यूपी में 75 टन ‘नया’ आलू का खेल! पुराना था या केमिकल से तैयार?

नई दिल्ली/लखनऊ। आलू हर भारतीय रसोई की रोजमर्रा की जरूरत है, लेकिन उत्तर प्रदेश से सामने आई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने इस आम सब्जी को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। वायरल हो रही जानकारी के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में पुराने आलू को कथित तौर पर रासायनिक प्रक्रिया के […]

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  • August 28, 2026 9:15 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली/लखनऊ। आलू हर भारतीय रसोई की रोजमर्रा की जरूरत है, लेकिन उत्तर प्रदेश से सामने आई एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने इस आम सब्जी को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। वायरल हो रही जानकारी के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में पुराने आलू को कथित तौर पर रासायनिक प्रक्रिया के जरिए नए आलू जैसा दिखाकर बाजार में बेचने का खेल चल रहा है। दावा है कि इस तरह के मामले में खाद्य विभाग ने एक साल के दौरान करीब 75 टन ‘नया’ आलू पकड़ा। हालांकि, इस रिपोर्ट से जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र सरकारी पुष्टि अलग से सामने नहीं आई है।

मामला इसलिए भी गंभीर बताया जा रहा है क्योंकि सीजन की शुरुआत में नया आलू पुराने आलू की तुलना में काफी महंगा बिक सकता है। वायरल पोस्ट में उदाहरण दिया गया है कि जहां पुराना आलू करीब 20 रुपये किलो हो सकता है, वहीं नए आलू की कीमत करीब 80 रुपये किलो तक पहुंच सकती है। इसी बड़े मूल्य अंतर को कथित मुनाफाखोरी की वजह बताया गया है।

पुराने आलू को नया दिखाने का कथित तरीका क्या है?

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, कोल्ड स्टोरेज में रखे कई महीने पुराने आलू को बाहर निकालकर पहले सुखाया जाता है। इसके बाद उस पर मिट्टी जैसी परत चढ़ाने और रंग बदलने की प्रक्रिया किए जाने का दावा किया गया है। रिपोर्ट में कुछ स्थानों पर अलग-अलग रंग की मिट्टी और अन्य पदार्थों के इस्तेमाल की बात कही गई है।

कथित तौर पर इस प्रक्रिया का उद्देश्य आलू को ऐसा रूप देना है, जिससे देखने पर वह खेत से हाल ही में निकला हुआ नया आलू लगे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ जगहों पर अमोनिया के छिड़काव का दावा किया गया है, जिससे आलू की सतह पर चमक आने की बात कही गई।

हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर पुराने आलू पर ऐसी प्रक्रिया होने का दावा नहीं किया जा सकता। यह रिपोर्ट कुछ विशेष स्थानों और कथित कारोबार से जुड़े आरोपों पर आधारित है।

पश्चिमी यूपी के किन इलाकों का जिक्र?

रिपोर्ट के मुताबिक, इस कथित कारोबार की पड़ताल के दौरान संभल, बहजोई और चंदौसी समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों का जिक्र किया गया। रिपोर्ट में दावा है कि कुछ कोल्ड स्टोरेज में पुराने आलू को कथित तौर पर प्रोसेस करके नए आलू जैसा बनाया जा रहा था।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश आलू उत्पादन और कोल्ड स्टोरेज के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में यदि किसी इलाके में पुराने आलू को नए आलू के रूप में बेचने की कोशिश होती है तो इसका सीधा असर किसानों, कारोबारियों और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

20 रुपये का आलू 80 रुपये में बेचने का खेल?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल मुनाफे को लेकर उठ रहा है। वायरल जानकारी के मुताबिक, सीजन की शुरुआत में नए आलू की कीमत पुराने आलू से कई गुना ज्यादा हो सकती है। ऐसे में यदि कोई व्यापारी पुराने स्टॉक को नया बताकर बेचता है तो उसे भारी अतिरिक्त मुनाफा मिल सकता है।

यही वजह है कि कथित तौर पर पुराने आलू को नया दिखाने के लिए उसकी बाहरी शक्ल बदलने की कोशिश की जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह का कारोबार पिछले कुछ वर्षों में बढ़ने का दावा किया गया है।

