• होम
  • देश
  • रघु ठाकुर की पुस्तकों के विमोचन में लोकतंत्र और गांधीवाद पर चर्चा

रघु ठाकुर की पुस्तकों के विमोचन में लोकतंत्र और गांधीवाद पर चर्चा

आंदोलनों के संदर्भ में गांधी के विचारों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जनांदोलनों में नैतिकता और भाषा की मर्यादा बनाए रखना महत्वपूर्ण है। व्यवस्था में बदलाव गाली-गलौज से नहीं, बल्कि रचनात्मक संघर्ष और सकारात्मक प्रयासों से संभव है।

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • November 1, 2026 2:24 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: देश की मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक परिस्थितियों के बीच वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक एवं लेखक रघु ठाकुर की दो पुस्तकों का विमोचन कार्यक्रम नई दिल्ली में आयोजित किया गया। इस अवसर पर देश के कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में गांधीवादी विचारधारा, समाजवाद, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मीडिया की भूमिका और आम नागरिक के मताधिकार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।

कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान दौर में विचारों को दबाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। गांधीवादी और समाजवादी सोच के स्थान पर नफरत, सांप्रदायिकता तथा हिंसा को बढ़ावा मिलना समाज के लिए चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि समाजवाद का मूल आधार समानता और सामाजिक न्याय है। डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने पिछड़े और वंचित वर्गों को आगे लाने के लिए आरक्षण तथा विशेष अवसर के सिद्धांत को जरूरी बताया। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी युद्ध और हिंसक संघर्षों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गांधी के विचार आज भी शांति का रास्ता दिखा सकते हैं। उन्होंने रघु ठाकुर की दोनों पुस्तकों को वर्तमान समय के लिए उपयोगी बताते हुए उनके लेखों से प्रेरणा लेने की अपील की।

गांधीवादी विचारक एवं हरिजन सेवक संघ के उपाध्यक्ष लक्ष्मीदास ने कार्यक्रम को सार्थक वैचारिक संवाद का अवसर बताया। उन्होंने कहा कि समाज में केवल आलोचना करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सवाल पूछना, चिंतन करना और समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रयास करना भी जरूरी है। दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया में गांधी के साथ हुई घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि अन्याय के विरुद्ध उठे सवाल ने सत्याग्रह जैसी ऐतिहासिक विचारधारा को जन्म दिया। उन्होंने गांधी के सिद्धांतों की चर्चा करते हुए कहा कि डरपोक व्यक्ति वास्तव में अहिंसक नहीं हो सकता। उनके अनुसार, सकारात्मक उद्देश्य से होने वाली बहस समाज के ज्ञान और सांस्कृतिक विकास को भी आगे बढ़ाती है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि समस्याओं की चर्चा करने वाली पुस्तकें तो बहुत मिलती हैं, लेकिन उनके समाधान की दिशा दिखाने वाला साहित्य अपेक्षाकृत कम है। रघु ठाकुर की पुस्तकों को उन्होंने इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि इन पुस्तकों में शामिल लेख तत्कालीन परिस्थितियों के साथ-साथ भविष्य के लिए भी विचार करने की सामग्री उपलब्ध कराते हैं। मीडिया की मौजूदा स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता, आर्थिक हितों और पेड न्यूज जैसी प्रवृत्तियों पर आत्ममंथन की आवश्यकता है। उन्होंने मीडिया की कमजोरियों को गंभीर बीमारी की तरह बताते हुए उसके मूल कारणों की पहचान करने पर जोर दिया।

लोकसभा सांसद वीरेंद्र सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि देश में सच बोलने और उसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। उन्होंने मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए एसआईआर तथा मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर सवाल किए। उनका कहना था कि ऐसी प्रक्रियाओं में आम नागरिक के मतदान के अधिकार की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए। उन्होंने युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव से पैदा हो रही अनिश्चितताओं पर भी चिंता जताई।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और दोनों पुस्तकों के लेखक रघु ठाकुर ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वर्तमान परिस्थितियां चिंताजनक हैं। राजनीति में सिद्धांतों की जगह अवसरवाद बढ़ रहा है और पत्रकारिता पर प्रायोजन तथा व्यावसायिक हितों का प्रभाव दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का दायरा व्यापक होने के बजाय लगातार सीमित होता नजर आ रहा है। आर्थिक निर्भरता, राजनीतिक सौदेबाजी और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौतियां हैं।

रघु ठाकुर ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए समाज में भय का वातावरण समाप्त करना और नागरिकों में सवाल उठाने का साहस पैदा करना आवश्यक है। इसके लिए केवल राजनीतिक परिवर्तन पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक प्रतिबद्धता भी जरूरी है। आंदोलनों के संदर्भ में गांधी के विचारों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जनांदोलनों में नैतिकता और भाषा की मर्यादा बनाए रखना महत्वपूर्ण है। व्यवस्था में बदलाव गाली-गलौज से नहीं, बल्कि रचनात्मक संघर्ष और सकारात्मक प्रयासों से संभव है। उन्होंने अपनी पुस्तकों पर मिलने वाली आलोचनाओं का स्वागत करते हुए कहा कि आलोचना से विचारों में सुधार और भविष्य में बेहतर लेखन की संभावनाएं बनती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अजय तिवारी ने दोनों पुस्तकों को भविष्य के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन के लिए उपयोगी आधार बताया। पुस्तकों की संपादक डॉ. शिवा श्रीवास्तव ने उनकी विषयवस्तु और लेखों के वैचारिक महत्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन अरुण प्रताप सिंह ने किया, जबकि मदन जैन ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। आयोजन में मुकेश चंद्रा और अनिता सिंह का विशेष सहयोग रहा।

इस अवसर पर पत्रकार अजय तिवारी, रमेश शर्मा, राजवीर पंवार, श्याम सुंदर यादव, कर्नल ओपी मलिक, कर्नाटक के मांड्या से आए चिनप्पा, अशोक पंकज, चंद्रप्रकाश, ढाका, सर्वेश कुमार, अजीत त्यागी, सभाजीत सिंह, नवनीत, हरपाल सिंह, अंकित पांडे, रवींद्र, बृजेश शर्मा सहित देश के विभिन्न हिस्सों से आए अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम का मूल संदेश यही रहा कि लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखने के लिए विचारों की स्वतंत्रता, गांधीवादी नैतिकता, सामाजिक समानता और निष्पक्ष पत्रकारिता को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

 

 

Advertisement