लखनऊ: यूपी की राजनीति में राजभर समाज को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर जहां लगातार अपने बयानों और राजनीतिक दावों को लेकर चर्चा में रहते हैं, वहीं समाजवादी पार्टी ने उनके प्रभाव वाले सामाजिक आधार में बड़ी सेंध लगाने की कोशिश की है।
सुभासपा से जुड़े वरिष्ठ नेता और राजभर समाज के प्रभावशाली चेहरे माने जाने वाले महेंद्र राजभर के समाजवादी पार्टी में शामिल होने से पूर्वांचल की राजनीति में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे आगामी चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम मान रहे हैं।
राजभर समाज पूर्वी उत्तर प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक प्रभाव रखता है। ऐसे में इस समाज से जुड़े किसी बड़े नेता का दल बदलना राजनीतिक दलों के लिए महज एक संगठनात्मक बदलाव नहीं बल्कि सामाजिक और चुनावी संदेश भी माना जाता है।
समाजवादी पार्टी लंबे समय से गैर-यादव पिछड़ा वर्ग के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। महेंद्र राजभर का पार्टी में शामिल होना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इससे सपा को उन क्षेत्रों में मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है जहां राजभर समाज की अच्छी खासी आबादी है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार विभिन्न पिछड़े, दलित और अति पिछड़े वर्गों को जोड़ने की कोशिश में जुटे हैं। पार्टी का मानना है कि व्यापक सामाजिक गठबंधन के जरिए भाजपा और उसके सहयोगियों को चुनौती दी जा सकती है।
महेंद्र राजभर की एंट्री को इसी सामाजिक विस्तार अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व को उम्मीद है कि इससे राजभर समुदाय के बीच सपा की स्वीकार्यता और बढ़ेगी राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को ओम प्रकाश राजभर के लिए एक राजनीतिक चुनौती के रूप में भी देखा जा रहा है। राजभर समाज के भीतर प्रभाव रखने वाले नेताओं का दूसरे दलों में जाना सुभासपा के संगठनात्मक ढांचे और जनाधार पर असर डाल सकता है।
हालांकि सुभासपा की ओर से ऐसे घटनाक्रमों को सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया बताया जाता रहा है और पार्टी नेतृत्व अपने संगठन को मजबूत बताता रहा है। लेकिन चुनावी राजनीति में सामाजिक नेतृत्व का महत्व हमेशा निर्णायक माना जाता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस घटनाक्रम का राजभर समाज की राजनीतिक दिशा और विभिन्न दलों की चुनावी रणनीतियों पर कितना प्रभाव पड़ता है। फिलहाल इतना तय है कि इस कदम ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा को जन्म दे दिया है।