• होम
  • मध्य प्रदेश
  • गरबा एंट्री से पहले गोमूत्र पीने की सलाह, बागेश्वर बाबा का बयान चर्चा में

गरबा एंट्री से पहले गोमूत्र पीने की सलाह, बागेश्वर बाबा का बयान चर्चा में

बेटियों, गरबा पंडालों और सोशल मीडिया को लेकर दी नसीहत; गोमूत्र पिलाकर प्रवेश देने की टिप्पणी से धार्मिक आयोजनों में पहचान और सुरक्षा को लेकर नई चर्चा शुरू

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • October 15, 2026 3:33 pm IST, Published 2 hours ago

मध्य प्रदेश : नवरात्र के उत्सव के बीच बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। मध्य प्रदेश के सागर जिले के गढ़ाकोटा में सनातन हिंदू एकता रथयात्रा के दौरान उन्होंने गरबा आयोजनों, महिलाओं की वेशभूषा, धार्मिक पहचान और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर कई टिप्पणियां कीं। इनमें गरबा पंडाल में प्रवेश से पहले गोमूत्र पिलाने का सुझाव और बेटियों से ‘दुर्गा बनना, काली बनना, लेकिन बुर्के वाली नहीं’ कहने वाला बयान विशेष रूप से चर्चा में है। इन टिप्पणियों ने धार्मिक आयोजनों की परंपरा, महिलाओं की स्वतंत्रता और सार्वजनिक कार्यक्रमों में प्रवेश के नियमों को लेकर बहस को फिर सामने ला दिया है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, धीरेंद्र शास्त्री की सनातन हिंदू एकता रथयात्रा 11 अक्टूबर से निकाली जा रही है। 13 अक्टूबर की रात यात्रा सागर जिले के गढ़ाकोटा पहुंची, जहां आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने नवरात्र और गरबा पंडालों का जिक्र किया। उनके बयानों के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं।

गरबा पंडाल में प्रवेश को लेकर क्या बोले धीरेंद्र शास्त्री?

धीरेंद्र शास्त्री ने गरबा आयोजनों में कथित तौर पर पहचान छिपाकर पहुंचने वाले लोगों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग नाम और वेश बदलकर गरबा पंडालों में आ सकते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने सुझाव दिया कि बाहरी लोगों को गोमूत्र पिलाकर प्रवेश दिया जाए। उनके बयान में यह भी कहा गया कि ऐसा करने से उनकी ‘घर वापसी’ हो सकती है।

यह टिप्पणी धार्मिक आयोजनों में प्रवेश की प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े करती है। गरबा नवरात्र के दौरान देवी आराधना से जुड़ा एक लोकप्रिय सांस्कृतिक आयोजन है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनकर नृत्य और पूजा में हिस्सा लेते हैं। खासकर गुजरात और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में गरबा के बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी का केंद्र आयोजनों में कथित रूप से पहचान छिपाकर प्रवेश करने की आशंका थी। हालांकि, किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करने और प्रवेश संबंधी नियम तय करने के लिए आयोजकों को स्पष्ट, निष्पक्ष और लागू नियमों पर निर्भर रहना चाहिए। किसी समुदाय के सभी सदस्यों को संदेह की नजर से देखना या धार्मिक आधार पर अपमानजनक व्यवहार करना सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है।

बेटियों से बोले- दुर्गा बनना, काली बनना

अपने संबोधन में धीरेंद्र शास्त्री ने महिलाओं और बेटियों को भी संबोधित किया। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने मंच से महिलाओं से हाथ उठाने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने टिप्पणी की, ‘बेटियों, तुम दुर्गा बनना, काली बनना, पर कभी न बुर्के वाली बनना।’

इस बयान में उन्होंने देवी दुर्गा और काली के प्रतीकों के माध्यम से महिलाओं को संबोधित किया, लेकिन बुर्के का उल्लेख धार्मिक वेशभूषा और महिलाओं की व्यक्तिगत पसंद को लेकर चर्चा का विषय बन गया है।

