प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पारिवारिक संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े करीब दो दशक पुराने विवाद में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी महिला का विधवा होना उसके विवाह और पति की मृत्यु से तय होता है। पति की मृत्यु के बाद उस महिला पर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ कथित अवैध संबंध का आरोप लगने मात्र से उसकी विधवा की कानूनी स्थिति खत्म नहीं हो जाती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे आरोपों के आधार पर महिला को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अनिल कुमार की एकल पीठ ने बलिया से जुड़े वर्ष 2001 से लंबित प्रथम अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने संतान की वैधता से जुड़े दावे पर भी महत्वपूर्ण बात कही। कोर्ट के मुताबिक, किसी व्यक्ति को केवल मौखिक आरोपों या दावों के आधार पर वैध संतान और कानूनी उत्तराधिकारी के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि किसी संतान की वैधता को चुनौती दी जाती है तो उसके लिए कानून में निर्धारित मानकों के अनुरूप ठोस, स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी होगा।
यह विवाद बलिया जिले के एक परिवार से संबंधित है। मामले के मुताबिक, स्वर्गीय श्रीपति पांडे के तीन बेटे राम अवध पांडे, विंध्याचल पांडे और जगत नारायण पांडे थे। विंध्याचल पांडे का विवाह राजेश्वरी देवी से हुआ था। वर्ष 1938 में विंध्याचल पांडे की मृत्यु हो गई थी और उनके कोई संतान नहीं थी। इसके बाद परिवार में संपत्ति और उत्तराधिकार को लेकर विवाद खड़ा हुआ। स्वर्गीय राम अवध पांडे के पुत्र हरिशंकर पांडे ने वर्ष 1988 में मूल दीवानी वाद दाखिल किया था। उन्होंने अदालत से यह घोषित करने की मांग की थी कि राजेश्वरी देवी को विंध्याचल पांडे की विधवा नहीं माना जाए। साथ ही उन्होंने शिव सागर और शिव कुमार के संबंध में भी दावा किया कि वे स्वर्गीय राम अवध पांडे के वैध पुत्र और कानूनी उत्तराधिकारी नहीं हैं।
वादी पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि राजेश्वरी देवी के कथित दूसरे संबंध के कारण उन्होंने अपने पहले पति की विधवा के तौर पर कानूनी हैसियत और उससे जुड़े अधिकार खो दिए थे। मामले में यह दावा भी किया गया कि संबंधित दोनों बच्चे राम अवध पांडे और राजेश्वरी देवी के संबंध से पैदा हुए थे, इसलिए उन्हें राम अवध पांडे के वैध पुत्र और उत्तराधिकारी नहीं माना जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इन दावों पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला की वैधानिक स्थिति को केवल सामाजिक आरोपों या कथित आचरण के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। इसी तरह किसी संतान की वैधता पर सवाल उठाने के लिए भी महज आरोप पर्याप्त नहीं हैं। अदालत के सामने ऐसे दावे को साबित करने के लिए कानून के मुताबिक विश्वसनीय साक्ष्य होना जरूरी है।
अदालत की इस टिप्पणी का सीधा संबंध संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों से है। कोर्ट ने संकेत दिया कि पारिवारिक विवादों में रिश्तों को लेकर लगाए गए आरोपों और कानूनी अधिकारों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति की वैधानिक स्थिति बदलने के लिए सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि कानून के अनुरूप प्रमाण आवश्यक हैं।
इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में अदालतें केवल मौखिक दावों के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाल सकतीं। संबंधित पक्ष को अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त और भरोसेमंद साक्ष्य प्रस्तुत करना होगा। इस मामले में हाईकोर्ट ने प्रथम अपील को स्वीकार करते हुए लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक विवाद पर अपना निर्णय सुनाया।