उत्तर प्रदेश में स्कूलों में हिजाब और यूनिफॉर्म से जुड़ा विवाद अब राजनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के बाद इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने जहां मामले को आपसी समझ और संवेदनशीलता से सुलझाने की अपील की है, वहीं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले पर असहमति जताते हुए इसे संविधान में मिले मौलिक अधिकारों से जोड़कर सवाल उठाए हैं।
मायावती ने कहा कि महिलाओं की अस्मिता, सम्मान और आत्म-सम्मान से जुड़े विषयों को संवेदनशीलता के साथ देखा जाना चाहिए। उन्होंने धार्मिक मामलों पर अनावश्यक टिप्पणी से बचने की भी अपील की। उनके मुताबिक, ऐसे मामलों को राजनीतिक या सामाजिक टकराव का कारण बनाने के बजाय संवाद और समझदारी से समाधान तलाशना बेहतर होगा।
बसपा प्रमुख ने संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सभी नागरिकों को समान अधिकार देने वाला धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक संविधान दिया। उनके अनुसार, संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म और मान्यताओं के अनुसार शांतिपूर्ण जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है। इसलिए किसी भी धार्मिक मुद्दे पर चर्चा करते समय दूसरे समुदाय की भावनाओं और मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
1. जैसाकि सर्वविदित है कि परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने मानवतावादी, कल्याणकारी व सभी जाति-धर्मों के मानने वालों को एक-समान समतामूलक अधिकार देने वाला सेक्युलर संविधान देकर पूरे देश को एक कड़ी में जोड़ कर सशक्त भारत बनाने की गारण्टी सुनिश्चित की है और इसके तहत् सभी…
— Mayawati (@Mayawati) August 26, 2026
मायावती ने विशेष रूप से स्कूलों में यूनिफॉर्म और धार्मिक पहनावे के सवाल को लेकर स्कूल प्रबंधन तथा प्रशासन से व्यावहारिक समाधान निकालने की अपील की। उन्होंने कहा कि पर्दा, चादर या हिजाब जैसे विषयों को आवश्यकता से अधिक तूल देकर उन्हें लगातार कानूनी विवाद में बदलने के बजाय संबंधित पक्षों को आपसी समझ से रास्ता निकालना चाहिए। उनका मानना है कि ऐसा करने से इन मुद्दों को लेकर संकीर्ण राजनीतिक गतिविधियों की गुंजाइश कम होगी।
दूसरी ओर, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर खुलकर असहमति जताई। हैदराबाद स्थित पार्टी मुख्यालय में उन्होंने कहा कि वह अदालत के निर्णय से सहमत नहीं हैं। ओवैसी ने दावा किया कि हिजाब पहनने के सवाल पर दिया गया फैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और 19 में दिए गए अधिकारों के अनुरूप नहीं है। ओवैसी ने धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल उठाते हुए पूछा कि किसी व्यक्ति के धार्मिक आचरण में क्या आवश्यक है और क्या नहीं, इसका निर्धारण कौन करेगा। उन्होंने हिजाब को लेकर अदालत की टिप्पणी को इस्लाम और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए इसका विरोध किया। हालांकि, उनके ये बयान अदालत के फैसले की उनकी राजनीतिक और कानूनी व्याख्या हैं।
हिजाब विवाद के केंद्र में स्कूलों में निर्धारित ड्रेस कोड और विद्यार्थियों की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल है। स्कूलों में यूनिफॉर्म का उद्देश्य सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान ड्रेस व्यवस्था बनाए रखना होता है। दूसरी तरफ, धार्मिक आस्था से जुड़े पहनावे को लेकर नागरिक अपने मौलिक अधिकारों का हवाला देते रहे हैं। इसी वजह से इस तरह के मामलों में शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है। अलग-अलग राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने दृष्टिकोण से देख रहे हैं। मायावती का जोर विवाद को शांतिपूर्ण और स्थानीय स्तर पर सुलझाने पर है, जबकि ओवैसी ने सीधे अदालत के फैसले की संवैधानिकता पर सवाल खड़े किए हैं।
मामला केवल हिजाब तक सीमित नहीं है। भारत जैसे बहुधार्मिक देश में स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में धार्मिक पहचान से जुड़े पहनावे को लेकर समय-समय पर बहस होती रही है। ऐसे मामलों में अदालतें जहां संविधान और कानून के आधार पर निर्णय लेती हैं, वहीं राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखते हैं।
फिलहाल उत्तर प्रदेश में हिजाब का मुद्दा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। एक तरफ संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की चर्चा है, तो दूसरी तरफ शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और समान यूनिफॉर्म व्यवस्था का सवाल है। मायावती ने जहां टकराव से बचने और आपसी सहमति से समाधान तलाशने का रास्ता सुझाया है, वहीं ओवैसी ने अदालत के फैसले का विरोध करते हुए मौलिक अधिकारों का मुद्दा उठाया है।