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गंगा जल संधि पर बढ़ा तनाव, भारत-बांग्लादेश वार्ता पर नजर

नई दिल्ली : भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर वर्ष 1996 में हुई ऐतिहासिक संधि इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने जा रही है। इसके नवीनीकरण को लेकर दोनों देशों के बीच अभी तक कोई अंतिम सहमति सामने नहीं आई है। इस बीच बांग्लादेश में इस मुद्दे पर राजनीतिक […]

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  • June 28, 2026 7:16 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली : भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे को लेकर वर्ष 1996 में हुई ऐतिहासिक संधि इस वर्ष दिसंबर में समाप्त होने जा रही है। इसके नवीनीकरण को लेकर दोनों देशों के बीच अभी तक कोई अंतिम सहमति सामने नहीं आई है। इस बीच बांग्लादेश में इस मुद्दे पर राजनीतिक और रणनीतिक बहस तेज हो गई है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जल समझौते का समय रहते नवीनीकरण दोनों देशों के हित में होगा, जबकि कुछ विशेषज्ञों ने इसे ढाका की प्राथमिकता बताया है।

भारत और बांग्लादेश के संबंध दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण द्विपक्षीय साझेदारियों में गिने जाते हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और सीमा प्रबंधन जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ा है। हालांकि, साझा नदियों के जल बंटवारे का मुद्दा हमेशा से संवेदनशील रहा है। गंगा जल संधि इसी सहयोग का एक महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।

क्या है 1996 की गंगा जल संधि?

भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को गंगा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर 30 वर्षों की संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते का उद्देश्य फरक्का बैराज पर उपलब्ध जल का दोनों देशों के बीच तय मानकों के अनुसार वितरण सुनिश्चित करना था। संधि के तहत सूखे मौसम में जल प्रवाह के आधार पर दोनों देशों को निर्धारित हिस्सेदारी दी जाती है।

यह समझौता उस समय दोनों देशों के रिश्तों में एक बड़ी उपलब्धि माना गया था क्योंकि इससे लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद को संस्थागत ढंग से हल करने की दिशा मिली थी।

दिसंबर 2026 में समाप्त होगी अवधि

गंगा जल संधि की 30 वर्ष की अवधि दिसंबर 2026 में पूरी हो रही है। इसके चलते अब दोनों देशों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या मौजूदा संधि को पहले जैसी शर्तों के साथ बढ़ाया जाएगा या इसमें बदलाव किए जाएंगे। फिलहाल इस विषय पर आधिकारिक स्तर पर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, वर्षा के बदलते पैटर्न और नदी के जल प्रवाह में बदलाव जैसी परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य की किसी भी व्यवस्था में इन पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा।

बांग्लादेश में तेज हुई चर्चा

बांग्लादेश के कई नीति विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों ने सरकार से अपील की है कि गंगा जल संधि के नवीनीकरण को प्राथमिकता दी जाए। उनका तर्क है कि कृषि, पेयजल और नदी आधारित अर्थव्यवस्था के लिए गंगा का पानी बेहद महत्वपूर्ण है।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि समय रहते भारत के साथ सकारात्मक बातचीत शुरू करना दोनों देशों के हित में रहेगा ताकि किसी प्रकार की अनिश्चितता की स्थिति पैदा न हो।

भारत की क्या हो सकती है प्राथमिकता

भारत की ओर से अभी तक संधि के नवीनीकरण को लेकर कोई आधिकारिक विस्तृत घोषणा नहीं की गई है। माना जा रहा है कि भविष्य की बातचीत में नदी के वास्तविक जल प्रवाह, तकनीकी आंकड़ों, पर्यावरणीय परिस्थितियों और दोनों देशों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाएगा।

भारत लगातार यह कहता रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ सहयोग और संवाद के माध्यम से सभी लंबित मुद्दों का समाधान निकाला जा सकता है। ऐसे में गंगा जल संधि पर भी वार्ता को इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन भी बना चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों के जल प्रवाह में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। कभी अत्यधिक वर्षा तो कभी लंबे सूखे की स्थिति ने जल प्रबंधन को और जटिल बना दिया है।

ऐसे में भविष्य की किसी भी नई संधि में केवल ऐतिहासिक आंकड़ों के बजाय वर्तमान और भविष्य की जल उपलब्धता को भी शामिल करना आवश्यक माना जा रहा है।

द्विपक्षीय संबंधों पर रहेगा असर

भारत और बांग्लादेश के संबंध हाल के वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों ने सीमा विवादों के समाधान, ऊर्जा सहयोग, रेल और सड़क संपर्क, व्यापार तथा सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। ऐसे में गंगा जल संधि का नवीनीकरण केवल जल बंटवारे का विषय नहीं बल्कि द्विपक्षीय विश्वास और सहयोग की निरंतरता से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि यदि दोनों देश समय रहते नई सहमति बना लेते हैं तो यह दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग का एक सकारात्मक उदाहरण बन सकता है।

आगे क्या?

दिसंबर 2026 में संधि की अवधि समाप्त होने से पहले दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ताओं की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि तकनीकी समितियां, जल विशेषज्ञ और कूटनीतिक अधिकारी इस विषय पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

दोनों देशों के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि जल सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और पारस्परिक हितों के बीच संतुलन बनाते हुए ऐसा समाधान निकाला जाए जो लंबे समय तक स्थिर और व्यावहारिक साबित हो।

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