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पुरानी भर्तियों पर उठे सवाल, विधान परिषद में करीब 100 कर्मियों की एंट्री बंद

इस घटनाक्रम ने बिहार विधान परिषद में हुई पुरानी नियुक्तियों की प्रक्रिया को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ कर्मचारी अपनी नियुक्तियों और रोजगार की सुरक्षा को लेकर विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी शैक्षणिक और तकनीकी योग्यता की जांच का मुद्दा सामने आया है।

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Gauravshali Bharat News
  • November 6, 2026 6:40 pm IST, Published 30 minutes ago

पटना: बिहार की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद अब विधान परिषद में पूर्व सभापति के कार्यकाल के दौरान हुई नियुक्तियों को लेकर विवाद गहराता नजर आ रहा है। शुक्रवार को विधान परिषद परिसर में उस समय तनाव की स्थिति बन गई, जब पूर्व सभापति अवधेश नारायण सिंह के कार्यकाल में नियुक्त किए गए करीब 100 कर्मचारियों को कार्यालय में प्रवेश करने से रोक दिया गया। अचानक लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में कर्मचारियों ने परिसर के मुख्य द्वार पर प्रदर्शन किया और अपनी नाराजगी जाहिर की।
जानकारी के मुताबिक, प्रवेश से रोके गए कर्मचारियों में निजी सहायक, सुरक्षा प्रहरी और डाटा एंट्री ऑपरेटर के पदों पर नियुक्त लोग शामिल हैं। इनमें सात निजी सहायक, लगभग 56 सुरक्षा प्रहरी और 33 डाटा एंट्री ऑपरेटर बताए जा रहे हैं। इन सभी की नियुक्तियां अवधेश नारायण सिंह के सभापति रहने के दौरान हुई थीं। शुक्रवार को जब ये कर्मचारी अपनी नियमित ड्यूटी पर पहुंचने के लिए विधान परिषद पहुंचे तो मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। अचानक प्रवेश बंद किए जाने से कर्मचारियों में नाराजगी फैल गई। उन्होंने गेट के बाहर ही विरोध जताना शुरू कर दिया।

कई कर्मचारियों ने अधिकारियों से अंदर जाने की अनुमति देने की मांग की, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं मिल सका। इसके बाद कुछ कर्मचारी विधान परिषद परिसर के बाहर बने पार्क में बैठ गए और अपनी मांगों को लेकर विरोध जारी रखा। मामले की गंभीरता को देखते हुए परिसर के आसपास पुलिस बल की तैनाती भी बढ़ा दी गई, ताकि किसी तरह की अव्यवस्था पैदा न हो। इस पूरे विवाद के पीछे नियुक्तियों की योग्यता और चयन प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल बताए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ नियुक्त कर्मचारियों के पास संबंधित पदों के लिए जरूरी शॉर्टहैंड का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। जबकि निजी सहायक के पद पर नियुक्ति के लिए शॉर्टहैंड का ज्ञान अनिवार्य योग्यता माना गया था। इसी को ध्यान में रखते हुए संबंधित कर्मचारियों की दक्षता जांचने के लिए परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया था।

जानकारी के अनुसार, चार नवंबर को दक्षता जांच परीक्षा निर्धारित की गई थी। इसके लिए आवश्यक तैयारियां भी की गई थीं, लेकिन सातों निजी सहायक अभ्यर्थियों में से कोई भी परीक्षा में शामिल नहीं हुआ। उनकी अनुपस्थिति के बाद अब उन्हें एक और अवसर देने का फैसला किया गया है। सभी सात अभ्यर्थियों को 18 नवंबर को दोबारा परीक्षा में शामिल होने के लिए कहा गया है। बताया जा रहा है कि निर्धारित तिथि पर भी परीक्षा में शामिल नहीं होने की स्थिति में उनकी उम्मीदवारी रद्द की जा सकती है। दूसरी तरफ, प्रवेश से रोके गए कर्मचारियों ने अपनी नियुक्तियों को लेकर अलग पक्ष रखा है। उनका कहना है कि नियुक्ति से संबंधित मामला पहले से ही पटना हाईकोर्ट में विचाराधीन है। कर्मचारियों के मुताबिक, तीन नवंबर को इस मामले में अदालत में सुनवाई भी हुई थी।

उनका दावा है कि संबंधित अधिकारियों को न्यायालय की कार्यवाही और आदेश की जानकारी दी जा चुकी थी। इसके बावजूद शुक्रवार को उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के विधान परिषद परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया गया।कर्मचारियों का कहना है कि जब तक उनके मामले में न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक उनके साथ इस तरह का व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों से अपने पक्ष को सुनने और प्रवेश प्रतिबंध के कारणों को स्पष्ट करने की मांग की है। वहीं, नियुक्तियों की वैधता और आवश्यक योग्यता को लेकर उठे सवालों के कारण मामला प्रशासनिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण हो गया है।

इस घटनाक्रम ने बिहार विधान परिषद में हुई पुरानी नियुक्तियों की प्रक्रिया को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। एक तरफ कर्मचारी अपनी नियुक्तियों और रोजगार की सुरक्षा को लेकर विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी शैक्षणिक और तकनीकी योग्यता की जांच का मुद्दा सामने आया है। फिलहाल इस विवाद का समाधान न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों के फैसलों पर निर्भर करेगा। 18 नवंबर को होने वाली दक्षता परीक्षा भी मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब देखना होगा कि कर्मचारियों के विरोध और नियुक्तियों को लेकर उठे सवालों के बीच विधान परिषद प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है।


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