एक साल में 75 टन आलू पकड़े जाने का दावा

रिपोर्ट में खाद्य विभाग की कार्रवाई का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश में एक साल के दौरान करीब 75 टन ऐसा आलू पकड़ा गया, जिसे रासायनिक प्रक्रिया से नया जैसा तैयार किए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पहले की तुलना में ऐसे मामलों में जब्ती बढ़ी है।

हालांकि, 75 टन के आंकड़े को लेकर पाठकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि यह संख्या रिपोर्ट में दिए गए दावे पर आधारित है। किसी सरकारी विभाग की विस्तृत जिला-वार कार्रवाई या लैब रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने पर ही इसके पूरे आंकड़े और स्वरूप की स्वतंत्र पुष्टि हो सकेगी।

सेहत को लेकर क्यों उठ रहे सवाल?

सबसे महत्वपूर्ण चिंता उपभोक्ताओं की सेहत को लेकर है। यदि खाद्य पदार्थ की सतह पर ऐसे रसायनों का इस्तेमाल किया गया हो जो खाद्य उपयोग के लिए स्वीकृत नहीं हैं, तो मामला गंभीर हो सकता है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में लखनऊ के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट के हवाले से अमोनिया के संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिक मात्रा में अमोनिया शरीर के अम्ल-क्षार संतुलन और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है।

यही कारण है कि उपभोक्ताओं को केवल आलू की बाहरी चमक या रंग देखकर उसकी गुणवत्ता का अनुमान नहीं लगाना चाहिए।

उपभोक्ता कैसे रहें सावधान?

आलू खरीदते समय कुछ सामान्य सावधानियां बरती जा सकती हैं। बहुत ज्यादा चमकदार, असामान्य रंग वाले या अस्वाभाविक रूप से मिट्टी की मोटी परत चढ़े आलू को ध्यान से देखना चाहिए। खरीदारी हमेशा विश्वसनीय दुकानदार या मंडी से करना बेहतर है।

आलू को इस्तेमाल से पहले अच्छी तरह पानी से धोना और साफ करना भी जरूरी है। हालांकि, केवल धोने से किसी रसायन की मौजूदगी पूरी तरह खत्म हो जाएगी, ऐसा मानना सही नहीं है।

सबसे अहम बात यह है कि किसी एक वायरल वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर पूरे बाजार या सभी व्यापारियों के बारे में निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।

खाद्य विभाग की भूमिका होगी अहम

ऐसे मामलों में खाद्य सुरक्षा विभाग की नियमित जांच और सैंपलिंग महत्वपूर्ण हो जाती है। रिपोर्ट में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि सूचना मिलने पर जिला और प्रदेश स्तर की टीमें कार्रवाई करती हैं।

यदि किसी व्यापारी द्वारा वास्तव में पुराने आलू को रासायनिक तरीके से नया बताकर बेचने की पुष्टि होती है, तो खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है। साथ ही लैब टेस्ट के जरिए यह पता लगाना जरूरी होगा कि इस्तेमाल किए गए पदार्थ खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप थे या नहीं।

किसानों और ईमानदार कारोबारियों पर भी असर

इस तरह की कथित मिलावट का असर केवल ग्राहक तक सीमित नहीं रहता। यदि पुराना आलू नया बताकर ऊंचे दाम पर बेचा जाता है तो इससे वास्तविक किसानों को भी नुकसान हो सकता है। असली नए आलू की कीमत और मांग प्रभावित होने के साथ बाजार में ग्राहकों का भरोसा भी कम हो सकता है।

इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, सैंपल टेस्टिंग और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई जरूरी है।

निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश में पुराने आलू को कथित तौर पर केमिकल और मिट्टी की प्रक्रिया से नया जैसा दिखाकर बेचने की खबर ने खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। 75 टन आलू पकड़े जाने का दावा सामने आया है, लेकिन इसके व्यापक आंकड़ों और हर मामले की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आधिकारिक जांच रिपोर्ट का इंतजार जरूरी है।

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