हृदय की आवाज सुनकर शुभ कर्मों की ओर बढ़ने का संदेश : एक दिन सुबह-सुबह एक आदमी अखबार पढ़ रहा था। शोक समाचार के कॉलम पर नजर पड़ते ही वह चौंक उठा, क्योंकि शोक समाचार में उसी की मृत्यु की सूचना थी। वह घबरा गया कि आखिर ऐसा कैसे हो गया? गलती समाचार पत्र की थी, जिसने दूसरे व्यक्ति की जगह इसका नाम प्रकाशित कर दिया था। कुछ पल बाद जब ये आदमी सामान्य हुआ तो इसने सोचा कि अगर वाकई में मैं मर गया होता तो लोग मुझे कैसे याद करते?
यह सोचकर उसने शोक समाचार को पूरा पढ़ा। वह यह पढ़कर हैरान हो गया कि उसके लिए मौत का व्यापारी और डायनामाईट किंग जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया था। यह आदमी डायनामाइट का आविष्कार करने वाला अल्फ्रेड नोबेल था। ये सब पढ़ने के बाद अल्फ्रेड ने सोचा कि क्या मेरे मरने के बाद लोग मुझे ऐसे याद करेंगे? मन ही मन विचारों में उलझते जा रहे अल्फ्रेड ने तय किया कि वह इस पहचान के साथ नहीं मरना चाहते कि लोग उन्हें मौत का व्यापारी कहकर याद रखें।
इसके बाद से अल्फ्रेड दुनिया भर में शांति प्रयासों में लग गए। यहीं नहीं उन्होंने अपने नाम से नोबेल पुरस्कार की स्थापना भी की। आज दुनिया उन्हें महान नोबेल पुरस्कार के जनक के तौर पर याद करती है। आखिर जब हम इस दुनिया से विदा होंगे, तो लोग हमें किस रूप में याद रखेंगे? यह ऐसा सवाल है जो हम शायद ही कभी सोचते हों? इस सवाल का जवाब इस एक छोटी सी कहानी में तलाशा जा सकता है।
बस अल्फ्रेड नोबेल की तरह ही हमें भी अपने हृदय की आवाज सुननी होगी कि हम जो कर रहे हैं वह अच्छा है या बुरा? अगर हम भी चाहते हैं कि लोग हमें एक अच्छे व्यक्ति के रूप में याद रखें तो हमें अपने जीवन में हृदय की आवाज को सुनकर शुभ कर्म ही करने चाहिए। तभी संसार महात्मा के रूप में याद करेगा। इसलिए ध्यान अभ्यास से अपने श्वासों के भीतर की शक्ति को पहचानो और विश्व में शांति की स्थापना को संभव बनाओ।
“प्रेरणादायी चिंतक एवं शांति संदेशवाहक श्री संजय राय”