हलाला रेप FIR रद्द नहीं होगी, इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला के नाम पर कथित यौन शोषण और गैंगरेप के आरोपों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला के साथ हलाला जैसी प्रथा की आड़ में यौन शोषण या दुष्कर्म […]

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  • July 5, 2026 6:30 pm IST, Published 1 hour ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला के नाम पर कथित यौन शोषण और गैंगरेप के आरोपों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला के साथ हलाला जैसी प्रथा की आड़ में यौन शोषण या दुष्कर्म के आरोप लगाए गए हैं, तो केवल धार्मिक परंपरा का हवाला देकर प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि कानून सभी नागरिकों के लिए समान है और किसी भी धार्मिक या सामाजिक प्रथा के नाम पर महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।

यह मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से जुड़ा है, जहां एक महिला ने आरोप लगाया कि कम उम्र में उसका निकाह कराया गया। बाद में उसे तीन तलाक दिया गया और फिर निकाह हलाला के नाम पर उसके साथ कई बार यौन शोषण किया गया। महिला ने अपनी शिकायत में गैंगरेप सहित गंभीर आरोप लगाए थे, जिसके आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की।

FIR रद्द करने की मांग लेकर पहुंचे थे आरोपी

मामले में नामजद आरोपियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर FIR रद्द करने और अपनी गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग की थी। उनका तर्क था कि पूरा मामला निकाह हलाला की धार्मिक प्रक्रिया से जुड़ा है और इसे आपराधिक अपराध नहीं माना जाना चाहिए।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि शिकायत में संज्ञेय अपराध के प्रथम दृष्टया आरोप मौजूद हैं, तो जांच प्रक्रिया को बीच में रोकना उचित नहीं होगा। ऐसे मामलों की सच्चाई जांच और ट्रायल के दौरान सामने आएगी।

महिलाओं के अधिकार सर्वोपरि

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी धार्मिक या सामाजिक प्रथा की आड़ में महिलाओं के साथ यौन शोषण या दुष्कर्म जैसी घटनाओं को वैध नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी महिला ने अपनी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाने के आरोप लगाए हैं, तो कानून के तहत उनकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को गरिमा और समानता का अधिकार देता है। ऐसे में किसी भी परंपरा का इस्तेमाल महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?

पीड़िता के अनुसार, उसका विवाह कम उम्र में हुआ था। बाद में उसे तीन तलाक दे दिया गया। इसके बाद दोबारा उसी व्यक्ति से विवाह करने के लिए निकाह हलाला की प्रक्रिया अपनाने का दबाव बनाया गया। महिला का आरोप है कि इसी प्रक्रिया के दौरान उसके साथ कई लोगों ने जबरन शारीरिक संबंध बनाए, जो दुष्कर्म की श्रेणी में आता है।

शिकायत के आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया और जांच शुरू की। आरोपियों ने इसी FIR को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

कोर्ट ने जांच में हस्तक्षेप से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर FIR रद्द करना उचित नहीं होगा, क्योंकि शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी स्वतंत्र रूप से मामले की जांच करेगी और यदि पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं तो आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR रद्द करने की शक्ति का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है। जहां प्रथम दृष्टया अपराध का मामला बनता हो, वहां जांच को रोकना न्यायहित में नहीं माना जा सकता।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश जाता है कि किसी भी धार्मिक या सामाजिक परंपरा के नाम पर यदि अपराध किए जाते हैं, तो उन्हें कानून के दायरे में लाया जाएगा। अदालत का यह रुख भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

महिला सुरक्षा पर अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट की टिप्पणी यह संकेत देती है कि महिलाओं के सम्मान, गरिमा और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। यदि किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाए जाने का आरोप है, तो उसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है और केवल धार्मिक प्रथा का हवाला देकर ऐसे मामलों को समाप्त नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि निकाह हलाला जैसी प्रथाओं की आड़ में लगाए गए यौन शोषण या दुष्कर्म के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने FIR रद्द करने से इनकार करते हुए जांच जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया है। अब मामले की आगे की जांच पुलिस करेगी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और कानून के समक्ष सभी की समानता के सिद्धांत को मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

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