नई दिल्ली। अगस्त महीने की शुरुआत आम उपभोक्ताओं और कारोबारियों के लिए मिली-जुली खबर लेकर आई है। एक ओर 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कमी से होटल, रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर घरेलू विमानन उद्योग को बड़ा झटका लगा है। 1 अगस्त से एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की कीमत में लगभग 5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी गई है। इसके बाद घरेलू उड़ानों के लिए एटीएफ का दाम लगभग 110 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 115 रुपये प्रति लीटर हो गया है।
विमानन उद्योग के लिए ईंधन सबसे बड़ी लागतों में से एक है। ऐसे में एटीएफ महंगा होने का असर केवल एयरलाइंस की वित्तीय स्थिति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो यात्रियों की जेब पर भी असर पड़ सकता है। एविएशन टरबाइन फ्यूल किसी भी एयरलाइन की कुल परिचालन लागत का लगभग 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा होता है। इसलिए ईंधन की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी कंपनियों के खर्च में बड़ा अंतर पैदा करती है।
यदि एटीएफ की ऊंची कीमतें लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो एयरलाइंस अपने अतिरिक्त खर्च का कुछ हिस्सा यात्रियों से वसूलने का प्रयास कर सकती हैं। इसका सबसे सीधा तरीका हवाई किराए में बढ़ोतरी हो सकता है। हालांकि टिकट की कीमत केवल ईंधन लागत से तय नहीं होती। यात्रियों की मांग, प्रतिस्पर्धा, यात्रा सीजन और एयरलाइन की व्यावसायिक रणनीति भी किराए को प्रभावित करती है। इसलिए हर रूट पर तत्काल किराया बढ़े, यह जरूरी नहीं है।
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और विनिमय दर में बदलाव का असर एटीएफ की कीमतों पर भी पड़ता है। यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव का प्रभाव सीधे विमानन क्षेत्र पर दिखाई देता है। बढ़ती लागत से निपटने के लिए एयरलाइंस कई कदम उठा सकती हैं। इनमें किराए की समीक्षा, कम मांग वाले रूटों पर उड़ानों का पुनर्गठन, परिचालन खर्च में कटौती और ईंधन दक्षता बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं।
कई कंपनियां पहले से ही आधुनिक और कम ईंधन खपत वाले विमानों के इस्तेमाल पर जोर दे रही हैं, ताकि भविष्य में ईंधन कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर कम किया जा सके। यदि एटीएफ की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं, तो त्योहारों और छुट्टियों के सीजन में टिकट महंगे होने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि प्रतिस्पर्धा के कारण एयरलाइंस कई रूटों पर आकर्षक ऑफर भी जारी रख सकती हैं।
यात्रियों के लिए पहले से टिकट बुक करना, किराए की तुलना करना और ऑफर का लाभ उठाना ऐसे समय में अधिक फायदेमंद हो सकता है। अब अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजार पर रहेगी। यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो भविष्य में एटीएफ के दाम भी कम हो सकते हैं। फिलहाल 1 अगस्त से लागू नई दरों ने विमानन उद्योग के परिचालन खर्च को बढ़ा दिया है। आने वाले सप्ताहों में यह स्पष्ट होगा कि एयरलाइंस इस अतिरिक्त लागत को किस तरह संतुलित करती हैं और इसका असर यात्रियों के टिकटों पर कितना पड़ता है।