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मोबाइल PLI योजना: ₹19,000 करोड़ देकर सरकार को मिला ₹3.25 लाख करोड़ का टैक्स!

नई दिल्ली। भारत में मोबाइल फोन निर्माण को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना एक बार फिर चर्चा में है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, सरकार ने मोबाइल फोन उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए करीब 19,000 करोड़ रुपये की राशि दी, जबकि इस […]

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  • October 29, 2026 7:30 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली। भारत में मोबाइल फोन निर्माण को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना एक बार फिर चर्चा में है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, सरकार ने मोबाइल फोन उद्योग को प्रोत्साहन देने के लिए करीब 19,000 करोड़ रुपये की राशि दी, जबकि इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष कर और वस्तु एवं सेवा कर (GST) के रूप में बड़े पैमाने पर राजस्व प्राप्त हुआ है। सामने आए आंकड़े भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में हुए विस्तार और सरकारी प्रोत्साहन के आर्थिक प्रभाव को समझने का अवसर देते हैं।

सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के मुताबिक, योजना के तहत सरकार की ओर से दिए गए प्रोत्साहन के मुकाबले कर संग्रह काफी अधिक रहा है। हालांकि, इन आंकड़ों की व्याख्या करते समय यह समझना जरूरी है कि प्रोत्साहन राशि, प्रत्यक्ष कर और GST अलग-अलग श्रेणियां हैं। इनका सीधा तुलनात्मक विश्लेषण करने के लिए अवधि, गणना के आधार और संबंधित आधिकारिक आंकड़ों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

सरकार ने 19,000 करोड़ रुपये दिए, टैक्स में मिले 3.25 लाख करोड़

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 28 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया पर मोबाइल पीएलआई योजना से जुड़े आंकड़े साझा किए। उनके अनुसार, सरकार ने मोबाइल फोन विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन के रूप में 19,000 करोड़ रुपये दिए। इसके मुकाबले इस क्षेत्र से 25,000 करोड़ रुपये प्रत्यक्ष कर और 3 लाख करोड़ रुपये GST के रूप में प्राप्त हुए। इस तरह कुल कर संग्रह 3.25 लाख करोड़ रुपये बताया गया है। Akashvani News +1

इन आंकड़ों के आधार पर देखें तो सरकार की ओर से दिए गए प्रोत्साहन की तुलना में बताया गया कुल कर संग्रह लगभग 17 गुना है। हालांकि, इस अनुपात को योजना का शुद्ध लाभ नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि कर संग्रह में उद्योग की व्यापक आर्थिक गतिविधियों का योगदान शामिल होता है। इसके अलावा, योजना की अवधि, सरकारी खर्च और अन्य आर्थिक प्रभावों का अलग-अलग आकलन करना जरूरी है।

क्या है मोबाइल PLI योजना और कैसे करती है काम?

प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI योजना का उद्देश्य देश में विनिर्माण गतिविधियों को बढ़ावा देना है। इसके तहत पात्र कंपनियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार उत्पादन और बिक्री से जुड़े प्रदर्शन के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाता है। मोबाइल फोन क्षेत्र में इस नीति का मकसद भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनाना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना और निर्यात को प्रोत्साहित करना है।

इस योजना से कंपनियों को भारत में विनिर्माण इकाइयों का विस्तार करने, उत्पादन क्षमता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की मांग के अनुरूप मोबाइल फोन तैयार करने के लिए प्रोत्साहन मिला। सरकार की रणनीति केवल घरेलू बाजार में फोन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में निर्मित उत्पादों को दूसरे देशों में निर्यात करने की क्षमता विकसित करना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सरकार का मानना है कि उत्पादन आधारित प्रोत्साहन से कंपनियों को बड़े स्तर पर निवेश करने और देश में विनिर्माण गतिविधियां बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके परिणामस्वरूप रोजगार, सहायक उद्योगों और लॉजिस्टिक्स जैसी सेवाओं में भी अवसर पैदा हो सकते हैं।

मोबाइल निर्माण क्षेत्र में 12 लाख लोगों को रोजगार

अश्विनी वैष्णव ने अपने बयान में रोजगार के आंकड़ों पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 25 लाख लोग कार्यरत हैं, जबकि मोबाइल फोन निर्माण क्षेत्र में करीब 12 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मोबाइल फोन उद्योग में केवल अंतिम उत्पाद तैयार करने वाली फैक्ट्रियां ही शामिल नहीं होतीं। इस क्षेत्र से जुड़े पैकेजिंग, परिवहन, गोदाम प्रबंधन, गुणवत्ता जांच, मशीन संचालन और अन्य सहायक सेवाओं में भी रोजगार के अवसर बनते हैं।

हालांकि, रोजगार के इन आंकड़ों को समझते समय प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के बीच अंतर करना आवश्यक है। उपलब्ध बयान में बताए गए आंकड़ों की गणना का विस्तृत आधार अलग से देखना होगा। फिर भी, मोबाइल विनिर्माण का विस्तार औद्योगिक रोजगार और कौशल विकास की संभावनाओं को रेखांकित करता है।

