नई दिल्ली/ग्रेटर नोएडा। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी को प्रदर्शन में शामिल होने के मामले में जारी पांच लाख रुपये के निजी मुचलके वाले नोटिस ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचा। 9 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि जब शीर्ष अदालत पहले ही संबंधित छात्र प्रदर्शनों के मामलों में कार्रवाई पर स्पष्ट निर्देश दे चुकी थी, तब ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने छात्र को नोटिस कैसे जारी किया।
मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के बीए-एलएलबी के दूसरे वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। उन्हें 4 सितंबर को कार्यकारी मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। नोटिस में उनसे शांति बनाए रखने के लिए पांच लाख रुपये का निजी मुचलका देने और दो जमानतदारों से भी पांच-पांच लाख रुपये के मुचलके की मांग की गई थी। यह कार्रवाई पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश से जुड़ा पूरा विवाद
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़ी है। 1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रदर्शनों से संबंधित कई एफआईआर को बंद करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि संबंधित छात्र प्रदर्शनों के मामलों में आगे कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए और 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शन से संबंधित मामलों में नई एफआईआर दर्ज करने पर भी रोक लगाई थी।
इसी आदेश के कुछ दिन बाद अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किए जाने पर सवाल उठे। छात्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान उनके वकील ने अदालत को बताया कि नोटिस में पांच लाख रुपये के निजी मुचलके और दो जमानतदारों की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को अपने पहले के निर्देशों के संदर्भ में देखा। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत का आदेश स्पष्ट था और किसी छात्र के खिलाफ इस तरह की जबरन कार्रवाई नहीं की जानी थी। अदालत ने संबंधित प्रशासनिक अधिकारी से स्पष्टीकरण लिए जाने की बात भी कही।
छात्र के खिलाफ क्या आरोप लगाए गए थे?
रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस की ओर से आरोप लगाया गया था कि अक्षत त्रिपाठी विश्वविद्यालय के दूसरे छात्रों के बीच सरकार विरोधी और कथित रूप से भ्रामक बातें फैला रहे थे तथा उन्हें कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे।
पुलिस रिपोर्ट में कानून-व्यवस्था प्रभावित होने और शांति भंग होने की आशंका का उल्लेख किया गया था। इसी आधार पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू करने का आधार बनाया गया। हालांकि, छात्र की ओर से इन आरोपों पर सवाल उठाए गए और नोटिस को सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के विपरीत बताया गया।
यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि नोटिस बाद में वापस ले लिया गया। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि ऐसा कदम उस समय क्यों उठाया गया, जब अदालत पहले ही छात्र प्रदर्शनों से संबंधित मामलों में स्पष्ट निर्देश जारी कर चुकी थी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
9 सितंबर की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत के समक्ष यह बात रखी गई कि सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश में छात्रों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए थे।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने नोटिस कैसे जारी किया। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा जाएगा।
अदालत की टिप्पणी का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि मामला केवल एक छात्र को जारी किए गए नोटिस तक सीमित नहीं रहा। इसमें यह प्रश्न सामने आया कि निचले स्तर के प्रशासनिक अधिकारी उच्चतम न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों का पालन किस प्रकार सुनिश्चित करें।
10 सितंबर को सामने आया बड़ा प्रशासनिक अपडेट
मामले में 10 सितंबर को एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि छात्र को नोटिस जारी करने वाले कार्यकारी मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया गया है। यह जानकारी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को दी।
इससे मामले में प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की तस्वीर सामने आई। हालांकि, निलंबन की जानकारी अदालत में दिए जाने के बाद भी पूरे मामले के कानूनी पहलुओं पर अदालत की कार्यवाही और संबंधित पक्षों के जवाब महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
छात्रों और प्रशासन के बीच अधिकारों का सवाल
यह मामला छात्र आंदोलनों, प्रशासनिक शक्तियों और न्यायालय के निर्देशों के पालन से जुड़े कई कानूनी सवाल सामने लाता है। एक तरफ प्रशासन के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए वैधानिक शक्तियां होती हैं, वहीं दूसरी तरफ अदालत के आदेशों का पालन करना भी सभी संबंधित अधिकारियों के लिए अनिवार्य है।
अक्षत त्रिपाठी के मामले में विवाद इसी बिंदु पर केंद्रित हुआ कि जिस प्रदर्शन से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले ही आदेश जारी कर चुका था, उसी पृष्ठभूमि में एक छात्र के खिलाफ अलग से निवारक कार्रवाई क्यों शुरू की गई।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने इस मामले को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नोटिस वापस लिया जा चुका है और संबंधित कार्यकारी मजिस्ट्रेट के निलंबन की जानकारी भी अदालत को दी गई है। आगे की न्यायिक कार्यवाही में अदालत इस पूरे घटनाक्रम और अधिकारियों की भूमिका पर क्या रुख अपनाती है, यह महत्वपूर्ण रहेगा।