नई दिल्ली/चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर संभावित बीजेपी-शिरोमणि अकाली दल (SAD) गठजोड़ की चर्चा तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की हालिया मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। संसद परिसर में दोनों नेताओं के बीच करीब 10 मिनट की सौहार्दपूर्ण बातचीत हुई। इसके बाद पंजाब की सियासत में पुराने सहयोगियों के फिर करीब आने की अटकलों ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि, अभी तक दोनों दलों की ओर से किसी नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
मोदी-सुखबीर मुलाकात ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
प्रधानमंत्री मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बीजेपी और अकाली दल का करीब दो दशक से ज्यादा पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर टूट गया था। इसके बाद दोनों दलों ने अलग-अलग चुनावी रास्ता अपनाया।
अब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के बीच राजनीतिक समीकरण को लेकर चर्चा फिर शुरू हो गई है। हालिया मुलाकात के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी और अकाली दल एक बार फिर चुनावी मंच साझा कर सकते हैं। हालांकि, बीजेपी और अकाली दल के कई नेताओं ने गठबंधन की अटकलों को लेकर अभी स्पष्ट स्थिति नहीं दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, केवल नेताओं की मुलाकात को गठबंधन की पुष्टि मानना जल्दबाजी होगी। दोनों दलों के सामने सीट बंटवारे, नेतृत्व, चुनावी रणनीति और पंजाब में अपने-अपने राजनीतिक आधार से जुड़े कई सवाल हैं।
2020 में टूटा था बीजेपी-अकाली गठबंधन
बीजेपी और अकाली दल लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में सहयोगी रहे। दोनों दलों ने कई चुनाव साथ लड़े और केंद्र तथा राज्य की राजनीति में मिलकर काम किया। लेकिन सितंबर 2020 में कृषि कानूनों को लेकर अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया।
इसके बाद 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे। अलग चुनाव लड़ने का असर दोनों पार्टियों के प्रदर्शन पर भी दिखाई दिया। अकाली दल के लिए 2022 का चुनाव बेहद चुनौतीपूर्ण रहा और पार्टी केवल तीन सीटों पर सिमट गई।
इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी अकाली दल और बीजेपी अलग-अलग चुनाव लड़े। ऐसे में 2027 से पहले पुराने गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा होना पंजाब की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।
बीजेपी ने पहले अकेले चुनाव लड़ने की कही थी बात
गठबंधन की अटकलों के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि बीजेपी नेतृत्व पहले पंजाब में अपने दम पर चुनाव लड़ने की बात कह चुका है। मार्च 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पंजाब में बीजेपी के अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने का संकेत दिया था। इसके बाद सुखबीर सिंह बादल ने भी कहा था कि हर राजनीतिक दल को गठबंधन को लेकर अपना निर्णय लेने का अधिकार है।
बीजेपी पंजाब अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों की ओर से भी सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात सामने आई है। ऐसे में अगर बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन की स्थिति बनती है तो यह बीजेपी की मौजूदा चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव होगा।
हरियाणा CM नायब सिंह सैनी ने खारिज की अटकलें
गठबंधन की चर्चा के बीच हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने बीजेपी और अकाली दल के बीच पंजाब में गठबंधन की संभावना को खारिज किया है। पंजाब बीजेपी अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी इन अटकलों पर पार्टी की मौजूदा तैयारी का हवाला दिया है।
इससे साफ है कि फिलहाल बीजेपी की तरफ से किसी औपचारिक गठबंधन पर मुहर नहीं लगी है। इसलिए मोदी और सुखबीर की मुलाकात को राजनीतिक संवाद के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा, न कि गठबंधन की अंतिम घोषणा के रूप में।
अकाली दल के लिए क्यों अहम है बीजेपी का साथ?
अकाली दल इस समय अपने राजनीतिक इतिहास के कठिन दौर से गुजर रहा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 56 सीटें जीती थीं, जबकि 2017 में यह संख्या घटकर 15 रह गई। 2022 में पार्टी सिर्फ तीन सीटों पर सिमट गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी अकाली दल को केवल एक सीट मिली।
ऐसे में बीजेपी के साथ संभावित गठबंधन अकाली दल के लिए संगठनात्मक और चुनावी स्तर पर महत्वपूर्ण हो सकता है। बीजेपी का शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच आधार है, जबकि अकाली दल का पारंपरिक प्रभाव ग्रामीण और सिख मतदाताओं के कुछ हिस्सों में माना जाता है।
अगर दोनों दल साथ आते हैं तो उनका लक्ष्य अलग-अलग सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में मौजूद समर्थन को एक चुनावी समीकरण में बदलना हो सकता है। हालांकि, सीटों का बंटवारा और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बड़ी चुनौती होगी।
2027 में AAP और कांग्रेस के सामने नई चुनौती?
पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में मौजूदा आम आदमी पार्टी सरकार के सामने सत्ता बचाने की चुनौती होगी। दूसरी ओर कांग्रेस भी राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगी। ऐसे में अगर बीजेपी और अकाली दल के बीच समझौता होता है तो मुकाबले का गणित और जटिल हो सकता है।
हालांकि, गठबंधन बनने की स्थिति में भी यह जरूरी नहीं कि दोनों दलों का वोट पूरी तरह एक-दूसरे में स्थानांतरित हो जाए। पंजाब की राजनीति में स्थानीय उम्मीदवार, किसान मुद्दे, धार्मिक भावनाएं, बेरोजगारी, नशे का मुद्दा और राज्य-केंद्र संबंध जैसे विषय चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।
कृषि कानून से परिसीमन तक बदले समीकरण?
बीजेपी-अकाली संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के बीच दूरी बढ़ी थी। अब परिसीमन जैसे मुद्दों पर अकाली दल के रुख में बदलाव को भी राजनीतिक विश्लेषक ध्यान से देख रहे हैं। बैठक के बाद अकाली दल की ओर से केंद्र सरकार के कुछ महत्वपूर्ण विधेयकों पर समर्थन की घटनाओं ने भी अटकलों को हवा दी है।
हालांकि, इन घटनाक्रमों को सीधे चुनावी गठबंधन से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी। गठबंधन तभी माना जाएगा जब दोनों दल आधिकारिक तौर पर सीट बंटवारे और साझा चुनावी रणनीति की घोषणा करें।
क्या फिर साथ आएंगे बीजेपी और अकाली दल?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात 2027 के लिए किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है? जवाब अभी साफ नहीं है। एक तरफ बीजेपी पंजाब में अपना स्वतंत्र आधार बढ़ाने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अकाली दल के लिए मजबूत चुनावी साझेदारी राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकती है।
यही वजह है कि दोनों नेताओं की मुलाकात ने अटकलों को जन्म दिया है। राजनीतिक जानकारों के लिए आने वाले महीनों में दोनों दलों के बयानों, सीटों को लेकर बातचीत और पंजाब में जमीनी गतिविधियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल निष्कर्ष यही है कि बीजेपी-अकाली गठबंधन की चर्चा जरूर तेज हुई है, लेकिन गठबंधन तय होने की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। 2027 के चुनाव से पहले पंजाब की राजनीति में यह संभावित वापसी किस रूप में सामने आती है, यह आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम तय करेंगे।