नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए एक सेवानिवृत्त कर्मचारी के पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। कर्मचारी की नियुक्ति अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र के आधार पर हुई थी, जिसे कई वर्षों बाद जांच में अमान्य घोषित कर दिया गया था। अदालत ने प्रमाणपत्र को अमान्य ठहराने के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन कर्मचारी की तीन दशक से अधिक लंबी सेवा को देखते हुए उसके रिटायरमेंट और पेंशन संबंधी लाभों की रक्षा करने का फैसला किया।
मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की। संबंधित कर्मचारी को 21 अक्टूबर 1994 को मुंबई नगर निगम में जूनियर इंजीनियर (सिविल) के पद पर नियुक्त किया गया था। उसकी नियुक्ति ‘टोकरे कोली’ अनुसूचित जनजाति के प्रमाणपत्र के आधार पर हुई थी। हालांकि, बाद में इस प्रमाणपत्र की वैधता को लेकर जांच शुरू हुई और स्क्रूटिनी कमेटी ने वर्ष 2020 में इसे अमान्य घोषित कर दिया।
स्क्रूटिनी कमेटी के फैसले के खिलाफ कर्मचारी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने भी प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित किए जाने के निर्णय को सही माना। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत में सुनवाई लंबित रहने के दौरान अंतरिम आदेश के कारण कर्मचारी अपनी सेवा में बना रहा। उसने 30 जून 2025 को सेवानिवृत्ति ली।
सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी की ओर से अदालत से अनुरोध किया गया कि लंबे समय तक की गई सेवा को ध्यान में रखते हुए उसके पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों को सुरक्षित रखा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग पर विचार करते हुए कहा कि सामान्य स्थिति में अमान्य जाति या जनजाति प्रमाणपत्र के आधार पर हासिल की गई नियुक्ति को जारी नहीं रखा जा सकता। हालांकि, मौजूदा मामले की परिस्थितियां अलग थीं, क्योंकि कर्मचारी ने 1994 से 2025 तक लगातार तीन दशक से अधिक समय तक सेवा की थी।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि कर्मचारी की सेवा अवधि 21 अक्टूबर 1994 से 30 जून 2025 तक रही। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए अदालत ने विशेष शक्ति का इस्तेमाल करना उचित समझा। अदालत ने कर्मचारी की सेवा को केवल सेवानिवृत्ति और पेंशन संबंधी लाभों की गणना और भुगतान के उद्देश्य से सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारी को मिलने वाले लाभ संबंधित सेवा नियमों के अनुरूप ही तय किए जाएंगे। यानी अदालत ने नियुक्ति को वैध घोषित नहीं किया है और न ही अमान्य जाति प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी को बरकरार रखने का आदेश दिया है। राहत का दायरा केवल पेंशन और सेवानिवृत्ति से जुड़े वैधानिक लाभों तक सीमित रखा गया है।
पीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों का भी उल्लेख किया। अदालत ने 2024 के फैसले के साथ-साथ 2017 के एक मामले में दिए गए निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि विशेष परिस्थितियों में अनुच्छेद 142 के तहत ऐसी शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित हो सके।
अदालत के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि अमान्य जाति या जनजाति प्रमाणपत्र के मामलों में नियुक्ति की वैधता और लंबे समय तक की गई सेवा से जुड़े अधिकारों को अलग-अलग आधार पर देखा जा सकता है। जहां एक ओर अदालत ने प्रमाणपत्र को अमान्य ठहराने वाले प्रशासनिक और हाईकोर्ट के फैसले को कायम रखा, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी की लंबी सेवा को देखते हुए उसके सेवानिवृत्ति लाभों की सुरक्षा के लिए असाधारण संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया।
यह फैसला विशेष परिस्थितियों में अनुच्छेद 142 की भूमिका को भी रेखांकित करता है। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि ऐसी राहत को सामान्य नियम नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले में परिस्थितियों, सेवा अवधि और उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।