नालंदा। नव नालंदा महाविहार के हिंदी विभाग में नवागंतुक विद्यार्थियों के स्वागत तथा परास्नातक शिक्षा पूर्ण कर चुके विद्यार्थियों के अभिनंदन एवं विदाई के लिए ‘नवागंतुक एवं पूर्ववर्ती छात्र~मिलन समारोह-2026’ का आयोजन आत्मीय एवं उल्लासपूर्ण वातावरण में किया गया। समारोह में नए विद्यार्थियों का स्वागत किया गया तथा विभाग से अपनी शैक्षणिक यात्रा पूर्ण कर रहे विद्यार्थियों को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दी गईं। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. हरे कृष्ण तिवारी ने की। उन्होंने तुलसीदास की पंक्ति “मन पछितैहें अवसर बीतै” का उल्लेख करते हुए विद्यार्थियों को समय के सदुपयोग की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी-जीवन निर्माण का समय है और बीता हुआ समय वापस नहीं आता। इसलिए विद्यार्थियों को अध्ययन, अनुशासन और व्यक्तित्व-विकास के लिए वर्तमान समय का सार्थक उपयोग करना चाहिए।
समारोह के मुख्य अतिथि पालि एवं अन्य भाषा संकाय के डीन तथा हिंदी विभाग के प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए साहित्य, संवेदना, समय और जीवन के संबंध पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि साहित्य पढ़ना केवल शिक्षा अर्जित करना नहीं है, बल्कि मनुष्य को संवेदनशील और बेहतर मनुष्य बनाना है। साहित्य हमें दूसरे के दुःख को समझने, उसके अनुभव के साथ जुड़ने और जीवन को व्यापक दृष्टि से देखने की क्षमता देता है। साहित्य मनुष्य के भीतर करुणा, सह-अस्तित्व, संवाद और विवेक को विकसित करता है। जो व्यक्ति साहित्य के वास्तविक मर्म को ग्रहण करता है, वह दूसरे मनुष्य के दुःख और अधिकार के प्रति अधिक सजग होता है। इस अर्थ में साहित्य केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं, बल्कि जीवन को मनुष्यता से जोड़ने वाली शक्ति है।
परिचय दास ने कहा कि विश्वविद्यालय में प्रवेश केवल किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश नहीं है, बल्कि एक नए बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संसार में प्रवेश है। विद्यार्थियों को पुस्तकों के साथ अपने शिक्षकों, सहपाठियों और विश्वविद्यालय के वातावरण से भी सीखना चाहिए। कक्षा में प्राप्त ज्ञान महत्त्वपूर्ण है, किंतु उसके साथ विकसित होने वाली दृष्टि और संवेदना उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने नए विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी विभाग उनके लिए केवल अध्ययन का स्थान नहीं, बल्कि आत्मीयता, संवाद और ज्ञान का ऐसा परिवार है, जहाँ वरिष्ठ विद्यार्थी अपने अनुभवों से कनिष्ठों का मार्गदर्शन करते हैं।
विदाई ले रहे विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि “आप जा नहीं रहे हैं, बल्कि यहाँ अर्जित ज्ञान, संस्कार और अनुभव को लेकर समाज में आगे बढ़ रहे हैं।” उन्होंने कहा कि किसी विद्यार्थी का विभाग से निकलना उसके विभाग से संबंध का अंत नहीं होता। वह जहाँ भी जाएगा, वहाँ अपने शिक्षकों, विभाग और विश्वविद्यालय की गरिमा का प्रतिनिधित्व करेगा। उन्होंने पूर्ववर्ती विद्यार्थियों से अपेक्षा की कि वे अपने कार्य और आचरण से हिंदी विभाग की प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाएँ और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनें।
समय की महत्ता पर अपनी कविता ‘यहीं समय है’ का उल्लेख करते हुए परिचय दास ने कहा कि विद्यार्थी-जीवन में सबसे मूल्यवान संपत्ति समय है। धन और अनेक भौतिक उपलब्धियाँ पुनः प्राप्त की जा सकती हैं, लेकिन बीता हुआ समय वापस नहीं आता। इसलिए विद्यार्थियों को वर्तमान क्षण की महत्ता पहचाननी चाहिए और उसे अध्ययन, रचनात्मकता, मित्रता, अनुभव तथा आत्म-विकास में लगाना चाहिए। जीवन की सफलता केवल पद और प्रमाणपत्र से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि शिक्षा ने व्यक्ति को कितना विवेकशील, संवेदनशील और उत्तरदायी बनाया।
