नई दिल्ली: दुनिया में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र के सामने कार्यबल के बढ़ती उम्र और अलग-अलग देशों के बीच स्वास्थ्यकर्मियों के असमान वितरण की चुनौती भी गंभीर होती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के करीब 25 प्रतिशत डॉक्टर 55 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। यानी हर चार में से लगभग एक डॉक्टर रिटायरमेंट की उम्र के करीब पहुंच चुका है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले वर्षों में कई देशों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ा सकती है। अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2030 तक दुनिया में करीब 1.11 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी हो सकती है। 67 देशों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी का खतरा बताया गया है।
रिपोर्ट में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में हुई बढ़ोतरी को सकारात्मक पहलू बताया गया है। वर्ष 2006 में दुनिया में प्रति 10 हजार आबादी पर करीब 44.8 स्वास्थ्यकर्मी थे। वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 67.9 हो गई।
इसका मतलब है कि लगभग दो दशकों में प्रति 10 हजार आबादी पर स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता में करीब 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालांकि, यह वृद्धि सभी देशों और क्षेत्रों में समान नहीं रही है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की औसत उम्र बढ़ना आने वाले समय के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। बड़ी संख्या में डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी आने वाले वर्षों में सेवानिवृत्त हो सकते हैं। यदि उनकी जगह पर्याप्त संख्या में नए स्वास्थ्यकर्मी तैयार नहीं हुए तो अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों का दबाव बढ़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत समेत जिस आयु-समूह वाले देशों की बात की गई है, वहां बुजुर्ग आबादी भी तेजी से बढ़ने की संभावना है। वर्ष 2024 से 2030 के बीच 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी में करीब 26 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। बुजुर्ग आबादी बढ़ने के साथ इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग भी बढ़ने की संभावना है।
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 55 वर्ष से अधिक उम्र के डॉक्टरों की हिस्सेदारी करीब 12 प्रतिशत है। यह वैश्विक औसत करीब 25 प्रतिशत से कम है।
हालांकि, भारत के लिए चुनौती केवल डॉक्टरों की उम्र से जुड़ी नहीं है। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और डॉक्टरों के वितरण में भी क्षेत्रीय अंतर देखने को मिलता है। शहरों की तुलना में ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
डॉक्टरों की कमी का असर सीधे मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की संख्या कम होने पर मरीजों की लंबी कतारें लग सकती हैं और इलाज के लिए इंतजार बढ़ सकता है।
सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिलने पर कई मरीज निजी अस्पतालों का रुख करते हैं। निजी इलाज की अधिक लागत परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकती है।
अस्पतालों में मरीजों की संख्या अधिक होने और डॉक्टरों पर काम का दबाव बढ़ने से प्रत्येक मरीज को पर्याप्त समय देना भी मुश्किल हो सकता है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और मरीजों की देखभाल पर असर पड़ने की चिंता बढ़ती है।
ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी का असर और गंभीर हो सकता है। कई स्वास्थ्य केंद्रों में चिकित्सकों के पद खाली रहने के कारण लोगों को सामान्य इलाज के लिए भी नजदीकी शहरों का रुख करना पड़ता है।
गंभीर बीमारी या आपात स्थिति में लंबी दूरी तय करना मरीजों के लिए अतिरिक्त परेशानी पैदा कर सकता है। ऐसे में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें जरूरत वाले क्षेत्रों तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण चुनौती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, लेकिन बढ़ती वैश्विक आबादी, बुजुर्गों की संख्या में इजाफा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग को देखते हुए यह वृद्धि पर्याप्त नहीं हो सकती।
रिपोर्ट में स्वास्थ्यकर्मियों की नई पीढ़ी तैयार करने, प्रशिक्षण बढ़ाने और जरूरत के मुताबिक डॉक्टरों तथा नर्सों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देशों को स्वास्थ्य क्षेत्र में मानव संसाधन की योजना पर अधिक ध्यान देना होगा।