भारतीय समाज में महिलाओं की वेशभूषा को लेकर अलग-अलग धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत मान्यताएं हैं। कुछ महिलाएं पारंपरिक भारतीय परिधान पहनना पसंद करती हैं, जबकि कुछ अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार सिर ढकती हैं या बुर्का पहनती हैं। किसी महिला की पहचान, उसकी क्षमता या उसके चरित्र का आकलन केवल उसके कपड़ों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे इस बहस के महत्वपूर्ण पहलू हैं। धार्मिक मंचों से महिलाओं को संबोधित करते समय इन पहलुओं पर चर्चा सामाजिक रूप से उपयोगी हो सकती है। वहीं, पहनावे के आधार पर किसी वर्ग को कमतर बताने वाली भाषा लोगों के बीच मतभेद भी पैदा कर सकती है।

गरबा और धार्मिक पहचान का मुद्दा क्यों उठा?

नवरात्र के दौरान गरबा और डांडिया कार्यक्रमों में विभिन्न समुदायों की भागीदारी को लेकर पहले भी बहस होती रही है। कुछ आयोजक इन कार्यक्रमों को धार्मिक परंपरा और देवी आराधना से जुड़ा आयोजन मानते हैं तथा प्रतिभागियों के लिए विशेष नियम बनाना चाहते हैं। दूसरी ओर, ऐसे आयोजनों के सांस्कृतिक स्वरूप, सामाजिक भागीदारी और धार्मिक आधार पर प्रवेश सीमित करने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

सितंबर 2026 में भी गरबा कार्यक्रमों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की भागीदारी को लेकर सार्वजनिक बहस सामने आई थी। उस समय विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक पक्षों ने अलग-अलग विचार रखे थे।

धीरेंद्र शास्त्री का ताजा बयान इसी व्यापक बहस के बीच आया है। उनके समर्थक इसे धार्मिक परंपराओं की रक्षा और आयोजनों में सतर्कता बरतने की अपील के रूप में देख सकते हैं। वहीं, आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखने वाले लोग पूछ सकते हैं कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के आधार पर प्रवेश को लेकर संदेह करने की सीमा क्या होनी चाहिए और ऐसे नियमों को लागू करने का उचित तरीका क्या है।

इस मुद्दे पर संतुलित चर्चा के लिए जरूरी है कि वास्तविक सुरक्षा संबंधी शिकायतों, प्रमाणित घटनाओं और सामान्य आशंकाओं के बीच अंतर किया जाए। किसी खास घटना के आधार पर पूरे समुदाय के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

इंस्टाग्राम इस्तेमाल करने वालों को भी दी नसीहत

धीरेंद्र शास्त्री ने अपने संबोधन में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करने वाले युवाओं को भी नसीहत दी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला हर सुंदर चेहरा जरूरी नहीं कि अच्छे चरित्र का भी परिचायक हो। उन्होंने युवाओं को किसी व्यक्ति पर केवल उसकी तस्वीर या बाहरी आकर्षण के आधार पर भरोसा न करने की सलाह दी।

डिजिटल दौर में सोशल मीडिया दोस्ती, संवाद, मनोरंजन और जानकारी प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसके साथ ही फर्जी प्रोफाइल, ऑनलाइन ठगी, पहचान छिपाने और निजी जानकारी के दुरुपयोग जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं। इसलिए किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत करते समय सावधानी बरतना उपयोगी है।

हालांकि, सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति के चरित्र का फैसला केवल उसकी तस्वीर से करना भी सही तरीका नहीं है। बेहतर होगा कि उपयोगकर्ता अपनी निजी जानकारी साझा करने में सतर्क रहें, संदिग्ध लिंक से बचें, वित्तीय जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को न दें और किसी भी तरह के दबाव या धमकी की स्थिति में संबंधित प्लेटफॉर्म तथा उचित अधिकारियों से सहायता लें।

इस संदर्भ में डिजिटल सुरक्षा और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार का संदेश महत्वपूर्ण है। इसे किसी विशेष समुदाय या पहनावे से जोड़ने के बजाय सभी उपयोगकर्ताओं पर समान रूप से लागू करना अधिक उपयोगी होगा।

महिलाओं को अकेले बागेश्वर धाम न आने की सलाह

रिपोर्टों में धीरेंद्र शास्त्री के एक अन्य बयान का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने बागेश्वर धाम आने वाली महिलाओं से अकेले नहीं आने की अपील की थी। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि वर्तमान समय में सनातन धर्म पर कई दिशाओं से हमले हो रहे हैं और धाम आने वाली माताओं-बहनों को अकेले आने से बचना चाहिए।