उन्होंने वरिष्ठ विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे नए विद्यार्थियों के लिए सहयोगी और मार्गदर्शक बनें। उन्होंने कहा कि किसी भी विभाग की वास्तविक शक्ति उसकी इमारतों या सुविधाओं में ही नहीं, बल्कि उसके शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों और पीढ़ियों के बीच ज्ञान के हस्तांतरण में होती है। उन्होंने विद्यार्थियों से विभागीय एकता, पारस्परिक सम्मान और आत्मीयता बनाए रखने का आह्वान किया।
विशिष्ट अतिथि डॉ. अनुराग शर्मा ने नवागंतुक विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं संस्थागत सुविधाओं से परिचित कराया। उन्होंने पुस्तकालय तथा ‘जीवक’ जैसी सुविधाओं का उल्लेख करते हुए विद्यार्थियों से उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ के मार्गदर्शन में पी-एच.डी. उपाधि-प्राप्त वर्षा कुमारी और शोध छात्र रौनक कुमार का हाल ही में बिहार विश्वविद्यालय सेवा आयोग के माध्यम से सहायक प्रोफेसर के रूप में चयन हुआ है।उल्लेखनीय है कि यहीं से हिंदी में एम ए कर चुकी डॉ. सोनी कुमारी भी सहायक प्रोफेसर बनी हैं।
सहायक आचार्य सुश्री निकिता आनंद ने पूर्ववर्ती विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए ज्ञान के साथ न्यायपूर्ण दृष्टि और मानवीय मूल्यों के विकास पर बल दिया। उन्होंने साहित्य को संवेदना के विकास का माध्यम बताया। सहायक आचार्य सुश्री शिवानी जायसवाल ने कहा कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान के साथ सामाजिक जीवन, मित्रता, संवाद और विविध अनुभवों से परिचित कराता है। सहायक अध्यापक श्री विकास सिंह अपरिहार्य कारणों से उपस्थित नहीं हो सके और उन्होंने दूरभाष के माध्यम से विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ दीं।
समारोह में एम.ए. के विद्यार्थियों संतोष कुमार, सिद्धार्थ कृष्ण गोपाल, छोटी लाल, प्रशांत आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने विभाग में अध्ययन के अनुभव, शिक्षकों के मार्गदर्शन तथा सहपाठियों के साथ बिताए समय को स्मरण करते हुए नवागंतुक विद्यार्थियों का स्वागत किया और पूर्ववर्ती विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की। समारोह में वर्तमान स्नातक एवं परास्नातक विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। विभिन्न सांस्कृतिक एवं मनोरंजक गतिविधियों ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। कार्यक्रम का संचालन शिवानी ने किया, जबकि धन्यवाद-ज्ञापन कार्तिकेय कुषाण ने प्रस्तुत किया। आयोजन में चंदन कुमार ने विविध सहयोग एवं समन्वय संबंधी दायित्व प्रभावी ढंग से निभाए। कुमारी जूली ने मंचीय व्यवस्थाओं एवं कार्यक्रम के समन्वय में सक्रिय सहयोग प्रदान किया। सजावट की व्यवस्था मुस्कान, सोनम, स्वीटी, श्रुति, खुशी एवं अविनाश ने संभाली, जबकि बाह्य एवं अन्य व्यवस्थाओं में करण, आनंद एवं शशि तिवारी ने सक्रिय सहयोग दिया।
समारोह में शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच आत्मीय संवाद तथा विभागीय एकता का सुंदर वातावरण दिखाई दिया। नवागंतुकों के स्वागत और पूर्ववर्ती विद्यार्थियों की विदाई को एक साथ आयोजित करने वाला यह समारोह इस भाव का प्रतीक बना कि विभाग में आने वाला प्रत्येक विद्यार्थी परिवार का नया सदस्य है और यहाँ से आगे बढ़ने वाला प्रत्येक विद्यार्थी विभाग की स्मृति और उपलब्धि का हिस्सा बना रहता है। विद्यार्थियों एवं आचार्यों की सक्रिय सहभागिता और सहयोग से समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।