मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना के भीतर संभावित टूट की चर्चाओं ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) पहले ही पार्टी और संगठन से जुड़े कई बड़े झटकों का सामना कर चुकी है। अब खबरों और राजनीतिक दावों में यह चर्चा तेज है कि उद्धव गुट के कुछ विधायक भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट के संपर्क में हो सकते हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
महाराष्ट्र में शिवसेना के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई के बीच विधायकों के संभावित पाला बदलने की चर्चा ने उद्धव गुट की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या एकनाथ शिंदे खेमे की ओर से पहले चर्चा में रहा ‘ऑपरेशन टाइगर’ एक बार फिर सक्रिय हो रहा है।
कुछ शिंदे समर्थक नेताओं की ओर से दावा किया गया है कि उद्धव गुट के करीब 14 विधायक उनके संपर्क में हैं। उद्धव ठाकरे के खेमे के पास विधानसभा में करीब 20 विधायक बताए जाते हैं। ऐसे में यदि इतनी बड़ी संख्या में विधायक पाला बदलते हैं तो इससे शिवसेना (यूबीटी) की विधानसभा में स्थिति काफी कमजोर हो सकती है। हालांकि, फिलहाल यह केवल राजनीतिक दावा है और संबंधित विधायकों की ओर से सामूहिक रूप से ऐसी किसी योजना की पुष्टि सामने नहीं आई है।
इससे पहले लोकसभा चुनाव के बाद उद्धव गुट को उस समय बड़ा राजनीतिक झटका लगा था, जब उसके छह सांसदों के शिंदे खेमे के साथ जाने की बात सामने आई। एकनाथ शिंदे ने इसे ‘ऑपरेशन टाइगर’ से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति की सफलता के तौर पर पेश किया था। सांसदों के पाला बदलने से संसद में उद्धव गुट की ताकत प्रभावित हुई और अब विधानसभा को लेकर भी इसी तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
शिवसेना में मौजूदा संघर्ष की जड़ें जून 2022 की बगावत तक जाती हैं। उस समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ विद्रोह किया था। इसके बाद महाराष्ट्र की महाविकास आघाड़ी सरकार गिर गई और उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में शिंदे ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने।
बगावत के बाद शिवसेना के संगठन और चुनाव चिन्ह को लेकर दोनों गुटों के बीच लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चली। चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह दिया। उद्धव गुट ने इस फैसले को चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अब अदालत में चल रही सुनवाई दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
उद्धव ठाकरे गुट का कहना है कि पार्टी की मूल राजनीतिक पहचान और संगठन पर उसका अधिकार है, जबकि शिंदे गुट चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन करता रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का असर केवल कानूनी स्थिति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में दोनों गुटों की रणनीति पर भी पड़ सकता है।
विधायकों के संभावित पाला बदलने की खबरों ने इस पूरे विवाद को और संवेदनशील बना दिया है। यदि वास्तव में उद्धव गुट के कुछ विधायक अलग होते हैं तो इसका असर विधानसभा में संख्या बल, संगठनात्मक रणनीति और आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, यदि ये दावे केवल राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति साबित होते हैं, तो इसका उद्देश्य उद्धव गुट के भीतर असमंजस पैदा करना भी हो सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विधायकों के कथित पाला बदलने को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए ‘ऑपरेशन टाइगर’ के दोबारा सक्रिय होने की चर्चा को अभी राजनीतिक अटकल के तौर पर ही देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यदि किसी विधायक की ओर से सार्वजनिक घोषणा होती है या दोनों गुटों के बीच कोई औपचारिक राजनीतिक कदम सामने आता है, तभी तस्वीर पूरी तरह साफ होगी। तब तक महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे गुट के संभावित विधायी संकट पर सभी की नजर बनी रहेगी।