नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल ने विज्ञापन उद्योग को नई दिशा दी है, लेकिन इसके साथ उपभोक्ताओं को भ्रमित करने और गलत जानकारी देने का खतरा भी बढ़ा है। इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत में पहली बार AI से तैयार होने वाले विज्ञापनों के लिए अलग दिशा-निर्देश तैयार किए जा रहे हैं। एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) ने इस संबंध में एक मसौदा जारी किया है, जिसका उद्देश्य विज्ञापनों में पारदर्शिता बढ़ाना और उपभोक्ताओं को भ्रामक प्रचार से बचाना है।
प्रस्तावित नियमों के अनुसार, यदि किसी विज्ञापन में किसी सेलिब्रिटी की आवाज़ या चेहरा AI की मदद से तैयार किया गया है, किसी उत्पाद का डेमो कृत्रिम तकनीक से बनाया गया है, वर्चुअल इन्फ्लुएंसर का उपयोग किया गया है या ऐसा कोई दृश्य दिखाया गया है जो उपभोक्ता के खरीदारी के निर्णय को प्रभावित कर सकता है, तो उस विज्ञापन पर स्पष्ट रूप से उल्लेख करना होगा कि वह AI की सहायता से तैयार किया गया है।
हालांकि केवल एक लेबल लगाना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि ऐसे विज्ञापन, जिनमें फर्जी डॉक्टरों का इस्तेमाल किया गया हो, नकली प्रशंसापत्र (टेस्टिमोनियल) दिखाए गए हों, उत्पाद के परिणामों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया हो या किसी व्यक्ति की अनुमति के बिना उसकी आवाज़ और चेहरा AI के माध्यम से उपयोग किया गया हो, उन्हें स्वीकार नहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों में कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखने की तैयारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि AI तकनीक ने विज्ञापन निर्माण को पहले से कहीं अधिक आसान और प्रभावशाली बना दिया है। लेकिन इसी तकनीक का दुरुपयोग कर उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले कंटेंट भी तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की मांग बन गई है।
इससे पहले केंद्र सरकार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डीपफेक और AI आधारित सामग्री की पहचान और शिकायत मिलने के बाद सीमित समय में उसे हटाने के लिए नियमों की दिशा में कदम उठा चुकी है। अब विज्ञापन क्षेत्र के लिए भी अलग मानक तैयार किए जा रहे हैं ताकि AI आधारित प्रचार को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सके और उपभोक्ता वास्तविक तथा कृत्रिम सामग्री के बीच अंतर समझ सकें।
प्रस्तावित मसौदे में AI आधारित विज्ञापनों को जोखिम के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करने का सुझाव दिया गया है। उच्च जोखिम वाले विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, जबकि मध्यम जोखिम वाले विज्ञापनों पर “AI Generated” या “AI Enhanced” जैसे स्पष्ट टैग अनिवार्य होंगे। वहीं सामान्य फोटो एडिटिंग, रंग सुधार या बैकग्राउंड म्यूजिक जैसे मामूली तकनीकी बदलावों के लिए ऐसे लेबल की आवश्यकता नहीं होगी।
इसके अलावा यदि किसी विज्ञापन में AI आधारित सिफारिशें या प्रायोजित प्रचार शामिल है, तो यह भी स्पष्ट रूप से बताना होगा कि सामग्री स्पॉन्सर्ड है। इसका उद्देश्य उपभोक्ता को यह जानकारी देना है कि सामने दिखाई जा रही सामग्री पूरी तरह स्वतंत्र राय नहीं, बल्कि प्रचार का हिस्सा हो सकती है। केवल स्क्रीन पर छोटा-सा AI लेबल दिखा देने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। उन्होंने सुझाव दिया है कि डिजिटल वाटरमार्क, कंटेंट ट्रैकिंग, कंपनियों की जवाबदेही और नियमों के उल्लंघन पर कड़े दंड जैसे प्रावधान भी लागू किए जाने चाहिए।
एएससीआई ने मसौदे पर उद्योग जगत, विशेषज्ञों और आम लोगों से सुझाव आमंत्रित किए थे। प्राप्त सुझावों के आधार पर अंतिम दिशा-निर्देश तैयार किए जाएंगे। माना जा रहा है कि नए नियम लागू होने के बाद विज्ञापन उद्योग में पारदर्शिता बढ़ेगी, उपभोक्ताओं का भरोसा मजबूत होगा और AI तकनीक का जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा। डिजिटल युग में जहां AI हर क्षेत्र में अपनी जगह बना रहा है, वहीं यह पहल इस बात का संकेत है कि तकनीकी नवाचार के साथ उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। नए नियम लागू होने पर विज्ञापन कंपनियों, ब्रांड्स और डिजिटल कंटेंट निर्माताओं को अधिक जिम्मेदारी के साथ एआई का उपयोग करना होगा।