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हैलोवीन में कद्दू क्यों बनता है डरावना जैक-ओ-लैंटर्न?

हर साल 31 अक्टूबर को दुनिया के कई देशों में हैलोवीन का त्योहार उत्साह के साथ मनाया जाता है।

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  • October 6, 2026 9:30 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली। हर साल 31 अक्टूबर को दुनिया के कई देशों में हैलोवीन का त्योहार उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन डरावने परिधान, भूतिया सजावट, रहस्यमयी कहानियां और खास तौर पर चेहरे की आकृति में तराशे गए कद्दू लोगों का ध्यान खींचते हैं। इन्हीं कद्दुओं को आमतौर पर ‘जैक-ओ-लैंटर्न’ कहा जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हैलोवीन पर कद्दू को ही डरावना चेहरा देने की परंपरा क्यों बनी और इसके पीछे की कहानी क्या है?

हैलोवीन की आधुनिक पहचान भले ही पश्चिमी देशों की लोकप्रिय संस्कृति से जुड़ी दिखाई देती हो, लेकिन इसकी जड़ें यूरोप की प्राचीन परंपराओं में मानी जाती हैं। समय के साथ धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और स्थानीय रीति-रिवाजों का मेल हुआ और हैलोवीन ने मौजूदा स्वरूप ग्रहण किया। आज यह त्योहार केवल डर और रहस्य तक सीमित नहीं है, बल्कि कई जगहों पर बच्चों के लिए मनोरंजन, पोशाक प्रतियोगिता, सजावट और ‘ट्रिक ऑर ट्रीट’ जैसी गतिविधियों का भी हिस्सा है।

आखिर 31 अक्टूबर को ही क्यों मनाया जाता है हैलोवीन?

हैलोवीन हर वर्ष 31 अक्टूबर को मनाया जाता है और इसके अगले दिन कई ईसाई परंपराओं में ऑल सेंट्स डे मनाया जाता है। हैलोवीन शब्द को सामान्यतः All Hallows’ Eve से जुड़ा माना जाता है, जिसका अर्थ ऑल सेंट्स डे की पूर्व संध्या से संबंधित है।

हालांकि आधुनिक हैलोवीन का स्वरूप कई अलग-अलग परंपराओं से विकसित हुआ है। इसके इतिहास को आयरलैंड और स्कॉटलैंड सहित ब्रिटिश द्वीपों में प्रचलित प्राचीन Samhain उत्सव से भी जोड़ा जाता है। यह त्योहार फसल के मौसम के अंत और सर्दियों की शुरुआत के समय मनाया जाता था।

प्राचीन मान्यताओं में यह समय जीवित दुनिया और मृतकों की दुनिया के बीच दूरी कम होने से जोड़ा जाता था। इसी कारण इस अवधि से जुड़ी लोककथाओं में आत्माओं, रहस्यमयी शक्तियों और अलौकिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है।

कद्दू और जैक-ओ-लैंटर्न की कहानी क्या है?

हैलोवीन पर कद्दू को काटकर उसमें आंख, नाक और मुंह जैसी आकृतियां बनाने की परंपरा बेहद लोकप्रिय है। अंदर रोशनी रखने के बाद यह कद्दू अंधेरे में चमकता हुआ नजर आता है। यही कारण है कि हैलोवीन की सजावट में जैक-ओ-लैंटर्न को खास स्थान मिला है।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में इस परंपरा में कद्दू का इस्तेमाल नहीं होता था। ब्रिटिश द्वीपों की कुछ लोक परंपराओं में शलजम और अन्य जड़ वाली सब्जियों को खोखला करके उनमें डरावने चेहरे बनाए जाते थे। बाद में जब यह परंपरा अमेरिका पहुंची, तो वहां आसानी से उपलब्ध बड़े आकार के कद्दू ने इस परंपरा को नया रूप दे दिया।

कद्दू आकार में बड़ा होने के साथ-साथ अंदर से अपेक्षाकृत आसानी से खोखला किया जा सकता है। इसकी मोटी बाहरी परत पर अलग-अलग आकृतियां बनाना भी आसान होता है। यही वजह है कि धीरे-धीरे कद्दू जैक-ओ-लैंटर्न का सबसे लोकप्रिय रूप बन गया।

कौन था जैक और क्या है जैक-ओ-लैंटर्न की लोककथा?

