गुवाहाटी: असम सरकार ने राज्य में अवैध घुसपैठ और फर्जी पहचान दस्तावेजों पर लगाम लगाने के लिए एक बड़ा और अहम निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की अध्यक्षता में हुई राज्य कैबिनेट की बैठक में आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को लेकर नई व्यवस्था लागू करने का फैसला लिया गया। इस निर्णय के तहत 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को नए आधार कार्ड जारी करने की प्रक्रिया को सख्त बनाया जाएगा और प्रत्येक आवेदन की गहन जांच की जाएगी।
सरकार का कहना है कि यह कदम राज्य की सुरक्षा, जनसांख्यिकीय संतुलन और पहचान प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि आधार कार्ड भले ही नागरिकता का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह देश के सबसे महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेजों में से एक बन चुका है। ऐसे में यदि कोई अवैध रूप से देश में रह रहा व्यक्ति आधार कार्ड हासिल कर लेता है तो उसके लिए विभिन्न सरकारी सुविधाओं और सेवाओं तक पहुंच आसान हो जाती है।
मुख्यमंत्री के अनुसार राज्य के कुछ जिलों में आधार कार्ड धारकों की संख्या अनुमानित आबादी के अनुपात से अधिक दर्ज की गई है, जिसने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। सरकार को आशंका है कि कुछ मामलों में पहचान सत्यापन की प्रक्रिया का दुरुपयोग हुआ हो सकता है। इसी कारण अब आधार पंजीकरण से जुड़े मामलों की गहन जांच करने का निर्णय लिया गया है।
नई व्यवस्था के तहत 18 वर्ष से अधिक आयु के किसी भी व्यक्ति के आधार कार्ड आवेदन को सीधे स्वीकृति नहीं मिलेगी। ऐसे मामलों में पहले स्थानीय प्रशासन द्वारा दस्तावेजों की जांच की जाएगी। इसके बाद जिला आयुक्त (डीसी) स्तर पर सत्यापन होगा और आवश्यकता पड़ने पर मामला राज्य सरकार के समक्ष भेजा जाएगा। अंतिम स्वीकृति विस्तृत जांच के बाद ही दी जाएगी। सरकार का मानना है कि इससे फर्जी पहचान बनाने और अवैध प्रवासियों द्वारा दस्तावेज प्राप्त करने की संभावना काफी हद तक कम हो जाएगी।
हालांकि राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रतिबंध सभी वर्गों पर एक समान रूप से तुरंत लागू नहीं होगा। 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए आधार पंजीकरण की प्रक्रिया पहले की तरह जारी रहेगी। इसके अलावा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, चाय बागान समुदाय और कुछ अन्य विशेष वर्गों के लोगों को निर्धारित समय तक आधार बनवाने की सुविधा दी जाएगी। सरकार का कहना है कि इन समुदायों के कई लोगों के पास अभी भी आधार कार्ड नहीं है और उन्हें किसी प्रकार की असुविधा नहीं होने दी जाएगी।
इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में भी बहस तेज हो गई है। सत्तारूढ़ पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के खिलाफ मजबूत कदम बता रहा है। भाजपा नेताओं का कहना है कि असम लंबे समय से अवैध प्रवास की समस्या से जूझ रहा है और राज्य की पहचान तथा संसाधनों की सुरक्षा के लिए ऐसे निर्णय जरूरी हैं।
वहीं विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सख्त नियमों के कारण कई वास्तविक भारतीय नागरिकों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, विशेषकर उन लोगों को जिन्होंने अब तक किसी कारणवश आधार कार्ड नहीं बनवाया है। विपक्ष ने सरकार से यह सुनिश्चित करने की मांग की है कि सत्यापन प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध हो ताकि किसी भी पात्र नागरिक के अधिकार प्रभावित न हों।
सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों की भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहचान सत्यापन की प्रक्रिया मजबूत होती है तो इससे फर्जी दस्तावेजों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर अतिरिक्त जांच के कारण आवेदन प्रक्रिया लंबी और जटिल हो सकती है।
फिलहाल असम सरकार का यह निर्णय पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। राज्य सरकार इसे अवैध घुसपैठ के खिलाफ एक निर्णायक कदम बता रही है, जबकि इसके सामाजिक, प्रशासनिक और राजनीतिक प्रभावों को लेकर बहस जारी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह नई व्यवस्था अवैध दस्तावेजों पर रोक लगाने में कितनी सफल साबित होती है और आम नागरिकों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।