कुवानो नदी अपने आप में एक ऐसी रहस्यमयी प्रकृतिक संरचना है जिसके तह तक पहुंचने में अभी तक कोई भी सफल नहीं हो सका है। ऐतिहासिक दृष्टि से कुवानों नदी उत्तर कोशल के भूभाग में बहती है। यह घाघरा की एक सहायक नदी है। प्रवाहित नदियों में यह घाघरा के बाद दूसरी प्रमुख नदी है। पूर्वकालीन बहराइच एवं वर्तमान श्रावस्ती जिले के पूर्वी निचले भाग के चिलवरिया नामक स्थल से एक ताल के सोते के रुप में प्रारम्भ होकर बसऊपुर में लगभग 13 किमी तक एक नाले के रुप में बहने वाला यह जल स्रोत बलरामपुर में पहुंचते- पहुंचते नदी का रुप ले लेता है। पश्चिम से पूरब की ओर जैसे-जेसे यह नदी आगे बढ़ती है। इसका फैलाव बढ़ने के साथ ही इसकी गहराई भी बढ़ती जाती है। नदी का प्राचीन नाम सुन्दरिका, कर्दमी, उद्दालिकी और सुवर्णा भी कहा जाता है। स्कन्द पुराण वैष्णव खंड के भूमि वाराह खण्ड में इस नदी को सुवर्ण भूखरी (स्वर्णा) के नाम से जानते हैं। कुंवे से निकलने के कारण इसे कूप वाहिनी भी कहते हैं।
कुंवे और नाले से उदसृत नदी
इसका उद्गम कोई पहाड़ ना होकर एक सामान्य सा प्राकृतिक नाला है जो नदी के तलहटी के कुओं से जल को ग्रहण कर अपना अस्तित्व बनाये रखती है। तराई के अवशेष के रुप में अब यही एक नदी है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की एक कड़ी है। यह उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के बसऊपुर गांव के पास से एक जल स्रोत से निकलती है। जो कुंआ के स्रोत जैसा होने के कारण इसे कुंआ से निकलने की बात आम जनमानस में व्याप्त है। अतः इसी कारण इसका नाम कुंआनों पड़ा है । यह पश्चिम से पूरब की तरफ बहती हुई जैसे जैसे आगे बढ़ती है वैसे वैसे इसकी चौड़ाई और गहराई भी बढ़ती जाती है। इस नदी की विचित्रता जमीन के अन्दर से निकलने वाले वे हजारों छोटे-छोटे जलस्रोत हैं, जो नदी के रुप में बहने के लिए इसे जल उपलब्ध कराते हैं। यही कारण है कि चाहे जितना सूखा पडे कुआनो नदी में पानी कभी कम नहीं होता। सौ वर्ष पूर्व अंग्रेजों ने इंग्लैंड से पंप मंगाकर जंगल में लगाया था। जिससे आठ किलोमीटर के दायरे में सिचाई की जाती थी। आज यह पंप जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुके हैं।
बलरामपुर में पहुंचते-पहुंचते यह नदी का रुप ले लेता है। इसकी लंबाई 195 किमी. है। बलरामपुर से निकल कर पूर्व दिशा में जब यह बस्ती जिले में पहुंचती है तो वहां की यह मुख्य नदी हो जाती है। यह संत कबीर नगर में बूढ़ी राप्ती से मिलकर आगे बढ़ती हुई गोरखपुर जिले के दक्षिण ग्रामीण अंचल से होकर शाहपुर के पास मलौली नामक ग्राम के नजदीक घाघरा नदी में समा जाती है।
स्वच्छ, निर्मल और पारदर्शी जल :-
नदी का पानी कभी बहुत निर्मल और पारदर्शी हुआ करता था। इसके गहरे अंतःकरण में जलीय वनस्पति और जीव जन्तुओ को भी देखा जा सकता है। इसकी स्वच्छता के बारे में लोगों का कहना है कि अगर ऊपर से एक सुई भी गिरा दी जाए तो उसके इसके तल में वह ऊपर से आसानी से देखी जा सकती है। नदी का पानी जितना निर्मल है उतना ही पारदर्शी भी।गहरे तल में स्थित वनस्पतियों को भी ऊपर से ही देखा जा सकता है। यही कारण है कि वन्य जीव भी यहां पाए जाते हैं जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है इसके दोनो ओर घने जंगल दिखाई पड़ते हैं।
बन-बिलाव की बाहुल्यता :-
कुआनो नदी के इस जंगल के सबसे प्रसिद्ध वन्यजीव फिसिंग कैट(बन बिलाव) है, जो यहां बहुतायत में पाए जाते हैं। फिशिंग कैट का फर भूरे-धूसर रंग का होता है, जिस पर काले धब्बे और धारियाँ होती हैं। माथे से गर्दन तक छह से आठ काली रेखाएँ होती हैं, जो कंधों पर छोटी- छोटी पट्टियों और धब्बों में बँट जाती हैं। गालों पर सफेद निशान और काले धब्बे होते हैं और आँखों के चारों ओर सफेद फर होता है। कान छोटे और गोल होते हैं, और कानों के पीछे का भाग काला होता है। सामने से देखने पर, इनके बीच में एक विशिष्ट सफेद धब्बा दिखाई देता है।
