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ग्लेशियरों के सिकुड़ने से हिमालय में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ा

काठमांडू: नेपाल-तिब्बत सीमा के पास 26 अगस्त को त्सांगबू री क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने और उसके मलबे से भोटे कोसी-त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक बाढ़ आने की घटना ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय में हो रहे बदलाव केवल ग्लेशियरों […]

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  • August 31, 2026 10:18 am IST, Published 35 minutes ago

काठमांडू: नेपाल-तिब्बत सीमा के पास 26 अगस्त को त्सांगबू री क्षेत्र में ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटने और उसके मलबे से भोटे कोसी-त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक बाढ़ आने की घटना ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों की ओर एक बार फिर ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हिमालय में हो रहे बदलाव केवल ग्लेशियरों के पिघलने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि तापमान में वृद्धि पर्वतीय पर्यावरण और उसकी भूगर्भीय स्थिरता को भी प्रभावित कर रही है।

हिमालय को एशिया की कई प्रमुख नदियों का जलस्रोत माना जाता है। यहां मौजूद ग्लेशियर लंबे समय से नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से इन ग्लेशियरों के आकार और व्यवहार में बदलाव दर्ज किया जा रहा है। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र पर किए गए अध्ययनों में भी ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने की ओर संकेत किया गया है।

ग्लेशियरों के पीछे हटने का असर भविष्य में पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है। शुरुआती दौर में बर्फ तेजी से पिघलने से नदियों में पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के छोटे होने से सूखे मौसम में जल प्रवाह प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसके साथ ही ग्लेशियरों के पीछे हटने वाले स्थानों पर नई झीलें बनने लगती हैं। इनमें से कुछ झीलें बेहद अस्थिर हो सकती हैं।

इन झीलों की प्राकृतिक सीमाएं कई बार बर्फ, चट्टानों और ढीले मलबे से बनी होती हैं। ऐसे में भूकंप, अत्यधिक बारिश, हिमस्खलन या पहाड़ों से चट्टानों के गिरने जैसी घटनाएं झील की दीवार को कमजोर कर सकती हैं। यदि झील का बांध टूटता है तो बहुत कम समय में बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बह सकता है। इससे नदी घाटियों में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा होती है, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहा जाता है।

हिमालयी आपदाओं का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पर्माफ्रॉस्ट से जुड़ा है। पर्वतीय इलाकों में लंबे समय से जमी हुई मिट्टी और चट्टानों के बीच मौजूद बर्फ तापमान बढ़ने के साथ पिघल रही है। इसके कारण पहाड़ों की ढलानों को स्थिर रखने वाली प्राकृतिक संरचना कमजोर हो सकती है। नतीजतन चट्टान गिरने, भूस्खलन और मलबे के बहाव जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।

हिमालय में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा केवल स्थानीय स्तर की समस्या नहीं है। यहां होने वाले बदलावों का असर नेपाल, भारत, भूटान, पाकिस्तान और चीन के पर्वतीय तथा नदी घाटी क्षेत्रों तक पड़ सकता है। खासकर उन इलाकों में जोखिम अधिक है जहां बस्तियां, सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं नदियों के करीब स्थित हैं।

ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन को केवल घटना के बाद राहत पहुंचाने तक सीमित रखने के बजाय जोखिम की पहले पहचान करने पर जोर देने की जरूरत है। ग्लेशियरों और ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग, मौसम और जलस्तर की रियल टाइम जानकारी तथा शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।

26 अगस्त की घटना इस बात का संकेत है कि हिमालय तेजी से बदल रहा है। बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के सिकुड़ने, पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने और पर्वतीय ढलानों की अस्थिरता को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय एक जुड़े हुए पर्यावरणीय संकट के तौर पर समझना होगा। वैज्ञानिक निगरानी और क्षेत्रीय सहयोग के जरिए ही भविष्य में ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

 

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