ऐसी सलाह के पीछे सुरक्षा को लेकर चिंता का तर्क हो सकता है। बड़े धार्मिक आयोजनों में भीड़, लंबी यात्रा, परिवहन की उपलब्धता और भीड़भाड़ वाले स्थानों पर व्यक्तिगत सुरक्षा जैसे विषय महत्वपूर्ण होते हैं। यात्रा की योजना बनाते समय परिवार या परिचितों को जानकारी देना, आधिकारिक परिवहन का उपयोग करना और आपातकालीन संपर्क साथ रखना उपयोगी सावधानियां हैं।

इसके साथ ही महिलाओं की स्वतंत्र आवाजाही और धार्मिक स्थलों पर उनकी भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल महिलाओं पर नहीं डाली जानी चाहिए। आयोजन समितियों और प्रशासन की भी जिम्मेदारी होती है कि वे पर्याप्त सुरक्षा, सहायता केंद्र, स्पष्ट प्रवेश व्यवस्था और शिकायत निवारण की सुविधा उपलब्ध कराएं।

रथयात्रा में सामाजिक एकता और नशामुक्ति का संदेश

धीरेंद्र शास्त्री की यात्रा और संबोधन में धार्मिक मुद्दों के अलावा सामाजिक विषयों का भी उल्लेख हुआ। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने जात-पात समाप्त करने और नशे से दूर रहने जैसे संदेश भी दिए। इन विषयों का संबंध समाज में आपसी सहयोग, स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव से है।

जातिगत भेदभाव को कम करना और नशे की समस्या से निपटना लंबे समय से सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं तथा प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। इस दिशा में जागरूकता अभियान, शिक्षा, परिवारों का सहयोग और जरूरतमंद लोगों के लिए उपचार सुविधाएं उपयोगी भूमिका निभा सकती हैं।

हालांकि, सामाजिक एकता के संदेश को प्रभावी बनाने के लिए सार्वजनिक संवाद में सभी समुदायों के प्रति सम्मान बनाए रखना भी आवश्यक है। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं पर चर्चा लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा है, लेकिन ऐसी चर्चा में तथ्य, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का ध्यान रखना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर बयान चर्चा में, बहस के कई पहलू

धीरेंद्र शास्त्री के बयानों के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद गरबा पंडालों में प्रवेश, धार्मिक पहचान, महिलाओं की वेशभूषा और युवाओं के ऑनलाइन व्यवहार को लेकर चर्चा तेज हुई है। इन टिप्पणियों पर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। कुछ लोग धार्मिक आयोजनों में नियमों और सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात करेंगे, जबकि अन्य लोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आधार पर भेदभाव से जुड़े सवाल उठाएंगे।

ऐसे मामलों में वायरल वीडियो के छोटे अंश के बजाय पूरा संदर्भ देखना जरूरी है। बयान किस अवसर पर दिया गया, वक्ता ने किन परिस्थितियों का उल्लेख किया और उनके शब्दों का वास्तविक आशय क्या था—इन सभी पहलुओं को समझने से किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान होता है। साथ ही, सोशल मीडिया पर किए गए दावों और प्रतिक्रियाओं को प्रमाणित तथ्यों से अलग पहचानना भी आवश्यक है।

फिलहाल, धीरेंद्र शास्त्री के गरबा और गोमूत्र संबंधी बयान ने नवरात्र के दौरान धार्मिक आयोजनों में प्रवेश के नियमों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर आयोजकों, सामाजिक संगठनों और अन्य सार्वजनिक व्यक्तियों की प्रतिक्रियाएं भी चर्चा का हिस्सा बन सकती हैं।

निष्कर्ष: धार्मिक आयोजनों की परंपरा, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव तीनों महत्वपूर्ण हैं। आयोजकों के लिए पारदर्शी प्रवेश नियम बनाना, प्रशासन के लिए सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना और सार्वजनिक मंचों से संवाद करते समय सभी नागरिकों की गरिमा का सम्मान करना जरूरी है। किसी भी विवादित बयान का मूल्यांकन करते समय तथ्य, संदर्भ और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखना चाहिए।

Advertisement