अनेक छोटी छोटी नदियां द्वारा मिलता है जल :-
श्रावस्ती जनपद से निकली कुआनो व बिसुही नदी का संगम घघरिया घाट के समीप होता है। यहीं से कुआनों शुरू होता है। यह अपना पाट कभी नहीं बदलती। इसने अपने प्रवाह से भूमि रक्षिका का स्वरूप बनाए रखा है। इसी में विसुही नदी भी आकर समाहित हो जाती है। यह खुरगूपुर गांव से उत्तर गोंडा जनपद की सीमा में प्रवेश से 4 किमी. इसका आकार नदी का हो जाता है। यह गोण्डा के बीचोबीच होकर भानपुर तहसील की दक्षिण सीमा पर गुलरिहा रसूलपुर से बस्ती मण्डल को प्रवेश करती है। पूरब की दिशा में बढ़ते हुए कुआनो नदी बस्ती जिले की लगभग 130 किमी. की एक प्रमुख नदी बन जाती है।
कुंवानों नदी का सफर नामा
कुआनो नदी बस्ती जिले के सल्टौवा, बस्ती सदर और बनकटी विकास खण्डों से होकर महुली होते हुए संत कबीर नगर में जाती है। यह बस्ती पूर्व, बस्ती पश्चिम, नगर पश्चिम, नगर पूर्व, महुली पूर्व तथा महुली पश्चिम परगनों को पृथक भी करती है। । नदी अपने मार्ग में बस्ती, संत कबीर नग़र और गोरखपुर जिले से होकर बहती है। जो मुखलिसपुर कस्बे के पास बूढी राप्ती में मिलकर घाघरा नदी में समा जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के मूल निवासी कवि, पत्रकार तथा दिनमान पत्रिका के भूतपूर्व संपादक स्व. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपने गांव के निकट बहने वाली ’’कुआनो नदी का दर्द’’ विषय पर कविताओं का एक सिरीज लिखकर उसे जीवंत बना दिया है। नदी के दोनों किनारों पर जामुन, बेंत व महुआ के जंगल पाए जाते हैं। इसका जल जमुना की भांति नीला है व सर्पाकार रूप में यह बहती है।
जैसे-जैसे यह नदी आगे बढ़ती है इसके दोनो ओर घने जंगल दिखाई पड़ते हैं। कंटीले बेंत के जंगलो से गुजरती हुई यह नदी अद्भुत दृश्य पैदा करती है। यह नदी अपने आप में एक रहस्य है, जिसे खुद प्रकृति ने बनाया है और जिस रहस्य तक पहुंचने में कोई अभी तक कामयाब नहीं हुआ है। इसके तट पर साल,सागौन के अतरिक्त दुर्लभ सिरस वृक्ष की प्रजाति भी पाई जाती है। नदी के दोनो ओर झाडियों की लम्बी श्रंखला है जो दुर्लभ भी है। कुआनो नदी के कारण जैवविविधता की दृष्टि से यह इलाका काफी समृद्ध है। वनस्पतियों की एक लम्बी प्रजाति यहां पाई जाती है. कुछ दुर्लभ वस्पतियां भी नदी के तल में मौजूद हैं। जल का प्रवाह धीमा होने के कारण तमाम फ्लोटिंग प्लान्ट्स भी इस नदी में पाए जाते हैं।
आवागमन के जलमार्ग के रूप में प्रयुक्त :-
प्राचीन समय यहां तक कि मुगल काल तक घाघरा व कुवानों आदि नदियां ही आवागमन का प्रमुख साधन हुआ करती थीं। कुवानों नदी से दूर दराज के इलाकों में नाव द्वारा सामान की ढ़ुलाई भी पहले होती थी। रवई, मनवर तथा कठनइया आदि इसकी अनेक सहायक नदियां हैं। पुराने समय में सरयू के किनारे बसे लालगंज सहित अन्य क्षेत्रों के लोग इसी नदी के माध्यम से नाव में बैठकर गांव से शहर व शहर से गांव पहुंचते थे। इस नदी में जब प्रवाह था तो यह व्यापार का साधन भी रही। पांच दशक से पहले इसकी चैड़ाई 48 मीटर से अधिक थी और गहराई 80 मीटर से भी ज्यादा। वर्तमान में इसमें काफी कमी आई है। चैड़ाई अब पन्द्रह से बीस मीटर रह गयी है वहीं गहराई दस से बारह मीटर बची है।
