श्रीनगर। नेपाल में ग्लेशियर टूटने से अचानक आई बाढ़ की घटना के बाद हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। कश्मीर में पांच ग्लेशियल झीलों को संभावित जोखिम के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना गया है। एक अध्ययन के अनुसार, इन झीलों के अचानक टूटने से निचले इलाकों में बड़ी संख्या में इमारतों के अलावा पुल, सड़कें और एक पावर प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं।
अध्ययन में ब्रमसर, नंदकोल, भागसर, चिरसर और गंगाबल झीलों को ‘बहुत अधिक जोखिम’ वाली श्रेणी में रखा गया है। आकलन के मुताबिक, इन पांच झीलों में किसी एक के टूटने की स्थिति में कुल 2,704 इमारतों, 15 पुलों और संबंधित सड़क नेटवर्क पर असर पड़ सकता है। एक बिजली परियोजना के भी प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। यह आकलन 155 ग्लेशियल झीलों से मिले सैटेलाइट डेटा के अध्ययन पर आधारित है।
इन पांच झीलों में ब्रमसर को सबसे अधिक जोखिम वाली झील बताया गया है। यह करीब 3,746 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसका सीधा संबंध ग्लेशियर से है। ग्लेशियर के तेजी से पिघलने की स्थिति में झील में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, जिससे प्राकृतिक बांध पर दबाव बढ़ने का खतरा रहता है। भागसर झील भी संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है। यह लगभग 3,954 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। अध्ययन के मुताबिक, यदि भागसर झील में अचानक टूटने की स्थिति पैदा होती है तो इसके बहाव से 1,114 इमारतों और छह पुलों को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा महत्वपूर्ण मुगल रोड के प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई है। इससे स्थानीय संपर्क और आवाजाही पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भूवैज्ञानिक मोहम्मद अमीन के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से निकलने वाला पानी कई स्थानों पर प्राकृतिक रूप से बने कमजोर बांधों के पीछे जमा हो रहा है। इन बांधों में बर्फ, चट्टानों और मलबे का मिश्रण होता है। यदि किसी कारण से इनकी संरचना कमजोर होती है और बांध टूट जाता है तो कुछ ही समय में बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर तेजी से बह सकता है।
इस तरह की घटना को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लेशियल झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ के रूप में जाना जाता है। इसमें पानी के साथ भारी मात्रा में मलबा और चट्टानें भी नीचे की ओर पहुंच सकती हैं। पहाड़ी इलाकों में ऐसी बाढ़ का प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है क्योंकि नदी घाटियों में बस्तियां और बुनियादी ढांचा अक्सर जलधाराओं के आसपास मौजूद होते हैं।
गंगाबल और नंदकोल झीलों का आपसी संबंध जोखिम को और जटिल बनाता है। दोनों झीलें एक जलधारा के माध्यम से जुड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि ऊपरी झील में अचानक पानी का दबाव बढ़ता है या उसका प्राकृतिक बांध टूटता है तो नीचे स्थित झील पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इससे एक के बाद दूसरी झील में बाढ़ जैसी स्थिति बनने की आशंका बढ़ जाती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालय में तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रक्रिया तेज हो रही है। इसके साथ ही ग्लेशियल झीलों का आकार और जलस्तर भी बदल रहा है। ऐसे में केवल झीलों की वर्तमान स्थिति पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इनके आसपास के ग्लेशियर, प्राकृतिक बांध और जल निकासी व्यवस्था की भी लगातार निगरानी जरूरी है।
अध्ययन में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने की सिफारिश की गई है। इसमें सैटेलाइट निगरानी, जलस्तर की नियमित जानकारी और मौसम संबंधी आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा सकता है। समय रहते चेतावनी मिलने पर निचले क्षेत्रों में रहने वाली आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को बचाने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं।
कश्मीर की इन पांच झीलों से जुड़ा आकलन हिमालयी क्षेत्रों में बदलते जलवायु जोखिम की गंभीरता को सामने लाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी के साथ स्थानीय स्तर पर आपदा तैयारी मजबूत करना जरूरी है, ताकि अचानक आने वाली बाढ़ के संभावित नुकसान को कम किया जा सके।