हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद मंत्री ने अपना पक्ष स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उनके बयान का उद्देश्य SIR की वैधता पर मुहर लगाना नहीं था। वह केवल यह बताना चाहते थे कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने किस तरह कथित तौर पर भाजपा की उस रणनीति को विफल किया, जिसके जरिए पार्टी समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने की कोशिश की जा रही थी। जारकीहोली के मुताबिक, राज्य में कांग्रेस ने समय रहते इस मामले को गंभीरता से लिया और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कदम उठाए।
मंत्री ने अपने स्पष्टीकरण में फॉर्म-7 का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने इस फॉर्म का इस्तेमाल करके कांग्रेस समर्थक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटवाने की कोशिश की थी। उनका दावा है कि कर्नाटक में कांग्रेस संगठन और सरकार ने इस कथित प्रयास को सफल नहीं होने दिया। उन्होंने इसके लिए राहुल गांधी के प्रयासों और राज्य के उपमुख्यमंत्री एवं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार के मार्गदर्शन को महत्वपूर्ण बताया।
सतीश जारकीहोली ने कहा कि मतदाता सूची में गड़बड़ी के खिलाफ उनकी लड़ाई नई नहीं है। उन्होंने इस मुद्दे पर सबसे पहले बेलगावी जिले से आवाज उठाई थी। उनके अनुसार, मतदाता सूची में किसी भी तरह की ऐसी कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती, जिससे वास्तविक और पात्र मतदाता अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएं। लोकतंत्र में हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए और इस अधिकार की रक्षा करना राजनीतिक दलों तथा चुनावी संस्थाओं की जिम्मेदारी है। उन्होंने अपने बयान में यह भी दोहराया कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता राहुल गांधी के साथ मजबूती से खड़े हैं। जारकीहोली ने कहा कि उनका राजनीतिक और वैचारिक रुख हमेशा मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के पक्ष में रहा है। उन्होंने मीडिया से अपील की कि उनके पिछले बयान को अधूरे संदर्भ में प्रस्तुत करने के बजाय पूरे घटनाक्रम और उनके स्पष्टीकरण के आधार पर समझा जाए।
इस पूरे विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि SIR को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच देशभर में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। कांग्रेस लगातार इस प्रक्रिया के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने की आशंका उठाती रही है, जबकि चुनावी सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। ऐसे माहौल में कांग्रेस के एक वरिष्ठ मंत्री का शुरुआती बयान और उसके बाद आया स्पष्टीकरण राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। जारकीहोली की सफाई के बाद अब सवाल यह है कि क्या उनका स्पष्टीकरण इस विवाद को समाप्त कर पाएगा या विपक्ष इसे कांग्रेस के दोहरे रुख के रूप में पेश करेगा। फिलहाल मंत्री ने अपने बयान से पैदा हुई गलतफहमी दूर करने की कोशिश की है और पार्टी नेतृत्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाती है और कांग्रेस नेतृत्व इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाता है।