नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने वर्ष 2025-26 के गेहूं उत्पादन को लेकर सामने आ रही कुछ मीडिया रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि देश में गेहूं उत्पादन की स्थिति स्थिर और मजबूत बनी हुई है। सरकार का कहना है कि भले ही कुछ क्षेत्रों में मौसम संबंधी चुनौतियां सामने आई हों, लेकिन समग्र स्तर पर उत्पादन पर इसका बड़ा असर नहीं पड़ा है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार, इस बार गेहूं की फसल को “मिश्रित लेकिन लचीला” कहा जा सकता है। एक ओर जहां जलवायु परिवर्तन के कारण कुछ क्षेत्रों में तापमान और बारिश की अनियमितता देखने को मिली, वहीं दूसरी ओर किसानों ने बेहतर कृषि तकनीकों और समय पर बुवाई के जरिए इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस सीजन में लगभग 33.4 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की बुवाई की गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है। खास बात यह रही कि इस दौरान फसल में किसी बड़े कीट या रोग का प्रकोप देखने को नहीं मिला, जिससे उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
राज्य स्तर पर भी बेहतर संकेत मिले हैं। हरियाणा की मंडियों में गेहूं की आवक सरकार के 75 लाख मीट्रिक टन के खरीद लक्ष्य से आगे बढ़ चुकी है, जिसमें अब तक 56.13 लाख मीट्रिक टन की खरीद हो चुकी है। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 लाख मीट्रिक टन अधिक है।
इसी तरह, मध्य प्रदेश में भी उत्पादन अनुमान बेहतर रहने के चलते खरीद लक्ष्य को 78 एलएमटी से बढ़ाकर 100 एलएमटी कर दिया गया है। महाराष्ट्र में भी गेहूं उत्पादन लगभग 22.90 लाख टन रहने का अनुमान है, जो स्थिर वृद्धि को दर्शाता है।
हालांकि, फरवरी महीने में असामान्य रूप से बढ़े तापमान और कुछ क्षेत्रों में असमय बारिश व ओलावृष्टि के कारण फसल पर आंशिक असर पड़ा। इससे कुछ इलाकों में अनाज की गुणवत्ता और पैदावार प्रभावित होने की संभावना जताई गई है।
इसके बावजूद, सरकार का मानना है कि बढ़े हुए रकबे, समय पर बुवाई और उन्नत किस्मों के इस्तेमाल से इन नुकसानों की भरपाई काफी हद तक हो जाएगी। इस साल करीब 0.6 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में बुवाई की गई है, जिससे कुल उत्पादन को सहारा मिला है।
इसके अलावा, जलवायु-सहिष्णु और रोग-प्रतिरोधी उन्नत बीजों के उपयोग में भी तेजी आई है, जो बदलते मौसम में बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम हैं।
सरकार ने भरोसा जताया है कि सभी अनुकूल कारकों को देखते हुए 2025-26 का गेहूं उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले स्थिर रहेगा और देश की खाद्य सुरक्षा को कोई खतरा नहीं होगा।