मोबाइल फोन उत्पादन और निर्यात में भारत की बढ़ती ताकत

पिछले एक दशक में भारत के मोबाइल फोन विनिर्माण क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। सरकार द्वारा मार्च 2026 में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, देश में मोबाइल फोन का उत्पादन वित्त वर्ष 2014-15 के लगभग 18,000 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 5.5 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था। इसी अवधि में कुल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 11.3 लाख करोड़ रुपये हुआ।

मोबाइल फोन निर्यात में भी तेजी दर्ज की गई है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत से लगभग 2 लाख करोड़ रुपये मूल्य के मोबाइल फोन निर्यात किए गए। यह विस्तार दिखाता है कि भारत अब केवल अपने घरेलू बाजार के लिए फोन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भी अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।

इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है कि मोबाइल फोन के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों का कितना हिस्सा भारत में तैयार होता है। यदि फोन की असेंबलिंग भारत में हो, लेकिन उसके महंगे और तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण घटक विदेशों से आयात किए जाएं, तो देश में वास्तविक मूल्यवर्धन सीमित रह सकता है।

इसी वजह से विशेषज्ञों के बीच इस बात पर चर्चा जारी है कि उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ भारत को सेमीकंडक्टर, डिस्प्ले, कैमरा मॉड्यूल, बैटरी और अन्य महत्वपूर्ण घटकों के घरेलू निर्माण पर भी ध्यान देना चाहिए।

नई मोबाइल निर्माण योजना पर सरकार का बड़ा दांव

मोबाइल फोन विनिर्माण को अगले स्तर तक ले जाने के लिए केंद्र सरकार ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) को भी मंजूरी दी है। इस योजना के लिए 62,500 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य घरेलू मूल्यवर्धन बढ़ाना, आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना, भारतीय मोबाइल ब्रांडों को प्रोत्साहित करना और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा की क्षमता विकसित करना है।

यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक लागू रहने के लिए निर्धारित की गई है। इसके अंतर्गत पात्र मोबाइल बिक्री पर निर्धारित दरों के अनुसार प्रोत्साहन देने की व्यवस्था है। प्रमुख घटकों की घरेलू खरीद को बढ़ावा देने तथा भारतीय ब्रांडों के डिजाइन और अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने पर भी जोर दिया गया है।

सरकार की अपेक्षा है कि इस कदम से भारत में मोबाइल निर्माण की क्षमता बढ़ेगी और देश के अपने ब्रांडों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर अवसर मिलेंगे। इसके साथ ही स्थानीय कंपनियों और छोटे आपूर्तिकर्ताओं के लिए भी नए व्यावसायिक अवसर पैदा हो सकते हैं।

क्या मोबाइल PLI योजना को पूरी तरह सफल माना जाए?

मोबाइल PLI योजना से जुड़े आंकड़े उत्साहजनक तस्वीर पेश करते हैं। सरकार के मुताबिक, 19,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन के मुकाबले 3.25 लाख करोड़ रुपये का कर संग्रह हुआ है। इसके साथ ही उत्पादन, निर्यात और रोजगार में विस्तार के आंकड़े भी सामने आए हैं।

लेकिन किसी सरकारी योजना की सफलता का आकलन केवल कर संग्रह के आधार पर करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि सरकारी प्रोत्साहन के बिना कितना निवेश होता, घरेलू मूल्यवर्धन कितना बढ़ा, आयात पर निर्भरता में कितनी कमी आई और रोजगार कितना टिकाऊ रहा।

इसके अतिरिक्त, प्रत्यक्ष कर और GST का आर्थिक महत्व अलग-अलग है। प्रत्यक्ष कर कंपनियों और अन्य करदाताओं की कर देनदारी से संबंधित होता है, जबकि GST वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगने वाला अप्रत्यक्ष कर है। इसलिए दोनों को जोड़कर प्राप्त राशि को सरकारी प्रोत्साहन का शुद्ध मुनाफा बताना सही निष्कर्ष नहीं होगा।

निष्कर्ष: भारत के लिए अवसर और आगे की चुनौती

मोबाइल फोन PLI योजना भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में उत्पादन, निर्यात और रोजगार का विस्तार हुआ है। अब अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि भारत केवल मोबाइल फोन की असेंबलिंग का केंद्र बनकर न रह जाए, बल्कि महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक घटकों, तकनीकी अनुसंधान और स्वदेशी ब्रांडों के विकास में भी आगे बढ़े।

यदि सरकार, उद्योग और घरेलू आपूर्तिकर्ता मिलकर स्थानीय उत्पादन तथा तकनीकी क्षमता को मजबूत करते हैं, तो इससे रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति भी बेहतर हो सकती है। फिलहाल, 19,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन और 3.25 लाख करोड़ रुपये के बताए गए कर संग्रह के आंकड़ों ने मोबाइल विनिर्माण नीति के आर्थिक प्रभाव को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

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