पटना। बिहार की राजनीति में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) एक बार फिर सत्ता और चुनावी रणनीति के केंद्र में आ गया है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 22 जून को पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में भव्य अति पिछड़ा सम्मेलन एवं अभिनंदन समारोह आयोजित करने का फैसला किया है। इस कार्यक्रम को केवल एक सामाजिक सम्मेलन नहीं, बल्कि बिहार के सबसे बड़े वोट बैंक माने जाने वाले ईबीसी समाज के बीच भाजपा की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा इस सम्मेलन के जरिए अति पिछड़ा समाज के नवनिर्वाचित विधान परिषद सदस्यों का सम्मान करेगी। साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर अपनी राजनीतिक पहुंच को मजबूत करने का प्रयास करेगी। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि बिहार के राजनीतिक समीकरणों में निर्णायक भूमिका निभाने वाला यह वर्ग भविष्य की चुनावी तस्वीर तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
बिहार सरकार के खान एवं भूतत्व मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार उर्फ प्रमोद चंद्रवंशी ने सम्मेलन की जानकारी देते हुए कहा कि अति पिछड़ा समाज संख्या के लिहाज से बेहद मजबूत है। उन्होंने कहा कि जब यह समाज संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद करेगा, तब उसकी राजनीतिक और सामाजिक ताकत और अधिक प्रभावी होगी। उनके अनुसार सम्मेलन का उद्देश्य समाज को सम्मान देना, उसकी भागीदारी बढ़ाना और उसके मुद्दों को प्रमुखता से उठाना है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक बिहार में अति पिछड़ा वर्ग की आबादी 36 प्रतिशत से अधिक मानी जाती है। यही कारण है कि राज्य की लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही हैं। लंबे समय से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल (यू) को ईबीसी राजनीति का सबसे बड़ा लाभार्थी माना जाता रहा है। नीतीश कुमार ने अपने शासनकाल में अति पिछड़ा वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने, स्थानीय निकायों में आरक्षण बढ़ाने और सामाजिक न्याय की योजनाओं के जरिए इस वर्ग में मजबूत पकड़ बनाई है।
इसी वजह से भाजपा का यह सम्मेलन विशेष महत्व रखता है। माना जा रहा है कि पार्टी इस आयोजन के माध्यम से उस सामाजिक आधार में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है, जिसे अब तक जदयू का मजबूत वोट बैंक माना जाता रहा है। भाजपा के लिए यह केवल संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आगामी चुनावों से पहले सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने की रणनीति का हिस्सा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सम्मेलन में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और केंद्रीय नेतृत्व के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं। मंच से अति पिछड़ा समाज के विकास, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक सशक्तिकरण को लेकर बड़े संदेश दिए जाने की संभावना है। पार्टी यह भी दिखाना चाहती है कि वह केवल पारंपरिक वोट बैंक तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के लिए प्रतिबद्ध है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक रहे हैं। ऐसे में जिस दल को अति पिछड़ा वर्ग का अधिक समर्थन मिलेगा, उसकी चुनावी स्थिति मजबूत हो सकती है। भाजपा पिछले कुछ वर्षों से ओबीसी, ईबीसी और दलित वर्गों के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए लगातार अभियान चला रही है। 22 जून का यह सम्मेलन उसी रणनीति की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।
दूसरी ओर, जदयू भी ईबीसी समाज में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने की कोशिश में जुटी हुई है। ऐसे में भाजपा का यह कदम सहयोगी दल के पारंपरिक सामाजिक आधार को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि दोनों दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का हिस्सा हैं, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की होड़ लगातार बनी हुई है।
अब सबकी नजर 22 जून को होने वाले इस सम्मेलन पर टिकी है। सम्मेलन में जुटने वाली भीड़, नेताओं के भाषण और समाज को दिए जाने वाले संदेश यह तय करेंगे कि भाजपा अति पिछड़ा वर्ग के बीच अपनी पकड़ कितनी मजबूत कर पाती है। इतना तय है कि बिहार की राजनीति में ईबीसी वोट बैंक को लेकर शुरू हुई नई हलचल आने वाले चुनावों की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित कर सकती है।