नयी दिल्लीः सत्य निकेतन में छात्रावास के तौर पर इस्तेमाल की जा रही इमारत के गिरने के बाद जिम्मेदारी को लेकर बहस अब केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं रह गई है। दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई में यह सवाल सामने आया कि छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में उन संस्थाओं की भूमिका क्या है, जिनके अधिकार क्षेत्र में भवनों की निगरानी, नियमों का पालन और छात्र आवास की व्यवस्था आती है। इसी संदर्भ में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और दिल्ली नगर निगम (MCD) की भूमिका भी जांच के दायरे में आई है।
हादसे वाली इमारत में बड़ी संख्या में छात्र रह रहे थे और वहां निर्माण या मरम्मत से जुड़ा काम भी चल रहा था। घटना के बाद भवन की स्थिति, निर्माण नियमों के पालन और सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर सवाल उठे। पुलिस और प्रशासन की ओर से भवन मालिक के खिलाफ कार्रवाई की गई, लेकिन अदालत की चिंता इससे व्यापक है। सवाल यह है कि क्या किसी छात्र आवास में जोखिम की स्थिति बनने से पहले संबंधित एजेंसियों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई थी।
दिल्ली में बड़ी संख्या में विद्यार्थी दूसरे राज्यों और शहरों से पढ़ाई करने आते हैं। विश्वविद्यालयों में उपलब्ध हॉस्टल सीमित होने के कारण बहुत से छात्रों को निजी PG, किराये के कमरों और छात्रावासों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में उनकी सुरक्षा केवल मकान मालिक की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त है या नहीं, यह महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है। हाईकोर्ट ने भी इसी व्यापक स्थिति पर ध्यान दिया है।
DU की भूमिका को लेकर हालांकि एक अंतर समझना जरूरी है। हर निजी PG या किराये की इमारत का प्रत्यक्ष नियमन विश्वविद्यालय के हाथ में नहीं होता। भवन का नक्शा, निर्माण की अनुमति, अनधिकृत निर्माण और स्थानीय भवन नियमों का पालन मुख्य रूप से संबंधित सरकारी और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी होती है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले हादसे के लिए DU को सीधे कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
फिर भी विश्वविद्यालय से यह सवाल पूछा जा सकता है कि छात्रों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित हॉस्टल उपलब्ध कराने के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं। यदि बड़ी संख्या में विद्यार्थी मजबूरी में निजी PG में रह रहे हैं, तो विश्वविद्यालय के स्तर पर छात्र आवास की जरूरत का आकलन, सुरक्षित आवास के लिए दिशा-निर्देश और छात्रों को जोखिम वाले स्थानों से बचाने के उपायों पर चर्चा जरूरी हो जाती है। हाईकोर्ट ने DU से छात्रों और हॉस्टल सुविधाओं से संबंधित जानकारी मांगी है, जिससे यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है।
MCD की भूमिका अलग और अधिक प्रत्यक्ष है। स्थानीय निकाय के सामने भवन निर्माण नियमों के पालन, अवैध निर्माण की पहचान, खतरनाक इमारतों पर कार्रवाई और सुरक्षा मानकों की निगरानी जैसे सवाल आते हैं। यदि किसी इमारत में लंबे समय से नियमों का उल्लंघन हो रहा था या वह संरचनात्मक रूप से जोखिम वाली स्थिति में थी, तो यह जांचना जरूरी होगा कि संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं और जानकारी होने पर क्या कार्रवाई की गई।
इस मामले में फिलहाल किसी एक संस्था को पूरी तरह दोषी मान लेना जल्दबाजी होगी। जांच से यह स्पष्ट होना जरूरी है कि भवन मालिक, स्थानीय निकाय और विश्वविद्यालय की कानूनी तथा प्रशासनिक जिम्मेदारियां क्या थीं और उनमें से किस स्तर पर चूक हुई। यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो जवाबदेही भी उसी आधार पर तय होनी चाहिए।
सत्य निकेतन हादसा दिल्ली के छात्र आवास की व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। जब विश्वविद्यालयों की हॉस्टल क्षमता छात्रों की जरूरत से कम हो और हजारों विद्यार्थी निजी आवासों पर निर्भर हों, तब सुरक्षा के लिए स्पष्ट और साझा व्यवस्था जरूरी है। छात्रों को सुरक्षित रहने की जगह उपलब्ध कराना केवल एक संस्थान की जिम्मेदारी नहीं हो सकती, लेकिन यह भी जरूरी है कि हर संबंधित संस्था अपनी सीमा और अधिकार क्षेत्र के भीतर अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से निभाए। हाईकोर्ट की सुनवाई इसी जवाबदेही को तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।