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गया के ‘भूतों के पहाड़’ का रहस्य, 676 सीढ़ियां क्यों खास?

बिहार : बिहार के गया जिले में स्थित प्रेतशिला पर्वत धार्मिक आस्था, पितृ तर्पण और पिंडदान की परंपराओं से जुड़ा एक प्रमुख स्थल माना जाता है। 676 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और पितरों की शांति के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। बिहार का गया शहर देश-विदेश में पिंडदान और पितृकर्म के लिए प्रसिद्ध […]

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  • September 12, 2026 8:30 am IST, Published 1 hour ago

बिहार : बिहार के गया जिले में स्थित प्रेतशिला पर्वत धार्मिक आस्था, पितृ तर्पण और पिंडदान की परंपराओं से जुड़ा एक प्रमुख स्थल माना जाता है। 676 सीढ़ियां चढ़कर श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और पितरों की शांति के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं।

बिहार का गया शहर देश-विदेश में पिंडदान और पितृकर्म के लिए प्रसिद्ध है। इसी धार्मिक क्षेत्र में एक ऐसा स्थान भी है, जिसे स्थानीय मान्यताओं में ‘प्रेतशिला’ या ‘भूतों का पहाड़’ कहा जाता है। गया शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित यह पहाड़ी सामान्य पर्यटन स्थलों से अलग धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखती है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 676 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। तस्वीरों और उपलब्ध विवरणों के अनुसार, पहाड़ी पर प्रेतशिला वेदी सहित कई धार्मिक स्थल हैं, जहां पितरों के निमित्त कर्मकांड किए जाते हैं।

क्यों खास है प्रेतशिला पर्वत?

हिंदू धार्मिक परंपराओं में गया को पितृकर्म के लिए विशेष महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि गया क्षेत्र में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। इसी व्यापक धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा प्रेतशिला पर्वत भी है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन लोगों की मृत्यु असामयिक परिस्थितियों में हुई हो, उनके लिए भी यहां विशेष पिंडदान किया जाता है। ऐसी आस्था है कि प्रेतशिला पर किया गया पिंडदान दिवंगत परिजनों की शांति और मोक्ष की कामना से जुड़ा होता है। यह धार्मिक विश्वास है, जिसका संबंध हिंदू कर्मकांड और पितृ परंपरा से है।

676 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु

प्रेतशिला की सबसे चर्चित विशेषताओं में इसकी लंबी सीढ़ियां शामिल हैं। श्रद्धालुओं को पहाड़ी के ऊपरी हिस्से तक पहुंचने के लिए करीब 676 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। धार्मिक यात्रा का यह हिस्सा अपने आप में कठिन माना जाता है, लेकिन पितृकर्म की आस्था के चलते बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं।

पहाड़ी पर पहुंचने के बाद श्रद्धालु निर्धारित धार्मिक स्थलों पर पूजा-पाठ और पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करते हैं। यहां की भौगोलिक संरचना, चट्टानें और आसपास का वातावरण भी इस जगह को दूसरे धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देते हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में इसे ‘भूतों का पहाड़’ बताया गया है, लेकिन इस नाम को धार्मिक और लोक मान्यताओं के संदर्भ में समझना जरूरी है। किसी वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि पहाड़ी पर वास्तव में भूत या आत्माएं रहती हैं।

अकाल मृत्यु से जुड़ी है विशेष मान्यता

प्रेतशिला को लेकर सबसे अधिक चर्चा अकाल मृत्यु से संबंधित धार्मिक मान्यताओं की होती है। हिंदू परंपराओं में ऐसी धारणा है कि दुर्घटना, बीमारी या अन्य असामयिक कारणों से मृत्यु होने पर परिजनों द्वारा विशेष पितृकर्म कराया जाता है।

मान्यता के अनुसार, ऐसे दिवंगत लोगों की शांति के लिए पितृपक्ष के दौरान गया में पिंडदान किया जाता है। प्रेतशिला को इसी उद्देश्य से जुड़े प्रमुख स्थानों में माना जाता है। यहां किए जाने वाले अनुष्ठानों का उद्देश्य दिवंगत आत्मा की शांति और परिवार की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करना होता है।

सत्तू उड़ाने की अनोखी परंपरा

प्रेतशिला से जुड़ी एक अन्य परंपरा सत्तू उड़ाने की बताई जाती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, अकाल मृत्यु वाले परिवारों में सूतक की परंपरा के कारण कुछ समय तक सत्तू खाने से परहेज किया जाता है। पिंडदान और संबंधित धार्मिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही परिवार के लोग सत्तू ग्रहण करते हैं।

