भारत में पानी का संकट अब किसी एक राज्य, शहर या इलाके की समस्या नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे पूरे देश के सामने खड़ी होती जा रही ऐसी चुनौती है, जिसका असर खेती, उद्योग, शहरों और आम आदमी की जिंदगी पर दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहां पानी की कमी है, वहां भी ऐसी फसलों का रकबा बढ़ता जा रहा है जिन्हें पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। महाराष्ट्र का बीड इसका एक बड़ा उदाहरण है। जिस इलाके में पहले से पानी की समस्या गंभीर रही है, वहां गन्ने की खेती लगभग 1.88 लाख हेक्टेयर से बढ़कर करीब 3 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई। महाराष्ट्र में गन्ना कुल कृषि क्षेत्र का छोटा हिस्सा है, लेकिन भूजल के इस्तेमाल में उसका हिस्सा बहुत बड़ा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि गन्ना कितना पानी पीता है, सवाल यह भी है कि पानी की कमी वाले इलाके में आखिर ऐसी खेती को बढ़ावा क्यों मिलता रहा?
इसके पीछे सिर्फ किसान को दोष देना आसान रास्ता है, लेकिन पूरी तस्वीर उससे कहीं बड़ी है। गन्ने की खेती किसान के लिए इसलिए आकर्षक होती है क्योंकि उसे बाजार, चीनी मिल और कीमत की अपेक्षाकृत निश्चित व्यवस्था मिल जाती है। किसान को भरोसा रहता है कि उसकी फसल खरीदी जाएगी। दूसरी तरफ सरकारों की राजनीति भी गन्ने और चीनी उद्योग से जुड़ी हुई है। चीनी मिलें सिर्फ खेती से जुड़ा कारोबार नहीं हैं, बल्कि इनके साथ रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और राजनीति भी जुड़ी होती है। इसलिए पानी की उपलब्धता से ज्यादा कई बार उद्योग को बचाए रखना प्राथमिकता बन जाता है।
महाराष्ट्र में चीनी मिलों की संख्या और गन्ने का विस्तार इसी बड़े सवाल की तरफ इशारा करता है। जिस राज्य के कई हिस्सों में गर्मियों के दौरान पानी की कमी गंभीर रूप ले लेती है, वहां गन्ने जैसी पानी की अधिक मांग वाली फसल का इतना विस्तार आखिर कब तक टिकाऊ रह सकता है? दस साल में खेती का क्षेत्र डेढ़ गुना बढ़ जाना सिर्फ खेती की सफलता की कहानी नहीं है। इसे पानी के भविष्य के संदर्भ में भी देखना होगा। भूजल कोई ऐसा बैंक खाता नहीं है जिसे हर साल खाली करके फिर से भर लिया जाए। बारिश कम हुई, जमीन के भीतर पानी का स्तर नीचे गया और हमने उससे ज्यादा पानी निकाल लिया, तो एक समय ऐसा आएगा जब पंप चलाने पर भी पानी नहीं मिलेगा।
यह समस्या आज अचानक पैदा नहीं हुई है। वर्ष 2016 में भी महाराष्ट्र के कई इलाकों में पानी की स्थिति इतनी खराब हुई थी कि पानी पहुंचाने के लिए ट्रेन तक चलानी पड़ी थी। लेकिन अगर वर्षों बाद भी उसी तरह की स्थिति दोबारा सामने आती है तो इसका अर्थ है कि हमने समस्या से सबक लेने के बजाय संकट आने के बाद उसका इंतजाम करने की आदत बना ली है। 2026 में अगर नागरिकों की जरूरत पूरी करने के लिए ट्रेन से पानी पहुंचाने की नौबत आती है तो यह सिर्फ प्रशासन की एक उपलब्धि नहीं, बल्कि हमारी जल नीति पर गंभीर सवाल है। टैंकर, ट्रेन और अस्थायी जलापूर्ति किसी आपात स्थिति में जरूरी हो सकते हैं, लेकिन इन्हें स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

सरकार अगर पानी की खपत में दस प्रतिशत कटौती करने की बात करती है तो यह कदम अपनी जगह जरूरी हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ दस प्रतिशत कटौती से समस्या हल हो जाएगी? जब एक तरफ शहरों में पानी बचाने की अपील होती है और दूसरी तरफ पानी की भारी मांग वाली फसलों का विस्तार जारी रहता है, तो नीति में विरोधाभास साफ दिखाई देता है। आम नागरिक से कहा जाता है कि नल खुला न छोड़ें, पानी बर्बाद न करें, लेकिन बड़े स्तर पर पानी के इस्तेमाल और फसल के चुनाव को लेकर वही सख्ती दिखाई नहीं देती।
