नई दिल्ली | लिपस्टिक महिलाओं के मेकअप का एक बेहद लोकप्रिय हिस्सा है। होंठों को आकर्षक रंग और चमक देने के लिए इसका इस्तेमाल रोजाना लाखों लोग करते हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर समय-समय पर ऐसे दावे सामने आते रहते हैं कि लिपस्टिक में लेड, कैडमियम और क्रोमियम जैसी भारी धातुएं मौजूद हो सकती हैं और इनके इस्तेमाल से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे दावों के बीच जरूरी है कि डर फैलाने के बजाय उपलब्ध वैज्ञानिक शोध और नियामक संस्थाओं की जानकारी को समझा जाए।
दरअसल, कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों में लिपस्टिक और लिप ग्लॉस के नमूनों में विभिन्न धातुओं की मौजूदगी दर्ज की गई है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि बाजार में मिलने वाली हर लिपस्टिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है या उसके इस्तेमाल से कैंसर अथवा किडनी की बीमारी होना तय है।
32 लिप प्रोडक्ट्स की जांच में मिले थे कई मेटल
2013 में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले के शोधकर्ताओं ने 32 लिपस्टिक और लिप ग्लॉस उत्पादों का परीक्षण किया था। अध्ययन में लेड, कैडमियम, क्रोमियम, एल्युमिनियम सहित नौ धातुओं की जांच की गई। शोधकर्ताओं को कई उत्पादों में इन धातुओं की अलग-अलग मात्रा मिली।
अध्ययन का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं था कि किसी उत्पाद में धातु मौजूद है या नहीं, बल्कि संभावित दैनिक एक्सपोजर का आकलन करना भी था। शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ उत्पादों के बार-बार इस्तेमाल की स्थिति में कुछ धातुओं का सेवन स्वास्थ्य आधारित संदर्भ स्तरों के मुकाबले महत्वपूर्ण हो सकता है। साथ ही अध्ययन ने यह भी कहा कि कॉस्मेटिक सुरक्षा का आकलन केवल किसी पदार्थ की मौजूदगी से नहीं, बल्कि उसकी मात्रा और इंसान के वास्तविक संपर्क के आधार पर किया जाना चाहिए।
क्या लिपस्टिक से किडनी और कैंसर का खतरा है?
सोशल मीडिया पोस्ट में अक्सर यह दावा किया जाता है कि लिपस्टिक में मौजूद कैडमियम सीधे किडनी की बीमारी और ट्यूमर का कारण बन सकता है। इस दावे को सीधे तौर पर हर लिपस्टिक पर लागू करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
कैडमियम एक ऐसी धातु है जिसके लंबे समय तक अधिक स्तर पर संपर्क को स्वास्थ्य संबंधी नुकसान से जोड़ा गया है। लेकिन किसी कॉस्मेटिक उत्पाद में कैडमियम की थोड़ी मात्रा मिलना और उससे किसी व्यक्ति में बीमारी विकसित होना दो अलग-अलग बातें हैं। जोखिम का आकलन मात्रा, इस्तेमाल की आवृत्ति, शरीर में पहुंचने वाली वास्तविक मात्रा और संपर्क की अवधि को ध्यान में रखकर किया जाता है।
2013 के बर्कले अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भी लिप प्रोडक्ट्स में धातुओं की मौजूदगी को लेकर आगे जांच की जरूरत बताई थी। अध्ययन में परीक्षण किए गए उत्पादों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला गया था कि लिपस्टिक लगाने से सीधे कैंसर होता है।
FDA ने भी कॉस्मेटिक्स में भारी धातुओं की जांच की
अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी FDA ने भी कॉस्मेटिक्स में आर्सेनिक, कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, लेड, मरकरी और निकल जैसी धातुओं की जांच की है। FDA के अनुसार उसके सर्वे में मिली इन धातुओं की मात्रा ज्यादातर मामलों में बहुत कम थी और उपलब्ध जानकारी के आधार पर उन स्तरों से स्वास्थ्य जोखिम का संकेत नहीं मिला।
FDA ने विशेष रूप से लिपस्टिक में लेड की मौजूदगी का भी अध्ययन किया है। उसके परीक्षणों में सैकड़ों कॉस्मेटिक लिप प्रोडक्ट्स शामिल थे। FDA के मुताबिक उसके सर्वे में 99 प्रतिशत से अधिक कॉस्मेटिक लिप प्रोडक्ट्स में लेड का स्तर 10 पार्ट्स प्रति मिलियन से कम था। एजेंसी ने कॉस्मेटिक लिप प्रोडक्ट्स में लेड की अशुद्धि के लिए 10 ppm का अनुशंसित अधिकतम स्तर बताया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि केवल “लिपस्टिक में लेड मिला” जैसी हेडलाइन देखकर घबराने के बजाय उसकी मात्रा और संबंधित नियामकीय मानकों को देखना जरूरी है।
लिपस्टिक में धातुएं आती कहां से हैं?
