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भारत में सुपर अल नीनो की आहट, 180 वैज्ञानिकों की चेतावनी

देश के 180 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने संभावित बेहद मजबूत अल नीनो की स्थिति को लेकर तैयारी और निगरानी बढ़ाने की अपील की है।

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Gauravshali Bharat News
  • September 20, 2026 9:17 pm IST, Published 43 minutes ago

नई दिल्ली। भारत में मौसम और पर्यावरण को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। देश के 180 से अधिक वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने संभावित बेहद मजबूत अल नीनो की स्थिति को लेकर तैयारी और निगरानी बढ़ाने की अपील की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले महीनों में यदि प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो स्थिति और मजबूत होती है, तो इसका असर भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों के मौसम, जल संसाधनों, कृषि और प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ सकता है।

हालांकि, इस खबर में इस्तेमाल हो रहा ‘सुपर अल नीनो’ आधिकारिक मौसम-वर्गीकरण नहीं है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, अल नीनो की आधिकारिक श्रेणियां कमजोर, मध्यम, मजबूत और बहुत मजबूत जैसी होती हैं। सरकार ने जुलाई 2026 में कहा था कि 2026 के दौरान अल नीनो की स्थिति मजबूत होकर अक्टूबर-दिसंबर अवधि में बहुत मजबूत श्रेणी तक पहुंच सकती है।

180 से अधिक वैज्ञानिकों ने क्यों जताई चिंता?

सितंबर 2026 में जारी अपील में 180 से अधिक शोधकर्ताओं और पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक समुदाय, संबंधित संस्थाओं और क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों से संभावित मजबूत अल नीनो के प्रभावों के लिए पहले से तैयारी करने का आग्रह किया है। उनका मुख्य जोर निगरानी, शोध और प्राकृतिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने पर है।

वैज्ञानिकों की चिंता केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। मजबूत अल नीनो की स्थिति में अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में बदलाव, लंबे समय तक सूखे जैसी परिस्थितियां, अत्यधिक गर्मी और जंगलों में आग का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि किसी खास क्षेत्र में इसका वास्तविक असर कई अन्य समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

क्या है अल नीनो और भारत से इसका संबंध?

अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी प्राकृतिक जलवायु घटना है। इसका असर समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली प्रक्रियाओं के माध्यम से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है।

भारत के लिए इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि मानसून और प्रशांत महासागर की परिस्थितियों के बीच संबंध देखा गया है। मजबूत अल नीनो वाले वर्षों में भारतीय मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन हर अल नीनो वर्ष में भारत के हर हिस्से में एक जैसा मौसम नहीं होता। हिंद महासागर की स्थिति, वायुमंडलीय परिसंचरण और अन्य जलवायु कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इस बार क्यों बढ़ी चिंता?

2026 में अल नीनो की स्थिति को लेकर पहले से ही वैज्ञानिक और मौसम संबंधी संस्थाएं निगरानी कर रही हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार, जून 2026 में अल नीनो कमजोर स्थिति में था और जुलाई में यह मध्यम स्तर तक मजबूत हुआ था। मंत्रालय ने यह भी बताया था कि अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान इसके बहुत मजबूत होने की संभावना है।

सितंबर के दौरान सामने आई वैज्ञानिक अपील ने इसी संभावित बदलाव को लेकर प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की तैयारी पर जोर दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक मौसम की घटनाओं के प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने के लिए लगातार आंकड़े जुटाना और क्षेत्रवार निगरानी जरूरी है।

भारत में किन क्षेत्रों पर पड़ सकता है असर?

यदि अल नीनो मजबूत होता है तो इसका प्रभाव देश के सभी हिस्सों में समान होना जरूरी नहीं है। वर्षा में कमी या वितरण में बदलाव का असर कृषि क्षेत्रों पर पड़ सकता है। कम बारिश वाले इलाकों में जल उपलब्धता, सिंचाई और पेयजल प्रबंधन को अतिरिक्त चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा अत्यधिक गर्मी की परिस्थितियां मानव स्वास्थ्य, बिजली की मांग और शहरी जल प्रबंधन पर दबाव बढ़ा सकती हैं। जंगलों और सूखे इलाकों में लंबे समय तक गर्म और शुष्क परिस्थितियां आग के जोखिम को बढ़ा सकती हैं। पारिस्थितिकी तंत्र में रहने वाले पौधों और जीव-जंतुओं पर भी मौसम में असामान्य बदलाव का असर पड़ सकता है।

हालांकि इन सभी प्रभावों को अभी निश्चित परिणाम के रूप में देखना उचित नहीं होगा। मौसम विज्ञान में किसी घटना का प्रभाव क्षेत्र, समय और तीव्रता के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

मानसून के बाद भी निगरानी क्यों जरूरी?

दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के साथ भारत में मौसमी परिस्थितियों का स्वरूप बदलना शुरू हो जाता है। ऐसे समय में प्रशांत महासागर की स्थिति के साथ-साथ हिंद महासागर और वायुमंडलीय परिस्थितियों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।

IMD लगातार समुद्र और वातावरण से जुड़े संकेतकों पर नजर रखता है और केंद्र तथा राज्य सरकारों के लिए मौसम संबंधी पूर्वानुमान और सलाह जारी करता है। सरकार के अनुसार, प्रभाव आधारित पूर्वानुमान और जोखिम आधारित चेतावनियां भी जारी की जाती हैं ताकि प्रशासन संभावित मौसम संबंधी जोखिमों के लिए समय रहते तैयारी कर सके।

सुपर अल नीनो’ को लेकर जरूरी सावधानी

सोशल मीडिया पर ‘सुपर अल नीनो’ शब्द के साथ कई तरह के दावे तेजी से प्रसारित हो रहे हैं। ऐसे में आधिकारिक मौसम पूर्वानुमान और वैज्ञानिक आकलन को प्राथमिकता देना जरूरी है। भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि ‘सुपर अल नीनो’ नाम की कोई आधिकारिक श्रेणी WMO या IMD की परिचालन वर्गीकरण प्रणाली में निर्धारित नहीं है।

इसलिए मौजूदा स्थिति को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अल नीनो के मजबूत होने की संभावना और उससे जुड़े संभावित प्रभावों पर निगरानी बढ़ी हुई है, लेकिन भविष्य में भारत के प्रत्येक क्षेत्र में सूखा, गर्मी या अन्य आपदा निश्चित रूप से आएगी, ऐसा निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता।

वैज्ञानिकों की ताजा अपील का मूल संदेश भी तैयारी, शोध और निगरानी को मजबूत करने से जुड़ा है। आने वाले महीनों में समुद्र और वायुमंडल की परिस्थितियां इस बात को स्पष्ट करेंगी कि अल नीनो किस स्तर तक मजबूत होता है और भारत के मौसम पर उसका वास्तविक प्रभाव कितना पड़ता है।

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