इसका दूसरा पहलू उत्तर प्रदेश और बिहार की चीनी मिलों का इतिहास है। कभी पूर्वांचल चीनी मिलों का बड़ा केंद्र हुआ करता था। गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती और आसपास के इलाकों में चीनी उद्योग से हजारों किसानों और मजदूरों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई थी। लेकिन समय के साथ कई मिलें बंद होती चली गईं। कहीं मिलें आर्थिक रूप से कमजोर हुईं, कहीं प्रबंधन की समस्याएं सामने आईं, कहीं पुरानी मशीनरी और बढ़ती लागत ने कारोबार को नुकसान पहुंचाया। बिहार में भी कई चीनी मिलों के बंद होने का असर सिर्फ उद्योग पर नहीं पड़ा, बल्कि किसानों की पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में कुछ बंद मिलों को दोबारा शुरू करने की कोशिश हुई है और कुछ जगहों पर उत्पादन भी शुरू हुआ है। यह अच्छी बात है, लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या सिर्फ मिल शुरू कर देना पर्याप्त है? किसान को उचित कीमत, समय पर भुगतान, बेहतर सिंचाई और ऐसी कृषि व्यवस्था भी चाहिए जो आने वाले वर्षों में पानी की स्थिति को ध्यान में रखे। एक तरफ हम चीनी उद्योग को बचाना चाहते हैं और दूसरी तरफ पानी के संकट को भी बढ़ने नहीं देना चाहते। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना ही असली चुनौती है।

पानी की समस्या अब महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। कुछ समय पहले बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में भी पीने के पानी को लेकर गंभीर चिंता सामने आई। जिस शहर को भारत के आधुनिक और तकनीकी विकास का प्रतीक माना जाता है, वहां पानी के लिए लोगों को परेशान होना पड़ा। इससे समझ आता है कि आर्थिक विकास और जल सुरक्षा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। अगर शहर बढ़ेंगे, आबादी बढ़ेगी, उद्योग बढ़ेंगे और भूजल का इस्तेमाल उसी रफ्तार से बढ़ता रहेगा, तो एक दिन शहरों की चमक के पीछे पानी का संकट खड़ा मिलेगा।
और यह बात सिर्फ सूखे इलाकों के लिए नहीं है। मेघालय जैसे अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र में स्थित चेरापूंजी का उदाहरण भी हमें सोचने पर मजबूर करता है। दुनिया में भारी बारिश के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके में भी पानी की उपलब्धता को लेकर समस्या पैदा हो सकती है। बारिश का होना और पानी का जमीन में सुरक्षित रहना दो अलग बातें हैं। अगर बारिश का पानी तेजी से बह जाए, जंगल और प्राकृतिक जलस्रोत कमजोर हों और भूजल का पुनर्भरण पर्याप्त न हो, तो बहुत बारिश वाले इलाके में भी गर्मियों में पानी की परेशानी हो सकती है।
दूसरी तरफ देश के कई हिस्से बाढ़ से जूझ रहे हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में नदियों का जलस्तर बढ़ने से हर साल बड़ी आबादी प्रभावित होती है। नेपाल से आने वाली नदियों का पानी बिहार के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। जब बारिश ज्यादा होती है और नदियों में पानी बढ़ता है तो गांवों में रहने वाले लोगों के घर, खेत और सड़कें पानी में डूब जाती हैं। असम में भी बाढ़ किसी एक साल की घटना नहीं है, बल्कि लंबे समय से लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। सवाल यह है कि एक ही देश में कहीं लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए परेशान हैं और कहीं वही पानी गांवों को डुबो रहा है। इसका मतलब साफ है कि समस्या केवल पानी की मात्रा की नहीं, बल्कि पानी के प्रबंधन की भी है।