कॉस्मेटिक्स में धातुओं की मौजूदगी हमेशा जानबूझकर किसी जहरीले पदार्थ को मिलाने का परिणाम नहीं होती। FDA के अध्ययन के अनुसार कुछ धातुएं खनिज आधारित पिगमेंट और फिलर्स में मौजूद प्राकृतिक अशुद्धियों के रूप में आ सकती हैं। रंग देने वाले पिगमेंट भी ऐसे स्रोत हो सकते हैं जिनमें बहुत कम मात्रा में धातु मौजूद हो।
निर्माण प्रक्रिया, कच्चे माल की गुणवत्ता और उत्पादन के दौरान होने वाला संदूषण भी अंतिम उत्पाद में किसी धातु की मौजूदगी को प्रभावित कर सकता है। इसलिए प्रतिष्ठित निर्माता आमतौर पर कच्चे माल की गुणवत्ता और निर्माण प्रक्रिया पर नियंत्रण रखते हैं।
लिपस्टिक लगाते समय शरीर में कैसे पहुंच सकता है उत्पाद?
लिपस्टिक शरीर के लिए एक अलग तरह का कॉस्मेटिक है क्योंकि इसे होंठों पर लगाया जाता है और इसका कुछ हिस्सा अनजाने में निगल भी लिया जाता है। खाने-पीने, होंठ चाटने या बार-बार लिपस्टिक लगाने के दौरान थोड़ी मात्रा शरीर में जा सकती है।
FDA के अनुसार लिप कॉस्मेटिक्स में मौजूद लेड के संपर्क का प्रमुख रास्ता आकस्मिक रूप से निगलना है, जबकि त्वचा के माध्यम से इसका अवशोषण बहुत कम माना गया है।
इसलिए अत्यधिक इस्तेमाल करने वाले लोगों में कुल एक्सपोजर सामान्य इस्तेमाल की तुलना में अलग हो सकता है। यही वजह है कि उत्पाद की गुणवत्ता और इस्तेमाल की आदत दोनों महत्वपूर्ण हैं।
खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान?
लिपस्टिक खरीदते समय सबसे पहले उत्पाद की पैकेजिंग, निर्माता की जानकारी, सामग्री सूची, बैच संबंधी विवरण और वैधता अवधि देखें। बहुत सस्ते या बिना किसी स्पष्ट निर्माता जानकारी वाले उत्पादों से सावधानी बरतना बेहतर है।
यदि किसी उत्पाद की पैकेजिंग संदिग्ध हो, सामग्री की जानकारी स्पष्ट न हो या उत्पाद की गंध, बनावट और रंग सामान्य से अलग दिखाई दे तो उसका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मेकअप उत्पादों को दूसरे व्यक्ति के साथ साझा करने से भी बचना चाहिए।
“Chemical-free” या “100 प्रतिशत toxin-free” जैसे शब्दों को देखकर भी तुरंत यह मान लेना उचित नहीं है कि उत्पाद पूरी तरह जोखिममुक्त है। किसी कॉस्मेटिक की सुरक्षा उसके वास्तविक घटकों, उनकी मात्रा, निर्माण प्रक्रिया और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करती है।
सोशल मीडिया के दावों को आंख बंद करके न मानें
लिपस्टिक में भारी धातुओं को लेकर जागरूकता जरूरी है, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रसारित हर स्वास्थ्य दावा वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं होता। किसी पुराने अध्ययन के आंकड़े को वर्तमान बाजार के प्रत्येक उत्पाद पर लागू करना भी सही नहीं है।
वैज्ञानिक अध्ययन किसी विशेष समय, स्थान और नमूना समूह पर आधारित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए बर्कले का चर्चित अध्ययन केवल 32 लिप प्रोडक्ट्स पर आधारित था। इसलिए उससे पूरे वैश्विक कॉस्मेटिक बाजार के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
निष्कर्षतः, लिपस्टिक में कुछ धातुओं की ट्रेस मात्रा मिलने की वैज्ञानिक रिपोर्टें मौजूद हैं, लेकिन “हर लिपस्टिक जहरीली है” या “लिपस्टिक लगाने से कैंसर होता है” जैसे व्यापक दावे उपलब्ध प्रमाण से सिद्ध नहीं होते। उपभोक्ताओं को घबराने के बजाय भरोसेमंद निर्माता के उत्पाद चुनने, लेबल पढ़ने और संदिग्ध कॉस्मेटिक्स से बचने पर ध्यान देना चाहिए।