प्रयागराज/नोएडा। नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA/रासुका) के तहत की गई निरुद्धि को रद्द कर दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने उन्हें पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आकृति चौधरी की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर की। अदालत के इस फैसले के बाद नोएडा श्रमिक आंदोलन से जुड़े मामले में पुलिस कार्रवाई, रासुका के इस्तेमाल और निरोधात्मक हिरासत के लिए पेश किए गए साक्ष्यों को लेकर बहस तेज हो गई है।
करीब पांच महीने से हिरासत में थीं आकृति
रिपोर्टों के अनुसार, 25 वर्षीय आकृति चौधरी को अप्रैल में नोएडा में हुए श्रमिक आंदोलन के बाद गिरफ्तार किया गया था। पुलिस की ओर से उन पर आंदोलन के दौरान मजदूरों को भड़काने और हिंसा से जुड़े आरोप लगाए गए थे। बाद में उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरोधात्मक कार्रवाई की गई। वह करीब पांच महीने तक हिरासत में रहीं।
आकृति ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस और अधिवक्ता चार्ली प्रकाश ने पक्ष रखा। याचिका में हिरासत की वैधानिकता और इसके लिए बताए गए आधारों पर सवाल उठाए गए थे।
कोर्ट ने सरकार से मांगे थे सबूत और दस्तावेज
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से आकृति को रासुका के तहत निरुद्ध किए जाने के आधार स्पष्ट करने को कहा था। अदालत ने पुलिस कार्रवाई के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य और दस्तावेज भी पेश करने को कहा। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अदालत ने सामग्री की जांच के बाद पाया कि आकृति की निरुद्धि को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
अदालत ने पुलिस और प्रशासन की ओर से पेश किए गए घटनाक्रम तथा दस्तावेजों की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने राज्य की ओर से पेश की गई कहानी को ‘गढ़ी हुई’ बताया। हालांकि, हाईकोर्ट के विस्तृत आदेश के सभी कानूनी निष्कर्षों को समझने के लिए आदेश के पूर्ण पाठ का अध्ययन महत्वपूर्ण रहेगा।
पांच लाख रुपये मुआवजे का भी आदेश
इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पांच लाख रुपये के मुआवजे से जुड़ा है। अदालत ने आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये देने का निर्देश दिया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के वेतन से अदा किए जाने का निर्देश दिया गया है।
मुआवजे के आदेश ने इस मामले को और महत्वपूर्ण बना दिया है, क्योंकि अदालत ने केवल रासुका के तहत की गई हिरासत को रद्द नहीं किया, बल्कि निरुद्धि से जुड़े नुकसान के लिए आर्थिक क्षतिपूर्ति का भी निर्देश दिया। यही वजह है कि हाईकोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक कार्रवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवालों के संदर्भ में भी चर्चा में है।
पुलिस के आरोपों में क्या कहा गया था?
पुलिस की ओर से आरोप लगाया गया था कि 13 अप्रैल को वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चल रहे श्रमिक आंदोलन के दौरान आकृति चौधरी ने मजदूरों को भड़काने का प्रयास किया। पुलिस ने कथित तौर पर आंदोलन से संबंधित वीडियो, व्हाट्सऐप चैट और अन्य सामग्री को कार्रवाई का आधार बनाया था। आंदोलन के बाद हिंसा और आगजनी की घटनाओं से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने का भी दावा किया गया था।
हालांकि, हाईकोर्ट में इन आरोपों के समर्थन में पेश सामग्री की पर्याप्तता पर सवाल उठे। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद माना कि रासुका के तहत निरुद्धि को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त आधार सामने नहीं रखे जा सके। इसी आधार पर अदालत ने निरुद्धि को रद्द करने का फैसला सुनाया।
क्या सभी मुकदमे खत्म हो गए?
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू समझना जरूरी है। हाईकोर्ट द्वारा NSA की हिरासत रद्द किए जाने का अर्थ यह नहीं है कि आकृति चौधरी से जुड़े सभी आपराधिक मामले स्वतः समाप्त हो गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, श्रमिक आंदोलन से जुड़े अन्य मामले अलग-अलग स्तर पर हो सकते हैं। हाईकोर्ट का मौजूदा आदेश मुख्य रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत की गई निरोधात्मक कार्रवाई से संबंधित है।
अदालत ने भी तत्काल रिहाई का निर्देश इस शर्त के साथ दिया कि यदि आकृति किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं या किसी अन्य मामले में उनकी गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, तभी उन्हें रिहा किया जाए।
फैसले से उठे बड़े सवाल
हाईकोर्ट के फैसले ने यह सवाल भी सामने ला दिया है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी कड़ी निरोधात्मक व्यवस्था लागू करने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया का कितना कठोर परीक्षण किया जाना चाहिए। अदालत की टिप्पणी और मुआवजे का आदेश प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
नोएडा श्रमिक आंदोलन का यह मामला अब केवल एक छात्रा की रिहाई तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पुलिस कार्रवाई, प्रशासनिक जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के इस्तेमाल जैसे व्यापक कानूनी मुद्दे भी जुड़ गए हैं। हाईकोर्ट का विस्तृत आदेश सामने आने के बाद यह और स्पष्ट होगा कि अदालत ने किन तथ्यों और कानूनी कमियों को आकृति की हिरासत रद्द करने के लिए निर्णायक माना।
निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से आकृति चौधरी को बड़ी राहत मिली है। रासुका के तहत उनकी निरुद्धि रद्द कर दी गई है, अन्य मामले में जरूरत न होने पर तत्काल रिहाई का आदेश दिया गया है और पांच लाख रुपये मुआवजे का निर्देश भी दिया गया है। इस फैसले ने नोएडा श्रमिक आंदोलन से जुड़े पुलिस और प्रशासनिक कदमों पर एक बार फिर गंभीर कानूनी चर्चा शुरू कर दी है।