लखनऊ में गोमती नदी का बढ़ता जलस्तर भी हमें यही बताता है कि बारिश का पैटर्न बदल रहा है और शहरों का अपना प्राकृतिक ढांचा भी कमजोर हुआ है। नदियों के किनारे निर्माण, जल निकासी की कमजोर व्यवस्था और अचानक होने वाली तेज बारिश शहरों के लिए खतरा बढ़ा देती है। जलवायु परिवर्तन ने इस पूरी स्थिति को और कठिन बना दिया है। कभी बारिश देर से आती है, कभी बहुत कम समय में इतनी बारिश हो जाती है कि शहर उसे संभाल नहीं पाते और कभी लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है।
दिल्ली की कहानी भी इससे अलग नहीं है। राजधानी लंबे समय से वायु प्रदूषण के संकट से जूझ रही है। हर साल सर्दियों में पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की समस्या चर्चा में आती है। सरकारें कदम उठाती हैं, योजनाएं बनती हैं और कुछ सुधार भी दिखाई देते हैं, लेकिन समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। इसी तरह अरावली की पहाड़ियों और उसके आसपास पर्यावरण से जुड़े विवाद भी समय-समय पर सामने आते हैं। कुछ दिन बहस होती है, सोशल मीडिया पर चर्चा होती है और फिर हम अगली खबर की तरफ बढ़ जाते हैं।

शायद सबसे बड़ा संकट यही है कि हमने सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों को लेकर अपनी संवेदनशीलता कम कर दी है। जब पानी नहीं होता तो हम सरकार को दोष देते हैं, जब बाढ़ आती है तो प्रशासन को दोष देते हैं, जब हवा खराब होती है तो पड़ोसी राज्य को दोष देते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि हमारी नीतियां लंबे समय के लिए क्या तैयारी कर रही हैं? नीति बनाने वालों के सामने कठिन संतुलन है। उन्हें किसानों के हित देखने हैं, चीनी उद्योग को भी चलाना है, मिलों से जुड़े रोजगार बचाने हैं और उन राजनीतिक हितों को भी संभालना है जो इन उद्योगों के साथ जुड़े होते हैं। लेकिन इसके साथ उन्हें यह भी तय करना होगा कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी कहां से आएगा। किसी उद्योग को बचाने के लिए अगर भूजल लगातार खाली होता रहा तो कुछ वर्षों बाद वही उद्योग भी नहीं बचेगा और किसान भी नहीं।
इसलिए जरूरत केवल पानी बचाने के नारे की नहीं है। जरूरत ऐसी कृषि नीति की है जिसमें फसल का चुनाव उस इलाके की पानी की उपलब्धता के हिसाब से हो। जहां पानी कम है वहां कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन मिले और किसान को सिर्फ यह कहकर न छोड़ा जाए कि गन्ना मत उगाओ। अगर किसी किसान को गन्ने से मिलने वाली आय का भरोसा हटाना है तो सरकार को वैकल्पिक फसल, बाजार, कीमत और खरीद की व्यवस्था भी देनी होगी। इसी तरह चीनी मिलों को भी पानी, ऊर्जा और पर्यावरण के इस्तेमाल के आधार पर जवाबदेह बनाना होगा। भारत के सामने आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पानी की होगी। कहीं सूखा होगा, कहीं बाढ़ होगी, कहीं भूजल नीचे जाएगा और कहीं शहर पानी के लिए परेशान होंगे। इसलिए पानी को सिर्फ संकट आने के बाद संभालने की चीज नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधन की तरह देखना होगा।
ट्रेन से पानी पहुंचाना किसी शहर या जिले के लिए तत्काल राहत हो सकती है, लेकिन देश का भविष्य ट्रेनों और टैंकरों पर नहीं चल सकता। भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम बारिश की हर बूंद को कितना बचाते हैं, भूजल को कितना recharge करते हैं, नदियों और तालाबों को कितना जीवित रखते हैं और अपनी खेती तथा उद्योग को उपलब्ध पानी के हिसाब से कितना बदलते हैं। सवाल यह नहीं है कि अगली बार पानी की ट्रेन कब आएगी। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसा इंतजाम कर पाएंगे कि उसे बुलाने की जरूरत ही न पड़े।