महिलाएं घर में रहें’, मंच पर आने से तबाही? कंथापुरम का बयान

केरल में इस्लामिक स्कॉलर कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार की महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद बढ़ गया है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं की मौजूदगी को लेकर कहा कि इससे ‘बड़ी तबाही’ हो सकती है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। महिलाओं के सार्वजनिक […]

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  • August 31, 2026 7:17 pm IST, Published 41 minutes ago

केरल में इस्लामिक स्कॉलर कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार की महिलाओं को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद बढ़ गया है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर महिलाओं की मौजूदगी को लेकर कहा कि इससे ‘बड़ी तबाही’ हो सकती है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

महिलाओं के सार्वजनिक मंच पर आने को लेकर विवाद

केरल में महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को लेकर धार्मिक संगठन के एक बयान ने नई बहस छेड़ दी है। इस विवाद के केंद्र में इस्लामिक स्कॉलर कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार हैं। उन्होंने रविवार को कोच्चि में आयोजित एक इस्लामिक सम्मेलन में महिलाओं के सार्वजनिक जीवन और मंचों पर मौजूदगी को लेकर टिप्पणी की।

रिपोर्टों के मुताबिक, कंथापुरम ने कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर लाने से ‘बड़ी तबाही’ होगी। उन्होंने इसी संदर्भ में इस्लाम में महिलाओं के लिए पर्दे के प्रावधान का उल्लेख किया और महिलाओं को घरों तक सीमित रहने की बात कही।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब कुछ दिन पहले ही समस्त के कंथापुरम गुट की ओर से धार्मिक कार्यक्रमों में महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी को लेकर एक विवादित सर्कुलर सामने आया था। इस सर्कुलर में धार्मिक आयोजनों को निर्धारित धार्मिक सीमाओं के भीतर आयोजित करने की बात कही गई थी।

पहले जारी हो चुका था विवादित सर्कुलर

कंथापुरम गुट के अध्यक्ष ई. सुलेमान मुसलियार और महासचिव कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार की ओर से जारी निर्देश में कहा गया था कि धार्मिक समारोहों और कार्यक्रमों में इस्लामिक मानदंडों का पालन किया जाए। इसमें मस्जिदों, मदरसों, महल्ला समितियों और अन्य संस्थानों को कार्यक्रमों पर नजर रखने की सलाह दी गई थी।

सर्कुलर में सार्वजनिक सड़कों और मंचों पर गैर-महरम पुरुषों के बीच युवा महिलाओं की मौजूदगी को उचित नहीं बताया गया था। साथ ही धार्मिक आयोजनों में गैर-इस्लामिक परंपराओं और उत्सव के तरीकों को शामिल नहीं करने की बात कही गई थी। इस निर्देश को लेकर केरल में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठने लगे।

इसके बाद कंथापुरम की नई टिप्पणी ने विवाद को और तेज कर दिया। अब बहस केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी, स्वतंत्रता और सामाजिक भूमिका को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज

कंथापुरम के बयान की कई राजनीतिक नेताओं ने आलोचना की है। सीपीएम केंद्रीय समिति की सदस्य केके शैलजा ने महिलाओं को घर तक सीमित रखने वाली सोच पर सवाल उठाया। उन्होंने इसे पुराने सामंती नजरिए से जोड़ते हुए कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से दूर रखने की बात स्वीकार नहीं की जा सकती।

इसके अलावा महिला नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से भी टिप्पणी पर आपत्ति जताई गई है। आलोचकों का कहना है कि महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को लेकर इस तरह की भाषा आधुनिक लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों से मेल नहीं खाती।

केरल में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राज्य में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में लंबे समय से सक्रिय भागीदारी रही है। ऐसे में महिलाओं को सार्वजनिक मंचों से दूर रखने संबंधी टिप्पणी ने लैंगिक समानता को लेकर नई बहस पैदा कर दी है।

कंथापुरम ने धार्मिक मान्यताओं का दिया हवाला

कंथापुरम ने अपने बयान में महिलाओं के लिए पर्दे की व्यवस्था को धार्मिक दृष्टिकोण से समझाने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर लाने से होने वाले नुकसान को देखते हुए इस्लाम में पर्दे का प्रावधान किया गया है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कंथापुरम और उनके संगठन से जुड़ा धार्मिक दृष्टिकोण है। इसे सभी मुस्लिम समुदायों या सभी इस्लामिक विद्वानों की एक समान राय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं और महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को लेकर अलग-अलग समुदायों और विद्वानों में अलग-अलग विचार मौजूद हैं।

धार्मिक आयोजनों में महिलाओं की भूमिका पर बहस

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में केरल में आयोजित होने वाले धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रम भी हैं। हाल के दिनों में कुछ धार्मिक समारोहों में महिलाओं की भागीदारी और मंचों पर उनकी मौजूदगी को लेकर बहस हुई थी। कंथापुरम गुट का कहना है कि ऐसे कार्यक्रम धार्मिक सीमाओं और मानदंडों के अनुरूप होने चाहिए।

दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि धार्मिक आयोजन सार्वजनिक जीवन का हिस्सा होते हैं और उनमें महिलाओं की भागीदारी पर पूरी तरह रोक लगाने की कोशिश समानता के सवाल खड़े करती है।

यही वजह है कि कंथापुरम का बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। बयान के समर्थक इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अपने अनुयायियों को धार्मिक दिशा-निर्देश देने का अधिकार बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने वाली सोच मान रहे हैं।

संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल

विवाद के बीच संविधान में दिए गए समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों को लेकर भी चर्चा हो रही है। भारत में महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी का कानूनी अधिकार प्राप्त है।

आलोचकों का कहना है कि किसी धार्मिक संगठन को अपने अनुयायियों के लिए धार्मिक दिशा-निर्देश देने का अधिकार हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भूमिका को लेकर व्यापक सामाजिक प्रतिबंध की मांग अलग संवैधानिक और सामाजिक प्रश्न खड़े करती है।

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कंथापुरम की टिप्पणी को उनके धार्मिक विचार के रूप में समझा जाए और इसे पूरे समाज या पूरे मुस्लिम समुदाय की सामूहिक राय के तौर पर प्रस्तुत न किया जाए।

बयान से बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद

कंथापुरम का ताजा बयान उस विवाद को और गहरा कर रहा है, जो कुछ दिन पहले महिलाओं को सार्वजनिक मंचों से दूर रखने वाले सर्कुलर के बाद शुरू हुआ था। अब इस मुद्दे पर धार्मिक स्वतंत्रता, महिला अधिकार, सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर बहस तेज होती दिखाई दे रही है।

फिलहाल विवाद का केंद्र कंथापुरम का यह दावा है कि महिलाओं के सार्वजनिक मंचों पर आने से ‘बड़ी तबाही’ हो सकती है। उनके बयान के बाद केरल में कई राजनीतिक नेताओं ने इसका विरोध किया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा धार्मिक संगठनों, महिला अधिकार समूहों और राजनीतिक दलों के बीच बहस का बड़ा विषय बन सकता है।

नोट: यह खबर उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के आधार पर तैयार की गई है। विवादित धार्मिक दावों को संबंधित वक्ता के कथन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, तथ्य के रूप में नहीं।

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