणीय एवं भूवैज्ञानिक प्रभावों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
यदि भविष्य में विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन इन आशंकाओं की पुष्टि करते हैं, तो परियोजना के डिजाइन और सुरक्षा मानकों में बदलाव की आवश्यकता भी पड़ सकती है। फिलहाल यह मुद्दा केवल ऊर्जा उत्पादन का नहीं, बल्कि पर्यावरण, भूगर्भीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन से भी जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।