जैक-ओ-लैंटर्न नाम के पीछे आयरिश लोककथाओं की एक चर्चित कहानी बताई जाती है। इसमें ‘स्टिंगी जैक’ नामक व्यक्ति का उल्लेख मिलता है। लोककथा के अनुसार जैक चालाक और स्वार्थी व्यक्ति था, जिसने कथित तौर पर शैतान को कई बार अपनी चाल में फंसाया।

कहानी के अलग-अलग संस्करणों में घटनाओं का विवरण अलग मिलता है। एक लोकप्रिय संस्करण के अनुसार जैक ने शैतान को एक पेड़ पर चढ़ने के लिए राजी किया और फिर ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि शैतान आसानी से नीचे नहीं उतर सके। बाद में दोनों के बीच एक समझौता हुआ।

लोककथा आगे बताती है कि जैक की मृत्यु के बाद उसे न स्वर्ग में स्थान मिला और न ही नरक में। उसे अंधेरे में भटकने के लिए छोड़ दिया गया और उसके रास्ते को रोशन करने के लिए उसके पास केवल एक जलता हुआ कोयला था, जिसे उसने खोखली सब्जी के अंदर रख लिया।

इसी तरह की लोककथाओं से ‘जैक ऑफ द लैंटर्न’ और बाद में जैक-ओ-लैंटर्न नाम के लोकप्रिय होने की कहानी जोड़ी जाती है। हालांकि इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोककथा के रूप में समझना अधिक उचित है।

डरावना चेहरा बनाने के पीछे क्या है मान्यता?

हैलोवीन पर कद्दू को डरावना चेहरा देने की परंपरा को कई लोक मान्यताओं से जोड़ा जाता है। पुराने समय में ऐसी धारणा थी कि डरावने चेहरे और रोशनी का इस्तेमाल बुरी आत्माओं या नकारात्मक शक्तियों को दूर रखने के लिए किया जा सकता है।

आज अधिकांश लोग जैक-ओ-लैंटर्न को धार्मिक विश्वास से अधिक हैलोवीन की सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखते हैं। बच्चे और परिवार मिलकर कद्दू खरीदते हैं, उसे खोखला करते हैं और अपनी पसंद के चेहरे बनाते हैं। कुछ लोग बेहद डरावने चेहरे बनाते हैं, जबकि कई लोग मजेदार या रचनात्मक डिजाइन भी तैयार करते हैं।

भारत में कद्दू का अलग सांस्कृतिक महत्व

दिलचस्प बात यह है कि भारतीय संस्कृति में भी कद्दू का अपना विशेष महत्व है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कद्दू का इस्तेमाल भोजन, धार्मिक अनुष्ठानों और लोक परंपराओं में होता है। कुछ क्षेत्रों में इसे शुभता और समृद्धि से जोड़कर भी देखा जाता है।

यानी एक ही सब्जी अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग अर्थ रख सकती है। पश्चिमी देशों में जहां हैलोवीन के दौरान कद्दू डरावनी सजावट का प्रतीक बन गया है, वहीं भारत में कद्दू सामान्य जीवन, खान-पान और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा है।

आज हैलोवीन का बदल चुका है पूरा अंदाज

समय के साथ हैलोवीन एक बड़े सांस्कृतिक और मनोरंजन आधारित आयोजन में बदल गया है। घरों और बाजारों को डरावनी थीम पर सजाया जाता है। लोग चुड़ैल, भूत, वैम्पायर और अन्य काल्पनिक पात्रों की पोशाक पहनते हैं। बच्चे घर-घर जाकर मिठाइयां मांगते हैं और ‘ट्रिक ऑर ट्रीट’ जैसी गतिविधियों में शामिल होते हैं।

सोशल मीडिया ने भी हैलोवीन को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। अब जैक-ओ-लैंटर्न केवल घर की सजावट नहीं, बल्कि फोटो और वीडियो के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन चुका है।

इस तरह हैलोवीन का डरावना कद्दू केवल सजावट की वस्तु नहीं है। इसके पीछे यूरोपीय लोक परंपराओं, प्रवासी संस्कृति, लोककथाओं और अमेरिकी लोकप्रिय संस्कृति का लंबा सफर जुड़ा हुआ है। जैक-ओ-लैंटर्न की चमक आज भी लोगों को आकर्षित करती है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी इसे और भी दिलचस्प बना देती है।

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