पिंडदान की प्रक्रिया में तिल और सत्तू का भी धार्मिक उपयोग बताया जाता है। श्रद्धालु पितरों के निमित्त कर्मकांड करते हुए निर्धारित मंत्रों और परंपराओं का पालन करते हैं। इन परंपराओं का उद्देश्य दिवंगत परिजनों के प्रति सम्मान और उनकी शांति की कामना करना है।

चट्टान में मौजूद है धार्मिक महत्व वाली वेदी

प्रेतशिला की पहचान यहां मौजूद चट्टानी संरचनाओं और धार्मिक वेदी से भी होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पहाड़ी पर प्रेतशिला वेदी स्थित है, जहां पिंडदान किया जाता है।

धार्मिक मान्यता में इस स्थान को पितृकर्म के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यही वजह है कि पितृपक्ष के दौरान गया आने वाले कई श्रद्धालु अपने धार्मिक कार्यक्रम में प्रेतशिला को भी शामिल करते हैं।

यहां एक विशेष द्वार का उल्लेख भी मिलता है, जिसे स्थानीय धार्मिक विश्वासों में यमलोक से जोड़कर देखा जाता है। ऐसी मान्यताएं सदियों से धार्मिक कथाओं और लोक परंपराओं का हिस्सा रही हैं।

भगवान राम से भी जोड़ा जाता है संबंध

गया के पिंडदान स्थलों से भगवान राम से जुड़ी धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं की आस्था में गया का संबंध भगवान राम, माता सीता और पितृकर्म की प्राचीन परंपराओं से जोड़ा जाता है।

प्रेतशिला पर्वत के संदर्भ में भी धार्मिक कथाओं और पुराणों से जुड़ी मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध सामग्री में वायु पुराण और विष्णु पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में इसके वर्णन का दावा किया गया है।

ब्रह्मकुंड और प्राचीन धार्मिक परंपरा

प्रेतशिला क्षेत्र में ब्रह्मकुंड का भी धार्मिक महत्व बताया जाता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में यहां भगवान ब्रह्मा द्वारा यज्ञ किए जाने से संबंधित कथा प्रचलित है। इन धार्मिक कथाओं ने गया क्षेत्र को पितृकर्म की परंपरा में विशेष स्थान दिलाया है।

गया में पिंडदान केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार और पूर्वजों के बीच भावनात्मक संबंध को व्यक्त करने वाली परंपरा के रूप में भी देखा जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने दिवंगत परिजनों की स्मृति में यहां पहुंचते हैं।

पितृपक्ष में बढ़ जाती है रौनक

पितृपक्ष के दौरान गया में धार्मिक गतिविधियां काफी बढ़ जाती हैं। इस अवधि में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पिंडदान और तर्पण के लिए पहुंचते हैं। फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और अन्य पितृकर्म स्थलों के साथ प्रेतशिला भी श्रद्धालुओं के धार्मिक कार्यक्रम का हिस्सा बनती है।

676 सीढ़ियों वाला यह पर्वत इसलिए भी चर्चा में रहता है क्योंकि यहां धार्मिक आस्था के साथ कठिन चढ़ाई भी जुड़ी हुई है। श्रद्धालु इस यात्रा को अपने पितरों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य से जोड़कर देखते हैं।

भूतों का पहाड़’ नाम ने बढ़ाई उत्सुकता

प्रेतशिला को ‘भूतों का पहाड़’ कहे जाने के कारण इसकी चर्चा धार्मिक दायरे से बाहर भी होती है। हालांकि इस नाम के पीछे मुख्य रूप से स्थानीय मान्यताएं, धार्मिक कथाएं और लोकविश्वास बताए जाते हैं। इसे रहस्यमयी या डरावनी जगह के रूप में पेश करने के बजाय इसके वास्तविक धार्मिक महत्व को समझना अधिक जरूरी है।

कुल मिलाकर, गया की प्रेतशिला धार्मिक आस्था, पितृकर्म, लोक परंपरा और प्राचीन मान्यताओं का संगम है। 676 सीढ़ियों की चढ़ाई, प्रेतशिला वेदी और पिंडदान की परंपरा इस स्थान को गया के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अलग पहचान देती है। श्रद्धालुओं के लिए यह जगह पूर्वजों की शांति और मोक्ष की कामना से जुड़ी है, जबकि इसके ‘भूतों के पहाड़’ वाले नाम ने इसे लोगों के बीच एक रहस्यमयी पहचान भी दे दी है।

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