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विकसित भारत 2047 के लिए जरूरी पारदर्शी प्रशासन और आधुनिक कानून

सम्मेलन में केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, आयोग की सदस्य-सचिव डॉ. अंजू राठी राणा और सदस्य प्रो. डी. पी. वर्मा सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। सम्मेलन का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच कानूनी सुधारों पर विचार-विमर्श करना तथा नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने के उपाय तलाशना था।

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  • October 22, 2026 7:15 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने राज्यों से पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की समीक्षा कर उन्हें समाप्त करने या मौजूदा जरूरतों के अनुसार संशोधित करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि बदलते सामाजिक और आर्थिक परिवेश में कानूनी व्यवस्था का समय के अनुरूप होना आवश्यक है। प्रभावी कानून और पारदर्शी प्रशासन ही सुशासन को मजबूत बना सकते हैं। उपराष्ट्रपति नई दिल्ली के विज्ञान भवन में भारतीय विधि आयोग की ओर से आयोजित ‘सहकारी संघवाद और विधिक सुधार: राष्ट्रीय एवं राज्य परिप्रेक्ष्य’ विषयक सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद संबोधित कर रहे थे।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता और एकता का संगम है। संविधान केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों, दायित्वों तथा स्वायत्तता का संतुलन बनाए रखने के लिए मार्गदर्शन देता है। उन्होंने कहा कि भारतीय संघीय व्यवस्था की सफलता इस बात में है कि सभी राज्य अपनी विशिष्टताओं को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय विकास के साझा लक्ष्यों की दिशा में सहयोग करें। केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल से नागरिकों तक सरकारी योजनाओं और नीतियों का लाभ प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सकता है।

सी. पी. राधाकृष्णन ने सहकारी संघवाद के साथ प्रतिस्पर्धी संघवाद की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘टीम इंडिया’ की अवधारणा केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श, समन्वय और साझा जिम्मेदारी को बढ़ावा देती है। राजनीतिक विचारों में अंतर होने के बावजूद जनहित से जुड़े विषयों पर मिलकर काम करना आवश्यक है। उनके अनुसार, मजबूत राज्य देश की संघीय व्यवस्था को सशक्त बनाते हैं और राज्यों की सक्रिय भागीदारी से राष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद मिलती है। उपराष्ट्रपति ने विकसित भारत @2047 के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के दीर्घकालिक विकास के लिए कानूनों और संस्थागत व्यवस्थाओं में सुधार जरूरी है।

विकास की प्रक्रिया को मजबूत कानूनी ढांचे, पारदर्शी संस्थाओं, कुशल प्रशासन और न्याय तक समान पहुंच का समर्थन मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि कानूनों का उद्देश्य केवल नियम लागू करना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए न्यायपूर्ण, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना भी है। उन्होंने पिछले बारह वर्षों में आपराधिक न्याय व्यवस्था में किए गए बदलावों और 1,700 से अधिक पुराने कानूनों को समाप्त किए जाने का उल्लेख किया। उनके अनुसार, अप्रासंगिक कानूनी प्रावधानों को हटाना व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसी क्रम में उन्होंने राज्यों के विधि आयोगों से अपने-अपने क्षेत्रों में लागू पुराने कानूनों की पहचान करने और उनकी उपयोगिता का आकलन करने को कहा। आवश्यकता के अनुसार ऐसे कानूनों में संशोधन या उन्हें निरस्त करने की सिफारिश की जा सकती है। इससे नागरिकों और कारोबारियों के लिए प्रक्रियाएं सरल बनाने तथा प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि सहकारी संघवाद का अर्थ सभी राज्यों में हर विषय पर एक जैसे नियम लागू करना नहीं है। उन्होंने कहा कि जहां केंद्र और राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारियां एक-दूसरे से जुड़ी हों, वहां सहयोग और समन्वय आवश्यक है। इसके साथ ही राज्यों की वैध स्वायत्तता और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेने की स्वतंत्रता का सम्मान भी किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय विधि आयोग, राज्य विधि आयोगों और राज्य सरकारों के विधि विभागों के बीच संवाद बढ़ाने पर जोर दिया, ताकि कानूनों की समीक्षा व्यवस्थित तरीके से हो सके और उपयोगी अनुभवों को साझा किया जा सके। अपने भाषण में उन्होंने संसद में स्थापित सेंगोल का भी उल्लेख किया। इसे नैतिक शासन और न्यायपूर्ण सत्ता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर की शिक्षाओं का संदर्भ दिया।

 

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उपराष्ट्रपति ने कहा कि शासन की सफलता केवल अधिकारों के इस्तेमाल से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, नैतिकता और जनकल्याण के प्रति प्रतिबद्धता से तय होती है। उनके अनुसार, कानून का शासन तभी प्रभावी बनता है, जब संस्थाएं निष्पक्षता और जवाबदेही के साथ काम करें। सम्मेलन में केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल, भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, आयोग की सदस्य-सचिव डॉ. अंजू राठी राणा और सदस्य प्रो. डी. पी. वर्मा सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। सम्मेलन का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच कानूनी सुधारों पर विचार-विमर्श करना तथा नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप कानूनों को अधिक प्रभावी बनाने के उपाय तलाशना था।

उपराष्ट्रपति ने उम्मीद जताई कि सम्मेलन से ऐसे व्यावहारिक सुझाव सामने आएंगे, जिन्हें लागू करके न्याय व्यवस्था को अधिक सरल, उत्तरदायी और नागरिक-केंद्रित बनाया जा सकेगा। पुराने कानूनों की समीक्षा, संस्थागत समन्वय और राज्यों की भागीदारी को बढ़ावा देने जैसे कदम सुशासन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी सुधारों का अंतिम उद्देश्य आम नागरिक के जीवन को सुरक्षित, सुगम और सम्मानजनक बनाना होना चाहिए।

 

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