आलू की कीमतों का गणित इस समय किसान और उपभोक्ता दोनों के लिए अलग-अलग तस्वीर दिखा रहा है। एक तरफ शहरों की कॉलोनियों में लोग 100 रुपये में करीब 6-7 किलो आलू खरीद रहे हैं, यानी खुदरा कीमत लगभग 14-17 रुपये किलो के आसपास बैठती है। दूसरी तरफ किसान के लिए उसी आलू की कीमत बेहद कम है। कोल्ड स्टोरेज से निकलने वाली 50-55 किलो की बोरी के लिए किसानों को कथित तौर पर 460 से 600 रुपये तक मिल रहे हैं। यानी कीमत का बड़ा अंतर खेत और बाजार के बीच दिखाई देता है।
आलू का मौजूदा सीजन किसानों के लिए सामान्य तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी समय पुरानी फसल की बिक्री, भंडारण और अगली फसल की तैयारी साथ-साथ चलती है। कई इलाकों में किसान अगैती आलू की बुवाई शुरू कर चुके हैं। ऐसे समय में यदि किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता तो उसकी पूरी कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। खेत में तैयार फसल बेचने से मिलने वाली रकम से सिर्फ परिवार का खर्च नहीं चलता, बल्कि अगली फसल के लिए बीज, खाद, डीजल, मजदूरी, सिंचाई और परिवहन जैसी लागत भी निकालनी होती है।
मान लीजिए किसी किसान को 50 किलो की बोरी के 500 रुपये मिलते हैं। कागज पर यह रकम ठीक दिखाई दे सकती है, लेकिन इसमें से उत्पादन, भंडारण, ढुलाई और दूसरे खर्च घटाने के बाद किसान के हाथ में बचने वाला पैसा काफी कम हो जाता है। यदि किसान की वास्तविक लागत अधिक है तो बेचने वाली कीमत उसके लिए मुनाफा नहीं, बल्कि लागत की भरपाई का सवाल बन जाता है। यही वह जगह है जहां कृषि उपज की कीमत का असली संकट दिखाई देता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसान की उपज खेत या कोल्ड स्टोरेज से निकलने के बाद उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते इतनी महंगी क्यों हो जाती है।
किसान और ग्राहक के बीच मंडी, व्यापारी, परिवहन, कोल्ड स्टोरेज और खुदरा कारोबार की कई कड़ियां होती हैं। हर स्तर पर खर्च और मार्जिन जुड़ता है। लेकिन अगर अंतिम कीमत में बढ़ोतरी का लाभ किसान तक नहीं पहुंच रहा, तो असली कीमत की पारदर्शिता और किसानों की सौदेबाजी की क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। किसान के सामने केवल आज की बिक्री का संकट नहीं है। उसे आने वाले मौसम की भी चिंता करनी होती है। अगली फसल के लिए खेत तैयार करना है, बीज खरीदना है, खाद और दवाइयों का इंतजाम करना है।
घर में बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, राशन और रोजमर्रा के खर्जे भी उसी पैसे से पूरे होने हैं। ऐसे में 50-55 किलो आलू की बोरी बेचकर मिलने वाली कुछ सौ रुपये की रकम को किसान की पूरी आमदनी मान लेना खेती की वास्तविक लागत को नजरअंदाज करना होगा। मौसम के उतार चढ़ाव ने इस चुनौती को और कठिन बना दिया है। कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ फसलों को नुकसान पहुंचा रही है तो कहीं कम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियां किसानों के सामने समस्या खड़ी कर रही हैं। ऐसे माहौल में पैदावार और बाजार में मिलने वाली कीमत यह दोनों का जोखिम किसान के हिस्से में आती है। फसल अच्छी हुई तो कीमत गिरने का खतरा, उत्पादन प्रभावित हुआ तो लागत निकालने का संकट, किसान दोनों परिस्थितियों के दबाव में रहता है।

आलू जैसी रोजमर्रा की जरूरत की खेती में उपभोक्ता को भी सस्ती कीमत चाहिए और किसान को भी लाभकारी कीमत । दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाना कृषि बाजार की सबसे बड़ी चुनौती है। समाधान केवल कीमत बढ़ाने या घटाने में नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने में है जिसमें किसान को उसकी लागत और मेहनत के अनुरूप पारदर्शी कीमत भी मिले और उपभोक्ता पर भी अनावश्यक बोझ न पड़े।इसके लिए मंडी व्यवस्था, भंडारण लागत, बिचौलियों की मार्जिन, परिवहन खर्च और खुदरा कीमत के बीच अंतर की नियमित निगरानी जरूरी है।
किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करना, स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण की सुविधा बढ़ाना और बाजार की वास्तविक कीमतों की जानकारी किसानों तक पहुंचाना भी उपयोगी कदम हो सकते हैं। इससे किसान मजबूरी में कम कीमत पर अपनी फसल बेचने के बजाय बेहतर विकल्प तलाश सकता है।आलू की बोरी में केवल एक खेतों की उपज नहीं होती है, उसमें किसान का बीज, मेहनत, खेत का किराया, पानी, डीजल, मजदूरी और कई महीनों का इंतजार शामिल होता है। जब वही आलू शहर में हमारे आप के हाथ तक पहुंचता है तो उसकी कीमत बढ़ जाती है, लेकिन उस बढ़ी हुई कीमत का उचित हिस्सा उस किसान तक पहुंचे जिसने उसे पैदा किया, यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण बात है।
देश की अर्थव्यवस्था और खाद्य व्यवस्था में किसान की भूमिका पर अक्सर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। लेकिन किसान की वास्तविक मजबूती तभी होगी जब उसकी फसल की कीमत भी उसकी मेहनत का सम्मान करे। किसान से यह उम्मीद करना कि वह कम दाम में फसल बेचे, बढ़ती लागत उठाए, अगली बुवाई करे, परिवार चलाए और फिर भी लगातार उत्पादन करता रहे तो यह व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकती है । आलू की कीमत का यह अंतर केवल बाजार का आंकड़ा नहीं, बल्कि खेत और शहर के बीच मौजूद आर्थिक दूरी की सच्ची तस्वीर है |