वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान करने वाले कानून को मंजूरी दे दी है। इस कानून के लागू होने से रूस से बड़े पैमाने पर तेल खरीदने वाले देशों में भारत भी शामिल है, जिससे भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
इस कानून को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम दिया गया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को इस विधेयक को 262 वोट के समर्थन और 159 वोट के विरोध के साथ पारित किया था। इससे पहले अगस्त में अमेरिकी सीनेट भी इसे 86-11 के वोट से मंजूरी दे चुकी थी।
कानून के तहत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता है। मौजूदा अमेरिकी सूची में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय हर 180 दिन में इस सूची की समीक्षा करेगा। इसका मतलब है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों की स्थिति समय-समय पर बदली जा सकती है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रूस से आयात कर रहा है। ऐसे में प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ का भारत के व्यापार और ऊर्जा आयात पर असर पड़ सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत ने रूस से कच्चे तेल का आयात तेजी से बढ़ाया। युद्ध से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी काफी कम थी, लेकिन सस्ता रूसी कच्चा तेल मिलने के कारण 2022-23 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।
इसके बाद रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात कई गुना बढ़ा और कई अवधियों में यह रोजाना करीब 16 से 20 लाख बैरल तक पहुंच गया। इससे भारत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल हो गया।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए केवल रूस पर निर्भर नहीं है। रूस के अलावा भारत इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और कतर से भी कच्चा तेल खरीदता है।
इसके अलावा भारत नाइजीरिया, अंगोला, ब्राजील और अमेरिका से भी कच्चे तेल का आयात करता है। हालांकि, रूस से मिलने वाले कच्चे तेल की मात्रा और कीमत भारतीय रिफाइनिंग क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रही है।
अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चर्चा के बीच भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता नहीं करेगी। अब नए अमेरिकी कानून के बाद भारत और अमेरिका के बीच व्यापार तथा ऊर्जा संबंधों पर बातचीत और महत्वपूर्ण हो सकती है।
भारत के सामने एक ओर सस्ते और उपलब्ध कच्चे तेल की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीद को लेकर बढ़ते दबाव से व्यापारिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।