कभी यह जलमार्ग के रूप में भी व्यवसायियों के आवागमन का मार्ग थी, मछुआरों की आजीविका का साधन थी , नदी में छोटी-छोटी नाम के साथ दिन-रात मछलियां पकड़ने का काम करते थे, लेकिन प्रदुषण के चलते अब इसमें मछलियां भी नहीं रही।नदी नाले का रूप धारण कर लिया है। अतः अब यहां मछुआरों को रोजी-रोटी जो आराम से चला करती थी , वह बंद हो गई है और वह पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।
कुंवानों नदी के विविध घाट
श्रावस्ती जिले में घघरिया घाट
श्रावस्ती जनपद से निकली कुआनो व बिसुही नदी का संगम घघरिया घाट के समीप होता है। यहीं से कुआनों शुरू होता है।
चोरघटा घाट बलरामपुर:-
चोरघटा घाट उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख स्थान है। इस पर 13 साल के लंबे इंतजार के बाद वर्तमान पुल बनकर तैयार हो गया है। जिससे बलरामपुर और सिद्धार्थनगर के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो गया है।
अइला घाट, बस्ती :-
हर्रैया तहसील को भानपुर से जोड़ने वाला कुआनों नदी पर स्थित अइला घाट है । अइला घाट और पुल गौर ब्लाक के उत्तरी छोर पर स्थित अइला कला गांव के निकट कुआनो नदी के तट पर स्थित है।
पनिभरवा घाट बस्ती:-
बस्ती और गोंडा जिलों की सीमा के पास कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और स्थानीय घाट है। लोगों द्वारा पानी भरने का एकमात्र स्रोत होने के कारण इसे पनिभरवा घाट नाम मिला।
भैंसहवा घाट, बस्ती :–
इस घाट पर भैंसों को नहलाने और पानी पिलाने के कारण इस घाट का नाम भैंसहवा घाट पड़ा है। भैंसहवा घाट कुआनो नदी के तट पर स्थित एक शांत और ग्रामीण परिवेश वाला क्षेत्र है।
देईपार-भैंसहवा घाट, बस्ती :-
भैंसहवा घाट उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में कुआनो नदी के तट पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है।सल्टउआ के पास स्थित देईपार से भैंसहवा को जाने वाले मार्ग को प्रमुख घाट के रूप में जाना जाता है। यह घाट जिला बस्ती के अंतर्गत बलुआ चौबे क्षेत्र के पास कुआनो नदी के प्राकृतिक तट पर स्थित है।
शिवा घाट, बस्ती :-
सोनहा-शिवाघाट , पैकोलिया शिवा घाट मार्ग से जुड़ा यह एक महत्वपूर्ण घाट है वर्तमान समय में इस पर पुल बन गया है।
चौरा घाट, बस्ती:-
बस्ती जिले के सलतौवा गोपालपुर ब्लाक
सलतौवा से 7 किमी दूर कुआनो नदी पर स्थित चौरा घाट एक प्रमुख स्थान है। पास ही में अजगैबा का सुंदर जंगल है जहां नदी तट पर विष्णु भगवान का सुन्दर मन्दिर है।
महादेवा घाट, बस्ती:-
अजगैवा जंगल से तीजू गंज को जोड़ने वाली इस सड़क के कुआनो नदी पर पर बने महादेवा पुल से होकर आमा न्याय पंचायत के गांवों के लोगों का आना-जाना रहता है।
बक्सई घाट, बस्ती:-
बक्सई घाट, उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में वाल्टर गंज कस्बे के पास कुआनो नदी पर स्थित एक प्रमुख और ऐतिहासिक घाट है।
आजादी के पहले अंग्रेज अफसर कुआनो नदी के किनारे बक्सई घाट पर बड़े पैमाने पर नील की खेती कराते थे। नील कोठी और नील उत्पादन के लिए बनाए गए नील हौज, अंग्रेज अफसर के बैठका का अवशेष आज भी बक्सई गांव में मौजूद हैं। नील के हौज तक पहुंचने के लिए पश्चिम की तरफ सीढ़ी बनाई गई थी। नाली, कुंआ, नील हौज और सीढ़ी अभी भी मौजूद है।
बाराह छतर घाट बस्ती :–
यह घाट जिला मुख्यालय से पश्चिम कुवानों नदी के तट पर लगभग 15 किमी दूर पर स्थित है। यह जगह बाराह मंदिर के लिए मुख्य रूप से प्रसिद्ध है। पौराणिक किताबों में इसे वियाग्रापुरी के रूप में जाना जाता है। नदी के किनारे संसारपुर नामक एक गांव है, जो भगवान शिव के पौराणिक स्थान के लिए प्रसिद्ध है। यह टिनिच
रेल स्टेशन से दो मील पूर्व और कुआनो नदी के दक्षिण तट पर, रेल के पुल से आधे मील पर एक ग्राम है, जो जनश्रुत
आचार्य डॉ राधेश्याम द्विवेदी