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छेड़खानी विवाद के बाद दिल्ली पुलिस अधिकारियों को बॉडी कैमरा अनिवार्य

अब बॉडी कैमरों की अनिवार्यता को ऐसे मामलों में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। यदि भविष्य में ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारियों पर किसी तरह के दुर्व्यवहार या गलत आचरण के आरोप लगते हैं, तो बॉडी कैमरे में दर्ज फुटेज से घटनाक्रम की जांच में मदद मिल सकती है। हालांकि, कैमरों की उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि रिकॉर्डिंग को किस तरह सुरक्षित रखा जाता है और शिकायत या जांच की स्थिति में उसे

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  • October 6, 2026 11:01 am IST, Published 22 seconds ago

नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस के अधिकारियों और जवानों को अब बॉडी कैमरे के साथ ड्यूटी करते देखा जाएगा। पुलिस विभाग ने अधिकारियों को बॉडी कैमरे उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और 6 अक्टूबर से इनका इस्तेमाल किया जा रहा है। नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा समेत कई पुलिस अधिकारियों को बॉडी कैमरे दिए गए हैं। खास तौर पर एसीपी और उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों के लिए बॉडी कैमरा पहनना अनिवार्य किया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और ड्यूटी के दौरान होने वाली घटनाओं का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना है।

बॉडी कैमरा पुलिसकर्मी की वर्दी पर लगाया जाता है और ड्यूटी के दौरान सामने होने वाली गतिविधियों की वीडियो रिकॉर्डिंग करता रहता है। किसी विवाद, शिकायत या आरोप की स्थिति में यह रिकॉर्डिंग जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकती है। अधिकारियों के मुताबिक, इससे पुलिस और आम लोगों के बीच होने वाले विवादों की वास्तविक स्थिति समझने में भी मदद मिल सकती है। खासकर संवेदनशील इलाकों और प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर उठने वाले सवालों की जांच में कैमरे की रिकॉर्डिंग उपयोगी हो सकती है।

दिल्ली पुलिस की ओर से यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब हाल ही में जंतर-मंतर के आसपास हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ महिला पत्रकारों ने पुलिस अधिकारियों पर छेड़खानी और बदसलूकी के आरोप लगाए थे। बताया गया कि 3 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने एसीपी विवेक भगत समेत तीन पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए। घटना के बाद मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा में रहा और पुलिस के व्यवहार तथा महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे।

महिला पत्रकारों की ओर से लगाए गए आरोपों के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी बहस हुई। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद पत्रकारों ने कथित तौर पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिसकर्मियों के व्यवहार और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई।

कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मामले पर सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आरोप लगाया कि एक महिला पत्रकार ने पुलिस अधिकारी पर बदसलूकी का आरोप लगाया, लेकिन लंबे समय तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। राहुल गांधी ने कहा कि यह पुलिस का बुनियादी काम है और इससे पहले भी पुलिस अधिकारियों पर महिलाओं के साथ बदसलूकी के आरोप सामने आते रहे हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में वीडियो साक्ष्यों का भी उल्लेख किया।

अब बॉडी कैमरों की अनिवार्यता को ऐसे मामलों में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। यदि भविष्य में ड्यूटी के दौरान पुलिस अधिकारियों पर किसी तरह के दुर्व्यवहार या गलत आचरण के आरोप लगते हैं, तो बॉडी कैमरे में दर्ज फुटेज से घटनाक्रम की जांच में मदद मिल सकती है। हालांकि, कैमरों की उपयोगिता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि रिकॉर्डिंग को किस तरह सुरक्षित रखा जाता है और शिकायत या जांच की स्थिति में उसे किस प्रक्रिया के तहत इस्तेमाल किया जाता है।

दिल्ली पुलिस के लिए यह व्यवस्था केवल निगरानी का माध्यम नहीं, बल्कि पुलिसिंग में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रयास भी है। आने वाले समय में बॉडी कैमरों से मिलने वाली रिकॉर्डिंग यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि किसी विवादित घटना में वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं।

 

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